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सुरुज टघलत हे कविता पवन दीवान हिंदी कक्षा 9वीं पाठ 4.1

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पवन दीवान

संत-कवि पवन दीवान का जन्म 01 जनवरी 1945 को ग्राम किरवई (राजिम) जिला गरियाबंद में हुआ था। उनकी प्रारंजिक शिक्षा बासिन, राजिम एवं फिंगेश्वर में हुई। उन्होंने हिंदी, संस्कृत एवं अंग्रेजी मैं स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। श्री दीवान प्रख्यात वक्ता और सहृदय साहित्यकार के रूप मैं जाने जाते हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ अंबर का आशौष, मेरा हर स्वर इसका पूजन, फूल, छत्तीसगढ़ महतारी, मर-मर कर जीता है मेरा देश, मेरे देश की माटी, याद आते हैं गाँधी आदि हैं।

सुरुज टघलत हे कविता

ट्घल-टघल के सुरुज
झरत है धरती ऊपर
डबकल गिरे पसीना
माथा छिपिर-छापर।

झाँझ चलत है चारो कोती
तिपगे कान, झँँवागे चेथी
सुलगत है आँखी म आगी
पाँव परत है ऐती-तेती।

अरे पल्रपला, जरे ऑंभरा
फौरा परगे गौड़ म
फिनगेसर ले रैंगत-रैगत
पानी मिलिस पॉड़ मा

चट-चट जरथे अँगना बैरी
लावा बनगे छानो
टपपल्टप टपके कारी पसीना
नोहर होगे पानी।

सॉय-साँय सोखत हे पानी
अड़बड़ मुँह चोषियावै
कुँवर ओठ म॒ पड़ी परगे
सिट्ठा-सिट्ठा खाब।

चारो कोती फूँके आगी
तन म बरणे भुर्रा

खड़े मँझनिया बैरी लागे
सबके छॉड़िस धुर्रा

डामर लक-लक ले तीपे है
ल्स-लस लस-लस बड़ठत है
नस-नस बिजली तार बने है
अँगरी-अँगरी ऑइठत है।

लकर-लकर मैं कड़से रैंगव
धकर-धकर जी लागे
हंकर-हँकर के पथरा फोरैंव
हरहर के दिन आगे।

लहर-तहर सबके परान है
केती सॉँस उड़ाही
बुड़बे जब मन के दहरा म॑

तल्फफत जीव जुड़ाही।

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