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जीवन का झरना (कविता ) आरसी प्रसाद सिंह हिंदी कक्षा 10 वीं पाठ 6.1

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जीवन का झरना (कविता ) आरसी प्रसाद सिंह

यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है।
सुख-दुख के दोनों तीरों से चल रहा राह मनमानी है।

कब फूटा गिरि के अंतर से? किस अंचल से उतरा नीचे?
किस घाटी से बह कर आया समतल में अपने को खींचे?

निर्झर में गति है, जीवन है, वह आगे बढ़ता जाता है!
धुन एक सिर्फ़ है चलने की, अपनी मस्ती में गाता है।

बाधा के रोड़ों से लड़ता, वन के पेड़ों से टकराता,
बढ़ता चट्टानों पर चढ़ता, चलता यौवन से मदमाता।

लहरें उठती हैं, गिरती हैं; नाविक तट पर पछताता है।
तब यौवन बढ़ता है आगे, निर्झर बढ़ता ही जाता है।

निर्झर कहता है, बढ़े चलो! देखो मत पीछे मुड़ कर!
यौवन कहता है, बढ़े चलो! सोचो मत होगा क्या चल कर?

चलना है, केवल चलना है ! जीवन चलता ही रहता है !
रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है !

‘जीवन का झरना’ कविता कवि आरसी प्रसाद सिंह की प्रेरणादायी कविता है जिसमें उन्होंने जीवन की तुलना झरने से करते हुए निरंतर गतिशील रहने की प्रेरणा दी है।

झरने के रास्ते में अनेक बाधाएँ आती है परंतु वह बाधाओं को हटाकर अपना मार्ग ढूँढ लेता है और गंतव्य तक पहुँच जाता है। सुख और दुख हमारे जीवन रूपी झरने के दो किनारे हैं इसलिए दुखों के आगे आने पर हमें निराश नहीं होना चाहिए बल्कि आने वाली हर परिस्थिति का सहर्ष कर सामना करना चाहिए।जिस प्रकार झरना पत्थरों से टकराता है और आगे बढ़ता है उसी प्रकार हमें भी उनका सामना करके आगे बढ़ना चाहिए। 

इस प्रकार कवि ने हमें झरने के द्वारा गतिशील और प्रगतिशील रहने की प्रेरणा दी है।

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