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तुलसीदास- लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप कक्षा 12 हिंदी काव्य खंड

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तुलसीदास- लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप कक्षा 12 हिंदी काव्य खंड

(ख) लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप

प्रतिपादय- 

यह अंश ‘रामचरितमानस’ के लंकाकांड से लिया गया है जब लक्ष्मण शक्ति-बाण लगने से मूर्चिछत हो जाते हैं। भाई के शोक में विगलित राम का विलाप धीरे-धीरे प्रलाप में बदल जाता है जिसमें लक्ष्मण के प्रति राम के अंतर में छिपे प्रेम के कई कोण सहसा अनावृत्त हो जाते हैं। यह प्रसंग ईश्वरीय राम का पूरी तरह से मानवीकरण कर देता है, जिससे पाठक का काव्य-मर्म से सीधे जुड़ाव हो जाता है। इस घने शोक-परिवेश में हनुमान का संजीवनी लेकर आ जाना कवि को करुण रस के बीच वीर रस के उदय के रूप में दिखता है।

सार- 

युद्ध में लक्ष्मण के मूर्चिछत होने पर राम की सेना में हाहाकार मच गया। सब वानर सेनापति इकट्ठे हुए तथा लक्ष्मण को बचाने के उपाय सोचने लगे। सुषेण वैद्य के परामर्श पर हनुमान हिमालय से संजीवनी बूटी लाने के लिए चल पड़े। लक्ष्मण को गोद में लिटाकर राम व्याकुलता से हनुमान की प्रतीक्षा करने लगे। आधी रात बीत जाने के बाद राम अत्यधिक व्याकुल हो गए। वे विलाप करने लगे कि तुम मुझे कभी भी दुखी नहीं देख पाते थे। मेरे लिए ही तुमने वनवास स्वीकार किया। अब वह प्रेम मुझसे कौन करेगा? यदि मुझे तुम्हारे वियोग का पता होता तो मैं तुम्हें कभी साथ नहीं लाता। संसार में सब कुछ दुबारा मिल सकता है, परंतु सहोदर भाई नहीं। तुम्हारे बिना मेरा जीवन पंखरहित पक्षी के समान है। अयोध्या जाकर मैं क्या जवाब दूँगा? लोग कहेंगे कि पत्नी के लिए भाई को गवा आया। तुम्हारी माँ को मैं क्या जवाब दूँगा? तभी हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आए। वैद्य ने दवा बनाकर लक्ष्मण को पिलाई और उनकी मूच्छी ठीक हो गई। राम ने उन्हें गले से लगा लिया। वानर सेना में उत्साह आ गया। रावण को यह समाचार मिला तो उसने परेशान होकर कुंभकरण को उठाया। कुंभकरण ने जगाने का कारण पूछा तो रावण ने सीता के हरण से युद्ध तक की सारी बात बताई तथा बड़े-बड़े वीरों के मारे जाने की बात कही। कुंभकरण ने रावण को बुरा-भला कहा और कहा कि तुमने साक्षात ईश्वर से वैर लिया है और अब अपना कल्याण चाहते हो! राम साक्षात हरि तथा सीता जी जगदंबा हैं। उनसे वैर लेना कभी कल्याणकारी नहीं हो सकता।

तुलसीदास : लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप

(ख) लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप

दोहा

1.

तव प्रताप उर राखि प्रभु, जैहउँ नाथ तुरंग।
अस कहि आयसु पाह पद, बदि चलेउ हनुमत।
भरत बाहु बल सील गुन, प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत, पुनि-पुनि पवनकुमार।।
 

शब्दार्थ- 

तव-तुम्हारा, आपका। प्रताप-यश। उर-हृदय। राखि-रखकर। जैहऊँ-जाऊँगा। नाथ-स्वामी। अस-इस तरह। आयसु-आज्ञा। पाड़-पाकर। पद-चरण, पैर। बदि-वंदना करके। बहु-भुजा। सील-सद्व्यवहार। गुन-गुण। प्रीति-प्रेम। अयार-अधिक। महुँ-में। सराहत-बड़ाई करते हुए। पुनि- पुनि-फिर-फिर। पवनकुमार-हनुमान।

प्रसंग-

प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप’ प्रसंग से उद्धृत है। यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड से लिया गया है। इसके रचयिता कवि तुलसीदास हैं। इस प्रसंग में लक्ष्मण के मूर्चिछत होने तथा हनुमान द्वारा संजीवनी बूटी लाने में भरत से मुलाकात का वर्णन किया गया है।

