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पुरस्कार (कहानी) जयशंकर प्रसाद हिंदी कक्षा 10 वीं पाठ 3.4

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पुरस्कार (कहानी) जयशंकर प्रसाद

आर्द्रा नक्षत्र; आकाश में काले-काले बादलों की घुमड़, जिसमें देव-दुन्दुभी का गम्भीर घोष। प्राची के एक निरभ्र कोने से स्वर्ण-पुरुष झाँकने लगा था।-देखने लगा महाराज की सवारी। शैलमाला के अञ्चल में समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास उठ रही थी। नगर-तोरण से जयघोष हुआ, भीड़ में गजराज का चामरधारी शुण्ड उन्नत दिखायी पड़ा। वह हर्ष और उत्साह का समुद्र हिलोर भरता हुआ आगे बढ़ने लगा।

प्रभात की हेम-किरणों से अनुरञ्जित नन्ही-नन्ही बूँदों का एक झोंका स्वर्ण-मल्लिका के समान बरस पड़ा। मंगल सूचना से जनता ने हर्ष-ध्वनि की।

रथों, हाथियों और अश्वारोहियों की पंक्ति जम गई। दर्शकों की भीड़ भी कम न थी। गजराज बैठ गया, सीढिय़ों से महाराज उतरे। सौभाग्यवती और कुमारी सुन्दरियों के दो दल, आम्रपल्लवों से सुशोभित मंगल-कलश और फूल, कुंकुम तथा खीलों से भरे थाल लिए, मधुर गान करते हुए आगे बढ़े।

महाराज के मुख पर मधुर मुस्क्यान थी। पुरोहित-वर्ग ने स्वस्त्ययन किया। स्वर्ण-रञ्जित हल की मूठ पकड़ कर महाराज ने जुते हुए सुन्दर पुष्ट बैलों को चलने का संकेत किया। बाजे बजने लगे। किशोरी कुमारियों ने खीलों और फूलों की वर्षा की।

कोशल का यह उत्सव प्रसिद्ध था। एक दिन के लिए महाराज को कृषक बनना पड़ता-उस दिन इंद्र-पूजन की धूम-धाम होती; गोठ होती। नगर-निवासी उस पहाड़ी भूमि में आनन्द मनाते। प्रतिवर्ष कृषि का यह महोत्सव उत्साह से सम्पन्न होता; दूसरे राज्यों से भी युवक राजकुमार इस उत्सव में बड़े चाव से आकर योग देते।

मगध का एक राजकुमार अरुण अपने रथ पर बैठा बड़े कुतूहल से यह दृश्य देख रहा था।

बीजों का एक बाल लिये कुमारी मधूलिका महाराज के साथ थी। बीज बोते हुए महाराज जब हाथ बढ़ाते, तब मधूलिका उनके सामने थाल कर देती। यह खेत मधूलिका का था, जो इस साल महाराज की खेती के लिए चुना गया था; इसलिए बीज देने का सम्मान मधूलिका ही को मिला। वह कुमारी थी। सुन्दरी थी। कौशेयवसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे सम्हालती और कभी अपने रूखे अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी, वे सब बरौनियों में गुँथे जा रहे थे। सम्मान और लज्जा उसके अधरों पर मन्द मुस्कराहट के साथ सिहर उठते; किन्तु महाराज को बीज देने में उसने शिथिलता नहीं की। सब लोग महाराज का हल चलाना देख रहे थे-विस्मय से, कुतूहल से। और अरुण देख रहा था कृषक कुमारी मधूलिका को। अहा कितना भोला सौन्दर्य! कितनी सरल चितवन!

उत्सव का प्रधान कृत्य समाप्त हो गया। महाराज ने मधूलिका के खेत का पुरस्कार दिया, थाल में कुछ स्वर्ण मुद्राएँ। वह राजकीय अनुग्रह था। मधूलिका ने थाली सिर से लगा ली; किन्तु साथ उसमें की स्वर्णमुद्राओं को महाराज पर न्योछावर करके बिखेर दिया। मधूलिका की उस समय की ऊर्जस्वित मूर्ति लोग आश्चर्य से देखने लगे! महाराज की भृकुटी भी जरा चढ़ी ही थी कि मधूलिका ने सविनय कहा-

देव! यह मेरे पितृ-पितामहों की भूमि है। इसे बेचना अपराध है; इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामथ्र्य के बाहर है। महाराज के बोलने के पहले ही वृद्ध मन्त्री ने तीखे स्वर से कहा-अबोध! क्या बक रही है? राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार! तेरी भूमि से चौगुना मूल्य है; फिर कोशल का तो यह सुनिश्चित राष्ट्रीय नियम है। तू आज से राजकीय रक्षण पाने की अधिकारिणी हुई, इस धन से अपने को सुखी बना।

राजकीय रक्षण की अधिकारिणी तो सारी प्रजा है, मन्त्रिवर! …. महाराज को भूमि-समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध न था और न है; किन्तु मूल्य स्वीकार करना असम्भव है।-मधूलिका उत्तेजित हो उठी।

महाराज के संकेत करने पर मन्त्री ने कहा-देव! वाराणसी-युद्ध के अन्यतम वीर सिंहमित्र की यह एक-मात्र कन्या है।-महाराज चौंक उठे-सिंहमित्र की कन्या! जिसने मगध के सामने कोशल की लाज रख ली थी, उसी वीर की मधूलिका कन्या है?

हाँ, देव! -सविनय मन्त्री ने कहा।

इस उत्सव के पराम्परागत नियम क्या हैं, मन्त्रिवर?-महाराज ने पूछा।

देव, नियम तो बहुत साधारण हैं। किसी भी अच्छी भूमि को इस उत्सव के लिए चुनकर नियमानुसार पुरस्कार-स्वरूप उसका मूल्य दे दिया जाता है। वह भी अत्यन्त अनुग्रहपूर्वक अर्थात् भू-सम्पत्ति का चौगुना मूल्य उसे मिलता है। उस खेती को वही व्यक्ति वर्ष भर देखता है। वह राजा का खेत कहा जाता है।

महाराज को विचार-संघर्ष से विश्राम की अत्यन्त आवश्यकता थी। महाराज चुप रहे। जयघोष के साथ सभा विसर्जित हुई। सब अपने-अपने शिविरों में चले गये। किन्तु मधूलिका को उत्सव में फिर किसी ने न देखा। वह अपने खेत की सीमा पर विशाल मधूक-वृक्ष के चिकने हरे पत्तों की छाया में अनमनी चुपचाप बैठी रही।

