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शील के बरवै छंद ( कविता ) शेषनाथ शर्मा शील हिंदी कक्षा 10 वीं पाठ 5.3

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शेषनाथ शर्मा ‘शील’ : जीवन परिचय

छत्तीसगढ़ी के क्लासिक कवि शेषनाथ शर्मा जी का जन्म पौष शुक्ल द्वादसी संवत 1968 (14 जनवरी 1914) जांजगीर में हुआ। आप संस्कृत, बंगला, अंग्रेजी, उर्दू, मराठी और हिन्दी साहित्य के अधिकारी विद्वान थे। आपकी रचनाएँ कानपुर के सुकविए काव्य कलाधर, राष्ट्र धर्म, अग्रदूत, संगीत सुधा, विषाल भारत जैसे उच्च कोटि की पत्रिकाओं में छपती थी। कविता लता, और रवीन्द्र दर्षन आपका प्रकाषित काव्य ग्रंथ है। आपने हिन्दी के अतिरिक्त, छत्तीसगढ़ी में भी लेखन कार्य किया। रस सिद्ध कवि शील जी ने छत्तीसगढ़ी में बरवै छंद को प्रतिष्ठित किया। डॉ. पालेस्वर शर्मा जी के शब्दों में शील जी की प्रारंभिक कविताएं छायावादी है। आपकी मृत्यु 7 अक्टूबर, 1997 में हो गई।

शील के बरवै छंद ( कविता )

खण्ड-अ बिदा के बेरा

सुसकत आवत होही, भइया मोर,
छड़हा मा डोलहाए लेहु अगोर।
बहुत पिरोहिल ननकी. बहिनी मोर.
रो-रो खोजत होही, खोरन-खोर।
तुलसी चौरा म देव, सालिग राम.
मइके ससुर पूरनए, करिही काम।
अँगना कुरिया खोजत, होही गाय,
बछरू मोर बिन काँदी, नइच्च खाय।
मोर सुरता म भइया, दुख झन पाय,
सुरर-सुरर झन दाई रोवै हाय।
तिया जनम के पोथी, म दुई पान,
मइके ससुर बीच म पातर प्रान।

खण्ड-ब ससुरार म मइके के सुरता


इहाँ परे हे आज, राउत हाट.
अरे कउवाँ बइठके. कौंरा बाँट।
दूनों गाँव के देव, करव सहाय.
मोर लेवाल जुच्छा, कभु झन जाय।
इहाँ हावय कबरी, दोहिन गाय
ननकी ऊहाँ गोरस, बिन नइ खाय।
मइया आइस कुलकत, रॉधे खीर,
हाय विधाता कइसन, धरिहौं धीर।
पानी छुइस न झोंकिस, चोंगी पान,
हाय रे पोथी धन रे, कन्या दान।
मोर संग म जहावै. सूतै खाय
ते भाई अब लकठाम, नई आय।
भाई आधा परगट, आधा लुकाय,
ठाढ़े मुरमुर देखत, रहिथे हाथ।

खण्ड-स ससुरार म मइके के सुरता

तन एती मन आँती, अड़बड़ दूर,
रहि-रहि नैना नदिया बांटै पूर।
मन-मछरी ला कइसे. परिगे बान
सब दिन मोर रहिस अब होगे आन।
मन-मछरी ह धार के उल्टा जाय,
हरके ला मन बैरी. नइच्च भाय।
मुँह के कौंरा काबर उगला जाय,
रहि-रहि गोड़ फड़कथे. काबर हाय।
मोर नगरिहा पावत होही घाम,
बैरी बादर तैं कस, होगे बाम।
थकहा आहीं पाहीं, घर ल उदास,
कइसे तोरा करहीं. बूढी सास।
कइसे डहर निहारौं लगथे लाज,
फंदरा वाला बजनी, पनहीं बाज

शब्दार्थ

  • सुसकत – सुबकना; सिसकना;
  • डोलहा – डोली उठाने वाला;
  • आवत होही – आते होंगे;
  • छहा – छाया;
  • लेहु – लेना;
  • अगोर – प्रतीक्षा करना;
  • पिरोहिल – प्यारी; प्यारा;
  • ननकी – छोटी; छोटा;
  • खोरन-खोर -गली-गली;
  • कुरिया – कमरा (कक्ष);
  • कांदी – हरी घास;
  • सुरता – याद;
  • सुरुर-सुरुर – याद करके रोने की क्रिया;
  • तिया – स्त्री,
  • पातर – पतला;
  • हाट – बाजार;
  • कउवां – कौआ, काग,
  • कॉरा – ग्रास, निवाला,
  • लेवाल- बहन या पत्नी को विदा करा कर साथ ले जाने वाला;
  • जुच्छा – खालीय
  • कबरी – चितकबरी;
  • गोरस – गाय का दूध;
  • कुलकत – प्रसन्न चित;
  • राँधे – भोजन बनाए;
  • झोंकन – पकड़ना;
  • हरके – मोइना;
  • घाम- धूप;
  • डहर – रास्ता;
  • बजनी पनही – चमई का वह जूता जिसे पहन कर चलने पर आवाज करता हो;
  • बाज – बजना;
  • तोरा – प्रबंध; व्यवस्था
  • बाम – विपरित।

अभ्यास पाठ से


1.“सुसकत आवत होही भइया मोर पंक्ति के अनुसार दुल्हन की मनोदशा का उल्लेख कीजिए।
2.मायका एवं ससुराल के बीच की स्थिति को कवि ने पातर प्रान’ क्यों कहा है।
3.बहन को लिवाने पहुँचा भाई अनमना सा क्यों है?
4.नायिका के मन काए धारा के विपरीत जाने का संदर्भ दीजिए।
5. नायिका अपने पति के कष्ट की कल्पना करके दुःखी हो जाती है। पाठ में आए हुए उदाहरणों का उल्लेख करते हुए समझाइए।

अभ्यास पाठ से

  1. विवाह पश्चात् लड़कियों का ससुराल जाना वैवाहिक रीति का एक अंग है। इस रीति पर अपने विचार लिखिए।
  2. आपकी शाला में विदाई कार्यक्रम आयोजित किए जाते होंगे। शाला के विदाई कार्यक्रम एवं घर या पड़ोस में बेटी की विदाई का तुलनात्मक वर्णन कर लिखिए।
  3. राउत, हाट बाजार, मेले गाँव से गहरे जुड़े होते हैं” इस कथन पर अभिमत दीजिए।
  4. विवाह पूर्व लड़की की मायके के प्रति कैसी म्मेदारी होती है और विवाह पश्चात् ससुराल में उसके क्या-क्या दायित्व होते हैं? अपनी माँ, भाभी अथवा विवाहित बहनों से उनके अनुभव सुनिए एवं उनका लेखन कीजिए।

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