व्याख्या- 

हे नाथ! हे प्रभो!! मैं आपका प्रताप हृदय में रखकर तुरंत यानी समय से वहाँ पहुँच जाऊँगा। ऐसा कहकर और भरत जी से आज्ञा लेकर एवं उनके चरणों की वंदना करके हनुमान जी चल दिए।
भरत के बाहुबल, शील स्वभाव तथा प्रभु के चरणों में उनकी अपार भक्ति को मन में बार-बार सराहते हुए हनुमान संजीवनी बूटी लेकर लंका की तरफ चले जा रहे थे।

विशेष-

(i) हनुमान की भक्ति व भरत के गुणों का वर्णन हुआ है।
(ii) दोहा छंद है।
(iii) अवधी भाषा का प्रयोग है।
(iv) ‘मन महुँ’, ‘पुनि-पुनि पवन कुमार’, ‘पाइ पद’ में अनुप्रास तथा ‘पुनि-पुनि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

प्रश्न

(क) कवि तथा कविता का नाम बताइए?
(ख) हनुमान ने भरत जी को क्या आश्वासन दिया ?
(ग) हनुमान ने भरत सो क्या कहा ?
(घ) हनुमान भरत की किस बात से प्रभावित हुए ?
(ङ) हनुमान ने सकट में धैर्य नहीं खोया। वे वीर एवं धैर्यवान थे-स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

(क) कवि-तुलसीदास।
कविता-लक्ष्मण-मूच्छी और राम का विलाप।
(ख) हनुमान जी ने भरत जी को यह आश्वासन दिया कि “हे नाथ! मैं आपका प्रताप हृदय में रखकर तुरंत संजीवनी बूटी लेकर लंका पहुँच जाऊँगा। आप निश्चित रहिए।”
(ग) हनुमान ने भरत से कहा कि “हे नाथ! मैं आपके प्रताप को मन में धारण करके तुरंत जाऊँगा।”
(घ) हनुमान भरत की रामभक्ति, शीतल स्वभाव व बाहुबल से प्रभावित हुए।
(ङ) मेघनाथ का बाण लगने से लक्ष्मण घायल व मूर्चिछत हो गए थे। इससे श्रीराम सहित पूरी वानर सेना शोकाकुल होकर विलाप कर रही थी। ऐसे में हनुमान ने विलाप करने की जगह धैर्य बनाए रखा और संजीवनी लेने गए। इससे स्पष्ट होता है कि हनुमान वीर एवं धैर्यवान थे।

2.

उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसार।।
अप्ध राति गङ्ग कपि नहिं आयउ। राम उठाड़ अनुज उर लायउ ।।
सकडु न दुखित देखि मोहि काऊ। बांधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।। 
सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।।
जों जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेऊँ नहिं ओहू।। 

शब्दार्थ- 

उहाँ-वहाँ। लछिमनहि- लक्ष्मण को। निहारी- देखा। मनुज- मनुष्य। अनुसारी- समान। अध- आधी। राति- रात। कपि- बंदर (हनुमान)। आयउ-आया। अनुज- छोटा भाई, लक्ष्मण। उर- हृदय। सकटु- सके। दुखित- दुखी। मोह- मुझे। काऊ- किसी प्रकार । तव- तेरा। मृदुल- कोमल। सुभाऊ– स्वभाव। मम- मेरे। हित- भला। तजहु- त्याग दिया। सहेहु- सहन किया। बिपिन- जंगल। हिम- बर्फ । आतप- धूप। बाता- हवा, तूफ़ान। सो- वह। अनुराग- प्रेम। वच- वचन। बिकलाह- व्याकुल। जों- यदि। जनतेऊँ- जानता। बिछोहू- बिछड़ना, वियोग। मनतेऊँ– मानता। अगेहू- उस।


प्रसंग- 

इस प्रसंग में लक्ष्मण-मूच्छा पर राम के करुण विलाप का वर्णन किया गया है।

व्याख्या-

 लक्ष्मण को निहारते हुए श्रीराम सामान्य आदमी के समान विलाप करते हुए कहने लगे कि आधी रात बीत गई है। अभी तक हनुमान नहीं आए। उन्होंने लक्ष्मण को उठाकर सीने से लगाया। वे बोले कि “तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख पाते थे। तुम्हारा स्वभाव सदैव कोमल व विनम्र रहा। मेरे लिए ही तुमने माता-पिता को त्याग दिया और जंगल में ठंड, धूप, तूफ़ान आदि को सहन किया। हे भाई! अब वह प्रेम कहाँ है? तुम मेरी व्याकुलतापूर्ण बातों को सुनकर उठते क्यों नहीं। यदि मैं यह जानता होता कि वन में तुम्हारा वियोग सहना पड़ेगा तो मैं पिता के वचनों को भी नहीं मानता और वन में नहीं आता।