रात्रि का उत्सव अब विश्राम ले रहा था। राजकुमार अरुण उसमें सम्मिलित नहीं हुआ-अपने विश्राम-भवन में जागरण कर रहा था। आँखों में नींद न थी। प्राची में जैसी गुलाली खिल रही थी, वह रंग उसकी आँखों में था। सामने देखा तो मुण्डेर पर कपोती एक पैर पर खड़ी पंख फैलाये अँगड़ाई ले रही थी। अरुण उठ खड़ा हुआ। द्वार पर सुसज्जित अश्व था, वह देखते-देखते नगर-तोरण पर जा पहुँचा। रक्षक-गण ऊँघ रहे थे, अश्व के पैरों के शब्द से चौंक उठे।

युवक-कुमार तीर-सा निकल गया। सिन्धुदेश का तुरंग प्रभात के पवन से पुलकित हो रहा था। घूमता-घूमता अरुण उसी मधूक-वृक्ष के नीचे पहुँचा, जहाँ मधूलिका अपने हाथ पर सिर धरे हुए खिन्न-निद्रा का सुख ले रही थी।

अरुण ने देखा, एक छिन्न माधवीलता वृक्ष की शाखा से च्युत होकर पड़ी है। सुमन मुकुलित, भ्रमर निस्पन्द थे। अरुण ने अपने अश्व को मौन रहने का संकेत किया, उस सुषमा को देखने लिए, परन्तु कोकिल बोल उठा। जैसे उसने अरुण से प्रश्न किया-छि:, कुमारी के सोये हुए सौन्दर्य पर दृष्टिपात करनेवाले धृष्ट, तुम कौन? मधूलिका की आँखे खुल पड़ीं। उसने देखा, एक अपरिचित युवक। वह संकोच से उठ बैठी। -भद्रे! तुम्हीं न कल के उत्सव की सञ्चालिका रही हो?

उत्सव! हाँ, उत्सव ही तो था।

कल उस सम्मान….

क्यों आपको कल का स्वप्न सता रहा है? भद्र! आप क्या मुझे इस अवस्था में सन्तुष्ट न रहने देंगे?

मेरा हृदय तुम्हारी उस छवि का भक्त बन गया है, देवि!

मेरे उस अभिनय का-मेरी विडम्बना का। आह! मनुष्य कितना निर्दय है, अपरिचित! क्षमा करो, जाओ अपने मार्ग।

सरलता की देवि! मैं मगध का राजकुमार तुम्हारे अनुग्रह का प्रार्थी हूँ-मेरे हृदय की भावना अवगुण्ठन में रहना नहीं जानती। उसे अपनी….।

राजकुमार! मैं कृषक-बालिका हूँ। आप नन्दनबिहारी और मैं पृथ्वी पर परिश्रम करके जीनेवाली। आज मेरी स्नेह की भूमि पर से मेरा अधिकार छीन लिया गया है। मैं दु:ख से विकल हूँ; मेरा उपहास न करो।

मैं कोशल-नरेश से तुम्हारी भूमि तुम्हें दिलवा दूंगा।

नहीं, वह कोशल का राष्ट्रीय नियम है। मैं उसे बदलना नहीं चाहती-चाहे उससे मुझे कितना ही दु:ख हो।

तब तुम्हारा रहस्य क्या है?

यह रहस्य मानव-हृदय का है, मेरा नहीं। राजकुमार, नियमों से यदि मानव-हृदय बाध्य होता, तो आज मगध के राजकुमार का हृदय किसी राजकुमारी की ओर न खिंच कर एक कृषक-बालिका का अपमान करने न आता। मधूलिका उठ खड़ी हुई।

चोट खाकर राजकुमार लौट पड़ा। किशोर किरणों में उसका रत्नकिरीट चमक उठा। अश्व वेग से चला जा रहा था और मधूलिका निष्ठुर प्रहार करके क्या स्वयं आहत न हुई? उसके हृदय में टीस-सी होने लगी। वह सजल नेत्रों से उड़ती हुई धूल देखने लगी।

मधूलिका ने राजा का प्रतिपादन, अनुग्रह नहीं लिया। वह दूसरे खेतों में काम करती और चौथे पहर रूखी-सूखी खाकर पड़ रहती। मधूक-वृक्ष के नीचे छोटी-सी पर्णकुटीर थी। सूखे डंठलों से उसकी दीवार बनी थी। मधूलिका का वही आश्रय था। कठोर परिश्रम से जो रूखा अन्न मिलता, वही उसकी साँसों को बढ़ाने के लिए पर्याप्त था।

दुबली होने पर भी उसके अंग पर तपस्या की कान्ति थी। आस-पास के कृषक उसका आदर करते। वह एक आदर्श बालिका थी। दिन, सप्ताह, महीने और वर्ष बीतने लगे।

शीतकाल की रजनी, मेघों से भरा आकाश, जिसमें बिजली की दौड़-धूप। मधूलिका का छाजन टपक रहा था! ओढऩे की कमी थी। वह ठिठुरकर एक कोने में बैठी थी। मधूलिका अपने अभाव को आज बढ़ाकर सोच रही थी। जीवन से सामञ्जस्य बनाये रखने वाले उपकरण तो अपनी सीमा निर्धारित रखते हैं; परन्तु उनकी आवश्यकता और कल्पना भावना के साथ बढ़ती-घटती रहती है। आज बहुत दिनों पर उसे बीती हुई बात स्मरण हुई। दो, नहीं-नहीं, तीन वर्ष हुए होंगे, इसी मधूक के नीचे प्रभात में-तरुण राजकुमार ने क्या कहा था?

वह अपने हृदय से पूछने लगी-उन चाटुकारी के शब्दों को सुनने के लिए उत्सुक-सी वह पूछने लगी-क्या कहा था? दु:ख-दग्ध हृदय उन स्वप्न-सी बातों को स्मरण रख सकता था? और स्मरण ही होता, तो भी कष्टों की इस काली निशा में वह कहने का साहस करता। हाय री बिडम्बना!

आज मधूलिका उस बीते हुए क्षण को लौटा लेने के लिए विकल थी। दारिद्रय की ठोकरों ने उसे व्यथित और अधीर कर दिया है। मगध की प्रासाद-माला के वैभव का काल्पनिक चित्र-उन सूखे डंठलों के रन्ध्रों से, नभ में-बिजली के आलोक में-नाचता हुआ दिखाई देने लगा। खिलवाड़ी शिशु जैसे श्रावण की सन्ध्या में जुगनू को पकड़ने के लिए हाथ लपकाता है, वैसे ही मधूलिका मन-ही-मन कर रही थी। ‘अभी वह निकल गया’। वर्षा ने भीषण रूप धारण किया। गड़गड़ाहट बढ़ने लगी; ओले पड़ने की सम्भावना थी। मधूलिका अपनी जर्जर झोपड़ी के लिए काँप उठी। सहसा बाहर कुछ शब्द हुआ-

कौन है यहाँ? पथिक को आश्रय चाहिए।

मधूलिका ने डंठलों का कपाट खोल दिया। बिजली चमक उठी। उसने देखा, एक पुरुष घोड़े की डोर पकड़े खड़ा है। सहसा वह चिल्ला उठी-राजकुमार!