विशेष-

(i) राम का मानवीय रूप एवं उनके विलाप का मार्मिक वर्णन है।
(ii) दृश्य बिंब है।
(iii) करुण रस की प्रधानता है।
(iv) चौपाई छंद का कुशल निर्वाह है।
(v) अवधी भाषा है।
(vi) निम्नलिखित में अनुप्रास अलंकार की छटा है-
‘बोले बचन’, ‘दुखित देखि’, ‘बन बंधु बिछोहू’, ‘बच बिकलाई’।

प्रश्न

(क) रात अधिक होते देख राम ने क्या किया?
(ख) राम ने लक्ष्मण की किन-किन विशेषताओं को बताया?
(ग) लक्ष्मण ने राम के लिए क्या-क्या कष्ट सहे?
(घ) ‘सी अनुराग’ कहकर राम कैसे अनुराग की दुलभता की ओर संकेत कर रहे हैं? सोदाहरण लिखिए।

उत्तर-

(क) रात अधिक होते देख राम व्याकुल हो गए। उन्होंने लक्ष्मण को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया।
(ख) राम ने लक्ष्मण की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई-

(i) वे राम को दुखी नहीं देख सकते थे।
(ii) उनका स्वभाव कोमल था।
(iii) उन्होंने माता-पिता को छोड़कर उनके लिए वन के कष्ट सहे।

(ग) लक्ष्मण ने राम के लिए अपने माता-पिता को ही नहीं, अयोध्या का सुख-वैभव त्याग दिया। वे वन में राम के साथ रहकर नाना प्रकार की मुसीबतें सहते रहे।
(घ) ‘सो अनुराग’ कहकर राम ने अपने और लक्ष्मण के बीच स्नेह की तरफ संकेत किया है। ऐसा प्रेम दुर्लभ होता है कि भाई के लिए दूसरा भाई अपने सब सुख त्याग देता है। राम भी लक्ष्मण की मूच्छी मात्र से व्याकुल हो जाते हैं।

3.

सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारह बारा।।
अस बिचारि जिय जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।।
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जों जड़ दैव जिआर्वे मोही।।
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाड़ गवाई।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बुसेष छति नहीं।। 

शब्दार्थ-

 बित-धन। नारि- स्त्री, पत्नी। होहिं- आते हैं। जाहि- जाते हैं। जग- संसार। बारहेिं बार- बार-बार। अस- ऐसा, इस तरह। बिचारि- सोचकर। जिय- मन में। ताता- भाई के लिए संबोधन। सहोदर– एक ही माँ की कोख से जन्मे। भ्राता- भाई। जथा- जिस प्रकार। बिनु- के बिना। दीना-दीन-हीन। मनि- नागमणि। फनि- फन (यहाँ-साँप)। करिबर- श्रेष्ठ हाथी। कर- सूंड़। हीना- से रहित। मम- मेरा। जिवन- जीवन। बंधु- भाई। तोही- तुम्हारे। जौं-यदि। जड़- कठोर। वैव- भाग्य। जिआवै- जीवित रखे। मोही- मुझे। जैहऊँ- जाऊँगा। कवन- कौन। मुहुँ- मुख। हेतु- के लिए। गवाड़- खोकर। बरु- चाहे। अयजस- अपयश। सहतेऊँ- सहन करता। माह- में। बिसेष- खास। छति- हानि, नुकसान।