मधूलिका?-आश्चर्य से युवक ने कहा।

एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। मधूलिका अपनी कल्पना को सहसा प्रत्यक्ष देखकर चकित हो गई -इतने दिनों के बाद आज फिर!

अरुण ने कहा-कितना समझाया मैंने-परन्तु…..

मधूलिका अपनी दयनीय अवस्था पर संकेत करने देना नहीं चाहती थी। उसने कहा-और आज आपकी यह क्या दशा है?

सिर झुकाकर अरुण ने कहा-मैं मगध का विद्रोही निर्वासित कोशल में जीविका खोजने आया हूँ।

मधूलिका उस अन्धकार में हँस पड़ी-मगध का विद्रोही राजकुमार का स्वागत करे एक अनाथिनी कृषक-बालिका, यह भी एक विडम्बना है, तो भी मैं स्वागत के लिए प्रस्तुत हूँ।

शीतकाल की निस्तब्ध रजनी, कुहरे से धुली हुई चाँदनी, हाड़ कँपा देनेवाला समीर, तो भी अरुण और मधूलिका दोनों पहाड़ी गह्वर के द्वार पर वट-वृक्ष के नीचे बैठे हुए बातें कर रहे हैं। मधूलिका की वाणी में उत्साह था, किन्तु अरुण जैसे अत्यन्त सावधान होकर बोलता।

मधूलिका ने पूछा-जब तुम इतनी विपन्न अवस्था में हो, तो फिर इतने सैनिकों को साथ रखने की क्या आवश्यकता है?

मधूलिका! बाहुबल ही तो वीरों की आजीविका है। ये मेरे जीवन-मरण के साथी हैं, भला मैं इन्हें कैसे छोड़ देता? और करता ही क्या?

क्यों? हम लोग परिश्रम से कमाते और खाते। अब तो तुम…।

भूल न करो, मैं अपने बाहुबल पर भरोसा करता हूँ। नये राज्य की स्थापना कर सकता हूँ। निराश क्यों हो जाऊँ?-अरुण के शब्दों में कम्पन था; वह जैसे कुछ कहना चाहता था; पर कह न सकता था।

नवीन राज्य! ओहो, तुम्हारा उत्साह तो कम नहीं। भला कैसे? कोई ढंग बताओ, तो मैं भी कल्पना का आनन्द ले लूँ।

कल्पना का आनन्द नहीं मधूलिका, मैं तुम्हे राजरानी के सम्मान में सिंहासन पर बिठाऊँगा! तुम अपने छिने हुए खेत की चिन्ता करके भयभीत न हो।

एक क्षण में सरल मधूलिका के मन में प्रमाद का अन्धड़ बहने लगा-द्वन्द्व मच गया। उसने सहसा कहा-आह, मैं सचमुच आज तक तुम्हारी प्रतीक्षा करती थी, राजकुमार!

अरुण ढिठाई से उसके हाथों को दबाकर बोला-तो मेरा भ्रम था, तुम सचमुच मुझे प्यार करती हो?

युवती का वक्षस्थल फूल उठा, वह हाँ भी नहीं कह सकी, ना भी नहीं। अरुण ने उसकी अवस्था का अनुभव कर लिया। कुशल मनुष्य के समान उसने अवसर को हाथ से न जाने दिया। तुरन्त बोल उठा-तुम्हारी इच्छा हो, तो प्राणों से पण लगाकर मैं तुम्हें इस कोशल-सिंहासन पर बिठा दूँ। मधूलिके! अरुण के खड्ग का आतंक देखोगी?-मधूलिका एक बार काँप उठी। वह कहना चाहती थी…नहीं; किन्तु उसके मुँह से निकला-क्या?

सत्य मधूलिका, कोशल-नरेश तभी से तुम्हारे लिए चिन्तित हैं। यह मैं जानता हूँ, तुम्हारी साधारण-सी प्रार्थना वह अस्वीकार न करेंगे। और मुझे यह भी विदित है कि कोशल के सेनापति अधिकांश सैनिको के साथ पहाड़ी दस्युओं का दमन करने के लिए बहुत दूर चले गये हैं।

मधूलिका की आँखों के आगे बिजलियाँ हँसने लगी। दारुण भावना से उसका मस्तक विकृत हो उठा। अरुण ने कहा-तुम बोलती नहीं हो?

जो कहोगे, वह करूँगी….मन्त्रमुग्ध-सी मधूलिका ने कहा।

स्वर्णमञ्च पर कोशल-नरेश अर्द्धनिद्रित अवस्था में आँखे मुकुलित किये हैं। एक चामधारिणी युवती पीछे खड़ी अपनी कलाई बड़ी कुशलता से घुमा रही है। चामर के शुभ्र आन्दोलन उस प्रकोष्ठ में धीरे-धीरे सञ्चलित हो रहे हैं। ताम्बूल-वाहिनी प्रतिमा के समान दूर खड़ी है।

प्रतिहारी ने आकर कहा-जय हो देव! एक स्त्री कुछ प्रार्थना लेकर आई है।

आँख खोलते हुए महाराज ने कहा-स्त्री! प्रार्थना करने आई? आने दो।

प्रतिहारी के साथ मधूलिका आई। उसने प्रणाम किया। महाराज ने स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा और कहा-तुम्हें कहीं देखा है?

तीन बरस हुए देव! मेरी भूमि खेती के लिए ली गई थी।

ओह, तो तुमने इतने दिन कष्ट में बिताये, आज उसका मूल्य माँगने आई हो, क्यों? अच्छा-अच्छा तुम्हें मिलेगा। प्रतिहारी!

नहीं महाराज, मुझे मूल्य नहीं चाहिए।

मूर्ख! फिर क्या चाहिए?

उतनी ही भूमि, दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की जंगली भूमि, वहीं मैं अपनी खेती करूँगी। मुझे एक सहायक मिल गया है। वह मनुष्यों से मेरी सहायता करेगा, भूमि को समतल भी बनाना होगा।

महाराज ने कहा-कृषक बालिके! वह बड़ी उबड़-खाबड़ भूमि है। तिस पर वह दुर्ग के समीप एक सैनिक महत्व रखती है।

तो फिर निराश लौट जाऊँ?

सिंहमित्र की कन्या! मैं क्या करूँ, तुम्हारी यह प्रार्थना….