प्रसंग-

इस प्रसंग में लक्ष्मण-मूच्छा पर राम के विलाप का वर्णन है।

व्याख्या- 

श्रीराम व्याकुल होकर कहते हैं कि संसार में पुत्र, धन, स्त्री, भवन और परिवार बार-बार मिल जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं, किंतु संसार में सगा भाई दुबारा नहीं मिलता। यह विचार करके, हे तात, तुम जाग जाओ।
हे लक्ष्मण! जिस प्रकार पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना साँप, सँड़ के बिना हाथी अत्यंत दीन-हीन हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। हे भाई! तुम्हारे बिना यदि भाग्य मुझे जीवित रखेगा तो मेरा जीवन भी पंखविहीन पक्षी, मणि विहीन साँप और सँड़ विहीन हाथी के समान हो जाएगा। राम चिंता करते हैं कि वे कौन-सा मुँह लेकर अयोध्या जाएँगे? लोग कहेंगे कि पत्नी के लिए प्रिय भाई को खो दिया। मैं पत्नी के खोने का अपयश सहन कर लेता, क्योंकि नारी की हानि विशेष नहीं होती।

विशेष-

(i) राम का भ्रातृ-प्रेम प्रशंसनीय है।
(ii) दृश्य बिंब है।
(iii) ‘जथा पंख . तोही’ में उदाहरण अलंकार है।
(iv) चौपाई छंद का सुंदर प्रयोग है।
(v) अवधी भाषा है।
(vi) करुण रस है।
(vi) निम्नलिखित में अनुप्रास अलंकार की छटा है-
‘जाहिं जग’, ‘बारहिं बारा’, ‘बंधु बिनु’, ‘करिबर कर’।

प्रश्न

(क) काव्यांश के आधार पर राम के व्यक्तित्व पर टिप्पणी कीजिए।
(ख) राम ने भ्रातृ-प्रेम की तुलना में किनकी हीन माना है?
(ग) राम को लक्ष्मण के बिना अपना जीवन कैसा लगता है?
(घ) ‘ जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई ‘ – कथन के पीछे निहित भावना पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर-

(क) इस काव्यांश में राम का आम आदमी वाला रूप दिखाई देता है। वे लक्ष्मण के प्रति स्नेह व प्रेमभाव को व्यक्त करते हैं तथा संसार के हर सुख से ज्यादा सगे भाई को महत्व देते हैं।
(ख) राम ने भ्रातृ-प्रेम की तुलना में पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार सबको हीन माना है। उनके अनुसार, ये सभी चीजें आती-जाती रहती हैं, परंतु सगा भाई बार-बार नहीं मिलता।
(ग) राम को लक्ष्मण के बिना अपना जीवन उतना ही हीन लगता है जितना पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना साँप तथा सँड़ के बिना हाथी का जीवन हीन होता है।
(घ) इस कथन से श्रीराम का कर्तव्यबोध झलकता है। वे अपनी जिम्मेदारी पर लक्ष्मण को अपने साथ लाए थे, परंतु वे अपना कर्तव्य पूरा न कर सके। अत: वे अयोध्या में अपनी जवाबदेही से डरे हुए थे।

4.

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहहि निठुर कठोर उर मोरा।।
निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा।।
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी।।
उतरु काह दैहऊँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।।
बहु बिधि सोचत सोचि बुमोचन। स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन।।
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपालु देखाई।। 

सोरठा

प्रभु प्रलाप सुनि कान, बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान, जिमि करुना महं बीर रस।।  

शब्दार्थ-

 अपलोकु-अपयश। सहाह- सहन कर लेगा। निदुर- कठोर। उर- हृदय। निज- अपनी। जननी- माँ। कुमारा- पुत्र। तात-पिता। तासु-उसके। प्रान अधारा- प्राणों के आधार। साँयेसि- सौपा था। मोह- मुझे। गहि- पकड़कर। यानी- हाथ। हित- हितैषी। जानी- जानकर। उतरु- उत्तर। काह- क्या। तेहि-उसे। किन- क्यों नहीं। स्त्रवत- चूता है। सलिल- जल। राजिव- कमल। गति- दशा। प्रलाप- तर्कहीन वचन-प्रवाह। विकल- परेशान। निष्कर- समूह। जिमि- जैसे। मँह– में।


प्रसंग- 

इस प्रसंग में लक्ष्मण-मूच्छा पर राम के विलाप व हनुमान के वापस आने का वर्णन किया गया है।


व्याख्या-

 लक्ष्मण के होश में न आने पर राम विलाप करते हुए कहते हैं कि मेरा निष्ठुर व कठोर हृदय अपयश और तुम्हारा शोक दोनों को सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माता के एक ही पुत्र हो तथा उसके प्राणों के आधार हो। उसने सब प्रकार से सुख देने वाला तथा परम हितकारी जानकर ही तुम्हें मुझे सौंपा था। अब उन्हें मैं क्या उत्तर दूँगा? तुम स्वयं उठकर मुझे कुछ बताओ। इस प्रकार राम ने अनेक प्रकार से विचार किया और उनके कमल रूपी सुंदर नेत्रों से आँसू बहने लगे। शिवजी कहते हैं-हे उमा ! श्री रामचंद्र जी अद्वितीय और अखंड हैं। भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान ने मनुष्य की दशा दिखाई है। प्रभु का विलाप सुनकर वानरों के समूह व्याकुल हो गए। इतने में हनुमान जी आ गए। ऐसा लगा जैसे करुण रस में वीर रस प्रकट हो गया हो।


विशेष-

(i) राम की व्याकुलता का सजीव वर्णन है।
(ii) दृश्य बिंब है।
(iii) अवधी भाषा का सुंदर प्रयोग है।
(iv) चौपाई व सोरठा छंद हैं।
(vi) करुण रस है।
(vii) निम्नलिखित में अनुप्रास अलंकार की छटा है
‘तात तासु तुम्ह’, ‘बहु विधि’, ‘सोचत सोच’, ‘स्रवत सलिल’, ‘प्रभु प्रताप’।
(viii) ‘राजिव दल लोचन’ में रूपक अलंकार है।

प्रश्न

(क) व्याकुल श्रीराम अपना दुख कैसे प्रकट कर रहे हैं?
(ख) श्रीराम सुमित्रा माता का स्मरण करके क्यों दुखी हो उठते हैं?

उत्तर-

(क) व्याकुल श्रीराम आपना दुख प्रकट करते हुए कहते हैं कि वे कठोर हृदय से लक्ष्मण के वियोग व अपयश को सहन कर लेंगे, परंतु अयोध्या में सुमित्रा माता को क्या जवाब देंगे।
(ख) श्रीराम सुमित्रा माता के विषय में चिंतित हैं, क्योंकि उन्होंने राम को हर तरह से हितैषी मानकर लक्ष्मण को उन्हें सौंपा था। अत: वे उन्हें लक्ष्मण की मृत्यु का जवाब कैसे देंगे। वे लक्ष्मण से ही इसका जवाब पूछ रहे हैं।
(ग) इसका अर्थ यह है कि राम ने मानवरूप में जन्म लिया। उन्हें धरती पर होने वाली हर घटना का पूर्व ज्ञान है, परंतु वे लक्ष्मण-मूच्छा पर साधारण मानव की तरह व्यवहार कर रहे हैं।
(घ) हनुमान के आगमन से वानर सेना में उत्साह आ गया। ऐसा लगा जैसे करुण रस के प्रसंग में वीर रस का संचार हो गया।

5.

हरषि राम भेंटेउ हनुमान। अति कृतस्य प्रभु परम सुजाना ।।
तुरत बँद तब कीन्हि उ पाई। उठि बैठे लछिमन हरषाड़।।
हृदयाँ लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।
कपि पुनि बँद तहाँ पहुँचवा। जेहि बिधि तबहेिं ताहि लह आवा।। 

शब्दार्थ- 

हरषि-खुश होकर। भेटेउ- गले लगाकर प्रेम प्रकट किया। अति- बहुत अधिक। कृतग्य- आभार। सुजाना- अच्छा ज्ञानी, समझदार। बैद- वैद्य। कीन्हि- किया। भ्राता– भाई। हरषे- खुश हुए। सकल- समस्त। ब्रता- समूह, झंड। युनि- दुबारा। ताहि- उसको। लद्ध आवा- लेकर आए थे।

प्रसंग-

 इस प्रसंग में लक्ष्मण के स्वस्थ होकर उठने तथा सभी की प्रसन्नता का वर्णन है।

व्याख्या- 

हनुमान के आने पर राम ने प्रसन्न होकर उन्हें गले से लगा लिया। परम चतुर और एक समझदार व्यक्ति की तरह भगवान राम ने हनुमान के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की। वैद्य ने शीघ्र ही उपचार किया जिससे लक्ष्मण उठकर बैठ गए और बहुत प्रसन्न हुए। लक्ष्मण को राम ने गले से लगाया। इस दृश्य को देखकर भालुओं और वानरों के समूह में खुशी छा गई। हनुमान ने वैद्यराज को वहीं उसी तरह पहुँचा दिया जहाँ से वे उन्हें लेकर आए थे।