देव! जैसी आज्ञा हो!

जाओ, तुम श्रमजीवियों को उसमें लगाओ। मैं अमात्य को आज्ञापत्र देने का आदेश करता हूँ।

जय हो देव!-कहकर प्रणाम करती हुई मधूलिका राजमन्दिर के बाहर आई।

दुर्ग के दक्षिण, भयावने नाले के तट पर, घना जंगल है, आज मनुष्यों के पद-सञ्चार से शून्यता भंग हो रही थी। अरुण के छिपे वे मनुष्य स्वतन्त्रता से इधर-उधर घूमते थे। झाड़ियों को काट कर पथ बन रहा था। नगर दूर था, फिर उधर यों ही कोई नहीं आता था। फिर अब तो महाराज की आज्ञा से वहाँ मधूलिका का अच्छा-सा खेत बन रहा था। तब इधर की किसको चिन्ता होती?

एक घने कुञ्ज में अरुण और मधूलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। सन्ध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षीगण अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे।

प्रसन्नता से अरुण की आँखे चमक उठीं। सूर्य की अन्तिम किरण झुरमुट में घुसकर मधूलिका के कपोलों से खेलने लगी। अरुण ने कहा-चार प्रहर और, विश्वास करो, प्रभात में ही इस जीर्ण-कलेवर कोशल-राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा और मगध से निर्वासित मैं एक स्वतन्त्र राष्ट्र का अधिपति बनूँगा, मधूलिके!

भयानक! अरुण, तुम्हारा साहस देखकर मैं चकित हो रही हूँ। केवल सौ सैनिकों से तुम…

रात के तीसरे प्रहर मेरी विजय-यात्रा होगी।

तो तुमको इस विजय पर विश्वास है?

अवश्य, तुम अपनी झोपड़ी में यह रात बिताओ; प्रभात से तो राज-मन्दिर ही तुम्हारा लीला-निकेतन बनेगा।

मधूलिका प्रसन्न थी; किन्तु अरुण के लिए उसकी कल्याण-कामना सशंक थी। वह कभी-कभी उद्विग्न-सी होकर बालकों के समान प्रश्न कर बैठती। अरुण उसका समाधान कर देता। सहसा कोई संकेत पाकर उसने कहा-अच्छा, अन्धकार अधिक हो गया। अभी तुम्हें दूर जाना है और मुझे भी प्राण-पण से इस अभियान के प्रारम्भिक कार्यों को अर्द्धरात्रि तक पूरा कर लेना चाहिए; तब रात्रि भर के लिए विदा! मधूलिके!

मधूलिका उठ खड़ी हुई। कँटीली झाड़ियों से उलझती हुई क्रम से, बढ़नेवाले अन्धकार में वह झोपड़ी की ओर चली।

पथ अन्धकारमय था और मधूलिका का हृदय भी निविड़-तम से घिरा था। उसका मन सहसा विचलित हो उठा, मधुरता नष्ट हो गई। जितनी सुख-कल्पना थी, वह जैसे अन्धकार में विलीन होने लगी। वह भयभीत थी, पहला भय उसे अरुण के लिए उत्पन्न हुआ, यदि वह सफल न हुआ तो? फिर सहसा सोचने लगी-वह क्यों सफल हो? श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाय? मगध का चिरशत्रु! ओह, उसकी विजय! कोशल-नरेश ने क्या कहा था-‘सिंहमित्र की कन्या।’ सिंहमित्र, कोशल का रक्षक वीर, उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है? नहीं, नहीं, मधूलिका! मधूलिका!!’ जैसे उसके पिता उस अन्धकार में पुकार रहे थे। वह पगली की तरह चिल्ला उठी। रास्ता भूल गई।

रात एक पहर बीत चली, पर मधूलिका अपनी झोपड़ी तक न पहुँची। वह उधेड़बुन में विक्षिप्त-सी चली जा रही थी। उसकी आँखों के सामने कभी सिंहमित्र और कभी अरुण की मूर्ति अन्धकार में चित्रित होती जाती। उसे सामने आलोक दिखाई पड़ा। वह बीच पथ में खड़ी हो गई। प्राय: एक सौ उल्काधारी अश्वारोही चले आ रहे थे और आगे-आगे एक वीर अधेड़ सैनिक था। उसके बायें हाथ में अश्व की वल्गा और दाहिने हाथ में नग्न खड्ग। अत्यन्त धीरता से वह टुकड़ी अपने पथ पर चल रही थी। परन्तु मधूलिका बीच पथ से हिली नहीं। प्रमुख सैनिक पास आ गया; पर मधूलिका अब भी नहीं हटी। सैनिक ने अश्व रोककर कहा-कौन? कोई उत्तर नहीं मिला। तब तक दूसरे अश्वारोही ने सड़क पर कहा-तू कौन है, स्त्री? कोशल के सेनापति को उत्तर शीघ्र दे।

रमणी जैसे विकार-ग्रस्त स्वर में चिल्ला उठी-बाँध लो, मुझे बाँध लो! मेरी हत्या करो। मैंने अपराध ही ऐसा किया है।

सेनापति हँस पड़े, बोले-पगली है।

पगली नहीं, यदि वही होती, तो इतनी विचार-वेदना क्यों होती? सेनापति! मुझे बाँध लो। राजा के पास ले चलो।

क्या है, स्पष्ट कह!

श्रावस्ती का दुर्ग एक प्रहर में दस्युओं के हस्तगत हो जायेगा। दक्षिणी नाले के पार उनका आक्रमण होगा।

सेनापति चौंक उठे। उन्होंने आश्चर्य से पूछा-तू क्या कह रही है?

मैं सत्य कह रही हूँ; शीघ्रता करो।

सेनापति ने अस्सी सैनिकों को नाले की ओर धीरे-धीरे बढ़ने की आज्ञा दी और स्वयं बीस अश्वारोहियों के साथ दुर्ग की ओर बढ़े। मधूलिका एक अश्वारोही के साथ बाँध दी गई।

श्रावस्ती का दुर्ग, कोशल राष्ट्र का केन्द्र, इस रात्रि में अपने विगत वैभव का स्वप्न देख रहा था। भिन्न राजवंशों ने उसके प्रान्तों पर अधिकार जमा लिया है। अब वह केवल कई गाँवों का अधिपति है। फिर भी उसके साथ कोशल के अतीत की स्वर्ण-गाथाएँ लिपटी हैं। वही लोगों की ईष्र्या का कारण है। जब थोड़े से अश्वारोही बड़े वेग से आते हुए दुर्ग-द्वार पर रुके, तब दुर्ग के प्रहरी चौंक उठे। उल्का के आलोक में उन्होंने सेनापति को पहचाना, द्वार खुला। सेनापति घोड़े की पीठ से उतरे। उन्होंने कहा-अग्निसेन! दुर्ग में कितने सैनिक होंगे?

सेनापति की जय हो! दो सौ ।

उन्हें शीघ्र ही एकत्र करो; परन्तु बिना किसी शब्द के। सौ को लेकर तुम शीघ्र ही चुपचाप दुर्ग के दक्षिण की ओर चलो। आलोक और शब्द न हों।

सेनापति ने मधूलिका की ओर देखा। वह खोल दी गई। उसे अपने पीछे आने का संकेत कर सेनापति राजमन्दिर की ओर बढ़े। प्रतिहारी ने सेनापति को देखते ही महाराज को सावधान किया। वह अपनी सुख-निद्रा के लिये प्रस्तुत हो रहे थे; किन्तु सेनापति और साथ में मधूलिका को देखते ही चञ्चल हो उठे। सेनापति ने कहा-जय हो देव! इस स्त्री के कारण मुझे इस समय उपस्थित होना पड़ा है।

महाराज ने स्थिर नेत्रों से देखकर कहा-सिंहमित्र की कन्या! फिर यहाँ क्यों? क्या तुम्हारा क्षेत्र नहीं बन रहा है? कोई बाधा? सेनापति! मैंने दुर्ग के दक्षिणी नाले के समीप की भूमि इसे दी है। क्या उसी सम्बन्ध में तुम कहना चाहते हो?

देव! किसी गुप्त शत्रु ने उसी ओर से आज की रात में दुर्ग पर अधिकार कर लेने का प्रबन्ध किया है और इसी स्त्री ने मुझे पथ में यह सन्देश दिया है।

राजा ने मधूलिका की ओर देखा। वह काँप उठी। घृणा और लज्जा से वह गड़ी जा रही थी। राजा ने पूछा-मधूलिका, यह सत्य है!

हाँ, देव!

राजा ने सेनापति से कहा-सैनिकों को एकत्र करके तुम चलो मैं अभी आता हूँ। सेनापति के चले जाने पर राजा ने कहा-सिंहमित्र की कन्या! तुमने एक बार फिर कोशल का उपकार किया। यह सूचना देकर तुमने पुरस्कार का काम किया है। अच्छा, तुम यहीं ठहरो। पहले उन आतताईयों का प्रबन्ध कर लूँ।

अपने साहसिक अभियान में अरुण बन्दी हुआ और दुर्ग उल्का के आलोक में अतिरञ्जित हो गया। भीड़ ने जयघोष किया। सबके मन में उल्लास था। श्रावस्ती-दुर्ग आज एक दस्यु के हाथ में जाने से बचा था। आबाल-वृद्ध-नारी आनन्द से उन्मत्त हो उठे।

ऊषा के आलोक में सभा-मण्डप दर्शकों से भर गया। बन्दी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हूँकार करते हुए कहा-‘वध करो!’ राजा ने सबसे सहमत होकर आज्ञा दी-‘प्राण दण्ड।’ मधूलिका बुलायी गई। वह पगली-सी आकर खड़ी हो गई। कोशल-नरेश ने पूछा-मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, माँग। वह चुप रही।

राजा ने कहा-मेरी निज की जितनी खेती है, मैं सब तुझे देता हूँ। मधूलिका ने एक बार बन्दी अरुण की ओर देखा। उसने कहा-मुझे कुछ न चाहिए। अरुण हँस पड़ा। राजा ने कहा-नहीं, मैं तुझे अवश्य दूँगा। माँग ले।

तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले। कहती हुई वह बन्दी अरुण के पास जा खड़ी हुई।

पुरूस्कार कहानी के शब्दार्थ-

  • घोष= आवाज।
  • प्राची = पूर्व दिशा।
  • निरभ्र = साफ।
  • तोरण = द्वार।
  • शृंड = सँड़।
  • स्वर्ण पुरुष = सूर्य।
  • हेम = सोना।
  • पल्लवं = पत्ते।
  • खील = भुना धान।
  • स्वस्त्ययन = मांगलिक मंत्रोच्चारण।
  • पुष्ट = स्वस्थ।
  • कौशेय वसन = रेशमी वस्त्र।
  • अलकों = बाल।
  • श्रमकण = पसीने की बूंदें।
  • अनुग्रह = कृपा, दया।
  • ऊर्जस्वित = ऊर्जा से पूर्ण।
  • भृकुटि = भौंहें।
  • सामर्थ्य = क्षमता।
  • अन्यतम = अनन्य।
  • विसर्जित = भंग।
  • शिविर = तम्बू।
  • अनमनी = उदास।
  • कपोती = कबूतरी।
  • तुरंग = घोड़ा।
  • पुलकित = रोमांचित।
  • छिन्न= टूटी हुई।
  • च्युत = अलग।
  • निष्पंद = शान्त।
  • कोकिल= कोयल।
  • भद्र, भद्रे= सम्बोधन के लिए प्रयुक्त शब्द॥
  • अभिनय = नाटक।
  • विडंबना = दुर्भाग्य।
  • अवगुंठन = पूँघट, छिपा रहना।
  • उपहास = हँसी।
  • किरीट = मुकुट।
  • निष्ठुर = निर्दय।
  • प्रहार = चोट।
  • आहत = चोटिल।
  • प्रतिदान = बदले में दी गई वस्तु।
  • पर्ण कुटीर = पत्तों से बनी झोंपड़ी।
  • छाजन = छप्पर।
  • उपकरण = वस्तुएँ, औजार।
  • तरुण = युवक।
  • चाटुकारी = चापलूसी।
  • दग्ध = जला हुआ।
  • व्यथित = व्याकुल।
  • प्रासाद-माला = महलों की पंक्ति।
  • रंध्र = छेद।
  • आलोक = प्रकाश।
  • जर्जर = टूटी-फूटी।
  • कपाट = किबाड़।
  • प्रत्यक्ष = आँखों के सामने।
  • दयनीय = दया के योग्य।
  • निर्वासित = देश से निकाला हुआ।
  • जीविका = रोजगार। निस्तब्ध = शान्त।
  • समीर = हवा। गह्वर = गुफा।
  • वटवृक्ष = बरगद का पेड़।
  • विपन्न = निर्धन, दयनीय।
  • कम्पन्न = कँपकँपाहट।
  • अंधड़ = आँधी। द्वंद्व = अनिश्चय।
  • दारुण = भयंकर। विकृत = अस्वस्थ, खराब।
  • चामर = बालों का बना पंखा। तांबूल = पान।
  • प्रतिहारी = रक्षक॥ (पृष्ठ सं. 56) श्रमजीवी = मजदूर।
  • अमात्य = मंत्री। राजमन्दिर = राजमहल।
  • पदसंचार = चलना। शून्यता = सूनापन।
  • निविड़ = सघन। कोलाहल = शोर। जीर्ण = पुराना।
  • कलेवर = शरीर। अभिषेक = तिलक।
  • अधिपति = स्वामी। उद्विग्न = व्याकुल॥
  • प्राणपन से = पूरी शक्ति से।
  • निविड़ तम = घना अँधेरा।
  • विक्षिप्त = पागल।
  • उधेड़-बुन = सोच-विचार।
  • आलोक = प्रकाश।
  • उल्काधारी = मशाल हाथों में लिए।
  • अवश्वारोही = घुड़सवार। बला = लगाम।
  • रमणी = स्त्री। विकारग्रस्त = बुरे, दोषपूर्ण।
  • विचार-वेदना = विचारों की पीड़ा।
  • दस्यु = डाकू॥
  • विगत = बीता हुआ। अधिपति = स्वामी।
  • अतीत = भूतकाल।
  • स्वर्णगाथा = सम्मानजनक कथाएँ।
  • ईर्ष्या = जलन। प्रतिहारी = द्वारपाल, रक्षक।
  • आतताई = आतंकवादी। आबाल-वृद्ध = बच्चों से बूढ़ों तक।
  • उन्मत्त = पागल।
  • बंदी = कैदी।
  • प्राणदण्ड = मृत्यु की सजा॥
पुरस्कार (कहानी) जयशंकर प्रसाद