विशेष-

(i) लक्ष्मण के ठीक होने पर वानर सेना व राम की खुशी का वर्णन है।
(ii) अवधी भाषा है।
(iii) चौपाई छंद है।
(iv) ‘प्रभु परम’, ‘तबहिं ताहि में’।
(v) घटना क्रम में तीव्रता है।

प्रश्न

(क) हनुमान के आने पर राम ने क्या प्रतिक्रिया जताई ?
(ख) लक्ष्मण की मूर्च्छा किस तरह टूटी ?
(ग) किस घटना से वानर सेना प्रसन्न हुई ?
(घ) ‘जेहि विधि तबहिं ताहि लद्ध लावा। ‘- पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

(क) हनुमान के आने पर राम प्रसन्न हो गए तथा उन्हें गले से लगाया। उन्होंने हनुमान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।
(ख) सुषेण वैद्य ने संजीवनी बूटी से लक्ष्मण का उपचार किया। परिणामस्वरूप उनकी  मूर्च्छा टूटी और लक्ष्मण हँसते हुए उठ बैठे।
(ग) लक्ष्मण के ठीक होने पर प्रभु राम ने उन्हें गले से लगा लिया। इस दृश्य को देखकर सभी बंदर, भालू व हनुमान प्रसन्न हो गए।
(घ) इसका अर्थ यह है कि हनुमान जिस तरीके से सुषेण वैद्य को उठाकर लाए थे, उसी प्रकार उन्हें उनके स्थान पर पहुँचा दिया।

6.

यह बृतांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ।।
ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा ।।
जागा निसिचर देखिअ कैस। मानहुँ कालु देह धरि बैंस ।।
कुंभकरन बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई।। 

शब्दार्थ- 

बृतांत-वर्णन। बिषाद-दुख। सिर धुनेऊ-पछताया। पहिं- पास। बिबिध-अनेक। जतन- उपाय, प्रयास। करि- करके। ताहि- उसे। जगावा-जगाया। निसिचर-राक्षस अर्थात कुंभकरण। कालु- मौत। देह- शरीर। धरि- धारण करके। बैंसा- बैठा। बूद्धा- पूछा। कहु-कहो। काहे-क्यों। तव- तेरा। सुखार्द्र- सूख रहे हैं।


प्रसंग- 

इस प्रसंग में कुंभकरण के जागने का वर्णन किया गया है।

व्याख्या- 

जब रावण ने लक्ष्मण के ठीक होने का समाचार सुना तो वह दुख से अपना सिर धुनने लगा। व्याकुल होकर वह कुंभकरण के पास गया और कई तरह के उपाय करके उसे जगाया। कुंभकरण जागकर बैठ गया। वह ऐसा लग रहा था मानो यमराज ने शरीर धारण कर रखा हो। कुंभकरण ने रावण से पूछा-कहो भाई, तुम्हारे मुख क्यों सूख रहे हैं?

विशेष-

(i) रावण के दुख का सुंदर चित्रण किया गया है।
(ii) ‘पुनि-पुनि’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
(iii) कुंभकरण के लिए काल की उत्प्रेक्षा प्रभावी है। यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है।
(iv) अवधी भाषा है।
(v) चौपाई छंद है।
(vi) ‘सिर धुनना’ व ‘मुख सूखना’ मुहावरे का सुंदर प्रयोग है।

प्रश्न

(क) रावण ने कॉन-सा वृत्तांत सुना? उसकी क्या प्रतिक्रिया थी?
(ख) रावण कहाँ गया तथा क्या किया?
(ग) कुंभकर्ण कैसा लग रहा था?
(घ) कुंभकर्ण ने रावण से क्या पूछा?

उत्तर-

(क) रावण ने लक्ष्मण की मूच्छीँ टूटने का समाचार सुना। यह सुनकर वह अत्यंत दुखी हो गया तथा सिर पीटने लगा।
(ख) रावण कुंभकरण के पास गया तथा अनेक तरीकों से उसे नींद से जगाया।
(ग) कुंभकरण जागने के बाद ऐसा लग रहा था मानो यमराज शरीर धारण करके बैठा हो।
(घ) कुंभकरण ने रावण से पूछा, ‘कहो भाई, तुम्हारे मुख क्यों सूख रहे हैं? अर्थात तुम्हें क्या कष्ट है? ”

7.