पुरूस्कार कहानी के वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मधूलिका का “मन सहसा विचलित हो उठा, मधुरता नष्ट हो गई।” क्योंकि
(क) वह राजरानी बनने वाली है।
(ख) कहीं चूक में राजकुमार असफल हो गया तो?
(ग) मैंने व्यक्तिगत सुख के लिए कोसल को खतरे में डालकर ठीक नहीं किया
(घ) इस रात्रि में कैसा भीषण चक्र होगा! मुझे भी साथ जाना चाहिए था।
उत्तर:
(ग) मैंने व्यक्तिगत सुख के लिए कोसल को खतरे में डालकर ठीक नहीं किया

प्रश्न 2.
मधूलिका ने पुरस्कार स्वरूप राजा से क्या माँगा?
(क) स्वर्ण मुद्राएँ
(ख) खेती की भूमि
(ग) अरुण के साथ प्राणदण्ड
(घ) अपने लिए पृथक दुर्ग।
उत्तर:
(ग) अरुण के साथ प्राणदण्ड

प्रश्न 3.
मधूलिका के मन में द्वन्द्व था –
(क) अपने प्रेम के बारे में।
(ख) अरुण की सफलता के बारे में।
(ग) देशप्रेम और अपने प्रेम के बारे में
(घ) अपनी भूमि का मूल्य लेने न लेने के बारे में।
उत्तर:
(ग) देशप्रेम और अपने प्रेम के बारे में

प्रश्न 4.
कितना भोला सौन्दर्य कितनी सरल चितवन! ‘ कथन किसका है?
(क) मधूलिका का
(ख) राजकुमार अरुण का
(ग) कोसलनरेश का
(घ) सेनापति का
उत्तर:
(ख) राजकुमार अरुण का

प्रश्न 5.
अरुण जिस घोड़े पर सवार था वह था –
(क) सिंधु देश का
(ख) मगध देश का
(ग) पंजाब देश का
(घ) कोसल देश का
उत्तर:
(क) सिंधु देश का

प्रश्न 6.
पुरस्कार’ कहानी है –
(क) नाटक प्रधान
(ख) घटना प्रधान
(ग) नायिका प्रधान
(घ) वर्णन प्रधान
उत्तर:
(ग) नायिका प्रधान

प्रश्न 7.
मधूलिका के पिता का नाम है –
(क) पुष्यमित्र
(ख) शम्भुमित्र
(ग) सन्मित्र
(घ) सिंहमित्र
उत्तर:
(घ) सिंहमित्र

पुरस्कार कहानी के प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
“मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य से बाहर है”-मधूलिका ने ऐसा क्यों कहा?
उत्तर:
मधूलिका पूर्वजों की भूमि को बेचना नहीं चाहती थी। महाराज और उनका मंत्री पुरस्कार रूप में स्वर्ण मुद्राएँ स्वीकार करने पर जोर दे रहे थे। ये मुद्राएँ भूमि के मूल्य की चार गुनी थीं। अत: उत्तेजित होकर मधूलिका ने ऐसा कहा।

प्रश्न 2.
“मैं सच कह रही हूँ। शीघ्रती करो।” यह किसने, कब और किससे कहा?
उत्तर:
यह शब्द मधूलिका ने सेनापति से कहे। रात में घर जाते समय मार्ग में उसे सैनिकों का दल मिला था, तब उसने सेनापति को श्रावस्ती दुर्ग पर आक्रमण होने की सूचना दी थी।

प्रश्न 3.
मधूलिका ने कोसल पर क्या उपकार किया?
उत्तर:
मधूलिका ने श्रावस्ती दुर्ग पर आक्रमण होने की पूर्व सूचना देकर कोसल को पराधीन होने से बचा लिया था।

पुरस्कार (कहानी) जयशंकर प्रसाद

प्रश्न 4.
अरुण कौन था?
उत्तर:
अरुण मगध का निर्वासित राजकुमार था।

प्रश्न 5.
मधूलिका ने अपने लिए भूमि कहाँ माँगी?
उत्तर:
मधूलिका ने श्रावस्ती दुर्ग के दक्षिण में नाले के समीप अपने लिए भूमि माँगी।

प्रश्न 6.
मंधूलिका का परिचय दीजिए।

उत्तर:
मधूलिका कोसल के अनन्य वीर सिंहमित्र की एकमात्र कन्या है। उसकी भूमि कृषि महोत्सव के लिए कोसल द्वारा ली जा चुकी है। उसने मूल्य स्वीकार नहीं किया है। श्रम करके अपना पेट भरती है। वह राजकुमार अरुण से प्रेम करती है परन्तु अपने प्रेम से स्वदेश प्रेम उसकी दृष्टि में बड़ा है।

प्रश्न 7.
कोसल के उत्सव का परम्परागत नियम क्या था?

उत्तर:
उत्सव प्रतिवर्ष होता था। किसी किसान की भूमि राज्य द्वारा ली जाती थी। उसका चार गुना मूल्य दिया जाता था। महाराज उस भूमि पर बीज बोते थे। फसल की देखभाल, जिसकी भूमि ली जाती थी, वही करता था। वह खेत महाराज का खेत कहा जाता था।

प्रश्न 8.
‘मधूलिका अपने अभाव को आज बढ़ाकर सोच रही थी।’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
मधूलिका टूटी-फूटी कुटिया में रह रही थी। दूसरों के खेतों पर काम करके जो मिलता उसी से पेट भरती थी। राज्य द्वारा खेती ले लेने के बाद उसका जीवन अभावों से भर उठा था। अरुण का स्मरण करके उसको अपने अभाव और अधिक बढ़े हुए लग रहे थे।

प्रश्न 9.
मधूलिका ने राजा से भूमि का मूल्य क्यों स्वीकार नहीं किया?

उत्तर:
मधूलिका ने राजा से भूमि का मूल्य स्वीकार नहीं किया। वह उसके पूर्वजों की भूमि थी। पूर्वजों की भूमि को बेचना अपराध होता है। अतः भूमि का मूल्य स्वीकार करना उसकी दृष्टि में अनुचित था।

प्रश्न 10.
मधूलिका के पिता कौन थे? उन्होंने क्या कार्य किया था?

उत्तर:
सिंहमित्र मधूलिका के पिता थे। वह कोसल के अप्रतिम वीर थे। मगध से कोसल की रक्षा के लिए उन्होंने युद्ध किया था और देश की रक्षा के लिए अपने प्राण त्यागे थे।

प्रश्न 11.
पुरस्कार’ कहानी का संदेश क्या है?

उत्तर:
‘पुरस्कार’ कहानी का संदेश है कि देश व्यक्ति से बड़ा है। देशप्रेम के लिए व्यक्तिगत हित का बलिदान करना चाहिए।

प्रश्न 12.
मधूलिका कौन थी?

उत्तर:
मधूलिका कोसल के रक्षक अन्यतम वीर सिंहमित्र की पुत्री थी।

प्रश्न 13.
मधूलिका ने स्वर्ण मुद्राएँ क्यों महाराज पर न्यौछावर कर दीं?

उत्तर:
मधूलिका अपने पूर्वजों की भूमि को बेचना नहीं चाहती थी। उसने विनम्रतापूर्वक मुद्राएँ महाराज पर न्यौछावर कर दीं।

प्रश्न 14.
अरुण कौन था?

उत्तर:
अरुण मगध का राजकुमार था। वह मधूलिका का प्रेमी था। बाद में उसको मगध से निर्वासित कर दिया गया था। कोसल के विरुद्ध षड्यंत्र करने पर उसे प्राणदण्ड मिला था।

प्रश्न 15.
मधूलिका कैसी बालिका थी?

उत्तर:
मधूलिका स्वामिनी, देशप्रेमी तथा वाक्पटु थी। वह सभी कृषकों की प्रिय थी। वह अत्यन्त परिश्रमी थी।

प्रश्न 16.
अपनी खेती छिन जाने पर मधूलिका अपना जीवन-यापन कैसे करती थी?

उत्तर:
मधूलिका दूसरों के खेतों में श्रमिक के रूप में काम करती थी और जो कुछ मिलता था उसी से जीवन-यापन करती थी। वह मधूक वृक्ष के नीचे पर्णकुटी में रहती थी।

प्रश्न 17.
मधूलिका ने महाराज से दुर्ग के दक्षिण की भूमि क्यों माँगी थी?
.
उत्तर:
मधूलिका ने राजकुमार अरुण के प्रेम में ग्रस्त होकर उसके षड्यंत्र में शामिल होना स्वीकार कर लिया था। उसने अरुण के कहने पर महाराज से वह भूमि माँगी थी।

प्रश्न 18.
मधूलिका की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:
मधूलिका जयशंकर प्रसाद के नारी पात्रों में अनुपम और अद्भुत है। वह नायिका प्रधान कहानी पुरस्कार की नायिका है। उसके चरित्र की अनेक विशेषताएँ हैं।

कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:-


परम सुन्दरी-

मधूलिका मोहक सौन्दर्य की स्वामिनी है। प्रसाद जी ने उसका वर्णन इन शब्दों में किया है। वह कुमारी थी, सुन्दरी थी, कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था।’ राजकुमार अरुण उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर कहता है-“आह, कितना भोला सौन्दर्य! कितनी सरल चितवन !”

स्वाभिमानिनी और निर्भीक –

मधूलिका स्वाभिमानिनी है। वह पूर्वजों की भूमि का मूल्य स्वीकार नहीं करती। वह परिश्रम करके जो कुछ मिलता है, उसी से गुजारा करती है। वह मधूक वृक्ष के नीचे जीर्ण पर्णकुटी में रहती है। मेधूलिका निर्भीक है। वह महाराज और उनके मंत्री से स्पष्ट शब्दों में कहती है-“राजकीय रक्षण की अधिकारी तो सारी प्रजा है मंत्रिवर-महाराज को भूमि समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध न था न है परन्तु मूल्य स्वीकार करना असंभव है।

आदर्श प्रेमिका –

मधूलिका आदर्श प्रेमिका है। वह अरुण के पहले प्रेम प्रस्ताव को चतुराई से अस्वीकार कर देती है। दूसरी बार उसको मगध से निर्वासित जानकर अपने समान मानकर उसका प्रेम स्वीकार कर लेती है। प्रेम के पागलपन में वह स्वदेश के विरुद्ध अरुण का साथ देती है परन्तु शीघ्र सँभल जाती है। वह स्वदेश को विदेशी के हाथों जाने से बचा लेती है परन्तु अरुण को प्राणदण्ड मिलने पर अपने लिए भी प्राणदण्ड माँगकर अपने पवित्र प्रेम का परिचय देती है। द्वन्द्वपूर्ण-मधूलिका का मन देशप्रेम और अरुण से प्रेम के बीच द्वन्द्व में पड़ा है। इस संघर्ष में विजय देशप्रेम की होती है। वह अपने प्रेम के लिए अपने जीवन का भी बलिदान देने को तैयार हो जाती है। महाराज के पुरस्कार माँगने का आग्रह करने पर कहती है-‘तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले।’ इस प्रकार मधूलिका प्रसाद जी की अनुपम सृष्टि है।

प्रश्न 19.
निर्वासित अरुण की दुर्ग पर अधिकार करने की क्या योजना थी?