कथा कही सब तेहिं अभिमानी। कही प्रकार सीता हरि आनी।।
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे महा।।
दुर्मुख सुररुपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी।।
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा।।

दोहा

सुनि दसकंधर बचन तब, कुंभकरन बिलखान।।
जगदबा हरि अनि अब, सठ चाहत कल्यान।। 

शब्दार्थ-

 कथा-कहानी। तेहिं- उस। जहि- जिस। हरि- हरण करके। आन- लाए। कपिन्ह- हनुमान आदि वानर। महा महा– बड़े-बड़े। जोधा- योद्धा। संधारे- संहार किया। दुमुख- एक राक्षस का नाम। सुररियु- देवताओं का शत्रु (इंद्रजीत)। मनुज अहारी- नरांतक। भट- योद्धा। अतिकाय- एक राक्षस का नाम। आयर- दूसरा। महोदर- एक राक्षस का नाम। आदिक- आदि। समर- युद्ध। महि- धरती। रनधीर- रणधीर। दसकंधर- रावण। बिलखान- दुखी होकर रोने लगा। जगदंबा- जगत-जननी। हरि- हरण करके। आनि- लाकर। सठ- मूर्ख। कल्यान- कल्याण, शुभ।


प्रसंग-

 प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘लक्ष्मण-मूच्छा और राम का विलाप’ प्रसंग से उद्धृत है। यह प्रसंग रामचरितमानस के लंकाकांड से लिया गया है। इसके रचयिता तुलसीदास हैं। इस प्रसंग में कुंभकरण व रावण के वार्तालाप का वर्णन है।

व्याख्या- 

अभिमानी रावण ने जिस प्रकार से सीता का हरण किया था उसकी और उसके बाद तक की सारी कथा उसने कुंभकरण को सुनाई। रावण ने बताया कि हे तात, हनुमान ने सब राक्षस मार डाले हैं। उसने महान-महान योद्धाओं का संहार कर दिया है। दुर्मुख, देवशत्रु, नरांतक, महायोद्धा, अतिकाय, अकंपन और महोदर आदि अनेक वीर युद्धभूमि में मरे पड़े हैं। रावण की बातें सुनकर कुंभकरण बिलखने लगा और बोला कि अरे मूर्ख, जगत-जननी जानकी को चुराकर अब तू कल्याण चाहता है ? यह संभव नहीं है।

विशेष-

(i) रावण की व्याकुलता तथा कुंभकरण की वाक्पटुता का पता चलता है।
(ii) अवधी भाषा का प्रयोग है।
(iii) चौपाई तथा दोहा छंद हैं।
(iv) वीर रस विद्यमान है।
(v) ‘महा महा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
(vi) संवाद शैली है।
(vi) ‘कथा कही’, ‘अतिकाय अकप्पन अनुप्रास अलंकार है।

प्रश्न

(क) किसने, किसको, क्या कथा सुनाई थी?
(ख) 
रावण की सेना के कौन-कौन से वीर मारे गए?
(ग)
 हनुमान के बारे में रावण क्या बताता हैं?
(घ) 
रावण की बातों पर कुंभकरण ने क्या प्रतिक्रिया जताई?

उत्तर-

(क) रावण ने कुंभकरण से सीता-हरण से लेकर अब तक के युद्ध और उसमें मारे गए अपनी सेना के वीरों के बारे में बताया ।
(ख) रावण की सेना के दुर्मुख, अतिकाय, अकंपन, महोदर, नरांतक आदि वीर मारे गए।
(ग) हनुमान ने अनेक बड़े-बड़े वीरों को मारकर रावण की सेना को गहरी क्षति पहुँचाई थी। रावण कुंभकरण को हनुमान की वीरता, अपनी विवशता और पराजय की आशंका के बारे में बताता है।
(घ) रावण की बात सुनकर कुंभकरण बिलखने लगा। उसने कहा, ‘हे मूर्ख, जगत-जननी का हरण करके तू कल्याण की बात सोचता है? अब तेरा भला नहीं हो सकता।”

तुलसीदास : लक्ष्मण मूर्च्छा और राम का विलाप

(ख) लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप

निम्नलिखित काव्यांशों को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

1.

भरत बाहु बल सील गुन, प्रभु पद प्रीति अपारा।
मन महुँ जात सराहत, पुनि–पुनि पवनकुमार।।  

प्रश्न

(क) अनुप्रास अलकार के दो उदाहरण चुनकर लिखिए।
(ख) कविता के भाषिक सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए।
(ग) काव्याशा के भाव-वैशिष्ट्रय को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-

(क) अनुप्रास अलंकार के दो उदाहरण–

(i) प्रभु पद प्रीति अपार।
(ii) पुनि–पुनि पवनकुमार।

(ख) काव्यांश में सरस, सरल अवधी भाषा का प्रयोग है। इसमें दोहा छद का प्रयोग है।
(ग) काव्यांश में हनुमान द्वारा भरत के बाहुबल, शील-स्वभाव तथा प्रभु श्री राम के चरणों में उनकी अपार भक्ति की सराहना का वर्णन है।

2.

सुत बित नारि भवन परिवारा । होहि जाहिं ज7 बारह बारा ।।
अस बिचारि जिय जपहु ताता। मिलह न जगत सहोदर भ्रात।।
जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।।
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाई गँवाई।।
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।

प्रश्न

(क) काव्यांश के भाव-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।
(ख) इन पंक्तियों को पढ़कर राम-लक्ष्मण की किन-किन विशेषताओं का पता चलता है।
(ग) अंतिम दो पंक्तियों को पढ़कर हमें क्या सीख मिलती है।

उत्तर-

(क) विष्णु भगवान के अवतार भगवान श्री राम का मनुष्य के समान व्याकुल होना और राम, लक्ष्मण एवं भरत का यह परस्पर भ्रातृ-प्रेम हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।
(ख) दोनों भाइयों में अगाध प्रेम था। श्री राम अनुज से बहुत लगाव रखते थे तथा दोनों के बीच पिता-पुत्र-सा संबंध था। लक्ष्मण श्री राम का बहुत सम्मान करते थे।
(ग) भगवान श्री राम के अनुसार संसार के सब सुख भाई पर न्यौछावर किए जा सकते हैं। भाई के अभाव में जीवन व्यर्थ है और भाई जैसा कोई हो ही नहीं सकता। आज के युग में यह सीख अनेक सामाजिक कष्टों से मुक्त करवा सकती है।

3.

प्रभु प्रलाप सुनि कान, बिकल भए बानर निकरा
आइ गयउ हनुमान, जिमि करुना महाँ बीर रस। 

प्रश्न

(क) भाषा-प्रयोग की दो विशेषताएँ लिखिए।
(ख) काव्यांश का भाव-सौंदर्य लिखिए।
(ग) काव्यांश की अलकार-योजना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर-

(क) भाषा-प्रयोग की दो विशेषताएँ हैं-

(i) सरस, सरल, सहज, मधुर अवधी भाषा का प्रयोग।
(ii) भाषा में दृश्य बिंब साकार हो उठा है।

(ख) काव्यांश में लक्ष्मण के मूर्चिछत होने पर श्री राम एवं वानरों की शोक-संवेदना एवं दुख का वर्णन है। उसी बीच हनुमान के आ जाने से दुख में हर्ष के संचार हो जाने का वर्णन है, क्योंकि उनके संजीवनी बूटी लाने से अब लक्ष्मण के प्राण बच जाएँगे।
(ग) ‘विकल भए वानर निकर’ में अनुप्रास तथा ‘आइ गयउ हनुमान, जिमि करुना महँ वीर रस’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।

4.

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।। 
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई।।
ह्रदय लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।।
कपि पुनि बैद  तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लई आवा।।

प्रश्न

(क) काव्यांश का भाव-सौंदर्य लिखिए।
(ख) इन पंक्तियों   के आधार पर हनुमान की विशेषताएँ बताईए।
(ग) काव्यांश  की भाषागत विशेषताएँ  लिखिए।

उत्तर-

(क) इसमें राम-भक्त हनुमान की बहादुरी व कर्मठता का, लक्ष्मण के स्वस्थ होने का श्री राम सहित भालू और वानरों के समूह के हर्षित होने का बहुत ही सजीव वर्णन किया गया है।
(ख) हनुमान जी की वीरता और कर्मनिष्ठा ऐसी है कि वे दुख में व्याकुल नहीं होते और हर्ष में कर्तव्य नहीं भूलते। इसीलिए लक्ष्मण के मूर्चिछत होने पर उन्होंने बैठकर रोने के स्थान पर संजीवनी लाये और काम होते ही वैद्य को यथास्थान पहुँचाया।
(ग)

(i) काव्यांश सरल, सहज अवधी भाषा में है, जिसमें चौपाई छंद है।
(ii) अनुप्रास अलंकार की छटा है।
(iii) भाषा प्रवाहमयी है।