उत्तर:
कोसल के कृषि उत्सव में पहली बार मगध का राजकुमार अरुण मधूलिका से मिला था और उसे प्रेम-प्रस्ताव दिया था परन्तु कृषक बालिका ने राजकुमार का वह प्रस्ताव स्तरानुकूल न होने से स्वीकार नहीं किया था। इसके पश्चात् अरुण मगध से निर्वासित कर दिया गया। वह कोसल आया। उसका विचार था कि वह मधूलिका की सहायता से कोसले पर अधिकार कर लेगा। उसे भरोसा था कि मधूलिका उसको प्रेम करती है और इस विजय में वह उसका सहयोग करेगी। अपनी योजना के अनुसार उसने मधूलिका को अपने प्रेम का वास्ता देकर अपनी योजना के बारे में बताया। वह जानता था कि कोसल राज्य कमजोर हो चुका है।

उसके सेनापति पहाड़ी दस्युओं का दमन करने के लिए नगर से बाहर गए हैं। महाराज मधूलिका को उसकी भूमि के बदले पुरस्कार देना चाहते हैं। उसने मधूलिका से कहा कि वह श्रावस्ती दुर्ग के दक्षिण में नाले के पास की भूमि महाराज से खेती के लिए माँग ले। उसके कहने पर मधूलिका ने वह भूमि महाराज से ले ली। अब अरुण ने रात के समय उस ओर से दुर्ग पर आक्रमण करके उस पर अधिकार करने की बात मधूलिका को समझाई और प्रभात होते ही उसे कोसल के राजसिंहासन पर बैठाने का वायदा किया। परन्तु मधूलिका को यह उचित नहीं लगा। उसके मन में देशप्रेम का भाव प्रबल था। उसने उसकी योजना कोसल के सेनापति को बता दी और अरुणं बन्दी बना लिया गया।

प्रश्न 20.
“जीवन के सामंजस्य बनाए रखने वाले उपकरण तो अपनी सीमा निर्धारित रखते हैं; परन्तु उनकी आवश्यकता और कल्पना भावना के साथ घटती-बढ़ती रहती है।” उक्त पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
मधूलिका ने अपनी भूमि के बदले राजकीय अनुग्रह स्वीकार नहीं किया था। दूसरों के खेतों पर श्रम करके वह अपना पेट पालती थी और मधूक वृक्ष के नीचे एक जीर्ण पर्णकुटी में अपना समय काटती थी। एक बार शीतकालीन रात थी। आकाश में बादल छाए थे। बिजली चमक रही थी। उसकी झोंपड़ी टपक रही थी। ओढ़ने के वस्त्र नहीं थे। वह सर्दी के कारण ठिठुरी हुई एक कोने में बैठी थी। मनुष्य को जीवन के साथ सामंजस्य बनाने वाली अनेक चीजों की आवश्यकता होती है। कभी यह आवश्यकता अधिक होती है तो कभी कम भी होती है। उन उपकरणों की एक निर्धारित सीमा होती है। मनुष्य की जैसी भावना होती है, उसी के अनुसार वह उन वस्तुओं की आवश्यकता अनुभव करता है। वह उन उपकरणों की कल्पना भी अपनी भावना के अनुसार ही करता है।

इस कष्टपूर्ण क्षण में मधूलिका को बहुत दिन पूर्व हुई अरुण की भेंट स्मरण हुई। उसने कहा था वह उसका राजरानी बनाएगा। आज मधूलिका ने अपनी भावना के अनुसार अरुण के कहे शब्दों को स्मरण किया। आज उसको उन बातों को पुनः स्मरण करने की आवश्यकता हो रही थी।

प्रश्न 21.
राजकुमार अरुण आपकी दृष्टि में कैसा पात्र है?

उत्तर:
राजकुमार अरुण पुरस्कार कहानी का दूसरा प्रमुख पात्र है। वह मगध से निर्वासित है। वह महत्वाकांक्षी है तथा उसको अपने बाहुबल पर भरोसा है। अपने दुस्साहस के फलस्वरूप वह प्राणदण्ड पाता है।

प्रश्न 22.
राजकुमार अरुण क्या सचमुच मधूलिका से प्रेम करता है ?

उत्तर:
प्रथम भेंट के अवसर पर राजकुमार अरुण मधूलिका के समक्ष प्रेम प्रस्ताव रखता है। उस समय वह मधूलिका के रूप-सौन्दर्य पर मोहित है। मगध से निर्वासन के पश्चात् वह पुन: कोसल आता है और मधूलिका से मिलता है। वह मधूलिका को अपने प्रेम का स्मरण दिलाता है और उसके सामने अपनी दुस्साहसपूर्ण योजना रखता है। वह मधूलिका को देशद्रोह के लिए उकसाता है। उसका लक्ष्य मधूलिका की सहायता से कोसल पर अधिकार करना है। उसका पहला स्वरूप उसे रूप लोलुप तथा दूसरा स्वरूप स्वार्थी सिद्ध करते हैं। वह सच्चा प्रेमी नहीं है।

प्रश्न 30.
कोसल के महाराज के चरित्र क्या विशेषताएँ हैं ?

उत्तर:
कोसल के महाराज सरल हृदय के पुरुष हैं। वह प्रजा के प्रिय हैं। उनको अपने सैनिकों, सेनापित, मंत्री आदि का विश्वास प्राप्त है। मधूलिका के प्रति उनके हृदय में उदारता है। वह उससे स्नेह करते हैं तथा उसको उपकृत करना चाहते हैं।

प्रश्न 31.
‘पुरस्कार’ शब्द का प्रयोग इस कहानी में कहाँ-कहाँ हुआ है ?

उत्तर:
‘पुरस्कार’ शब्द का प्रयोग मधूलिका को खेत के बदले दिए गए धन के लिए हुआ है। दूसरी बार इसका प्रयोग कहानी के अन्त में हुआ है। महाराज मधूलिका से पुरस्कार माँगने के लिए कहते हैं क्योंकि उसने दुर्ग पर आक्रमण की पूर्व सूचना दी थी। मधूलिका कुछ नहीं माँगती। अधिक कहने पर मधूलिका पुरस्कारस्वरूप अपने लिए प्राणदण्ड माँगती है।

प्रश्न 32.
‘मधूलिका प्रसन्न थी किन्तु अरुण के लिए उसकी कल्याण-कामना सशंक थी’-इस कथन का आशय क्या है ?

उत्तर:
एक घने कुंज में मधूलिका और अरुण बातें कर रहे थे। अरुण ने उससे कहा कि रात के तीसरे प्रहर वह दुर्ग पर आक्रमण करेगा। सबेरे वह उसे राजरानी को रूप में सिंहासन पर बिठायेगा। मधूलिका ने उससे पूछा कि क्या उसे अपनी विजय पर विश्वास है। अरुण ने उसे आश्वस्त किया। मधूलिका इससे प्रसन्न थी किन्तु उसके मन में अरुण की सफलता पर शंका बनी थी। वह उसके कल्याण के प्रति शंकित थी।

प्रश्न 33.
राजा ने मधूलिका की ओर देखा-घृणा और लज्जा से वह गढ़ी जा रही थी। मधूलिका को घृणा तथा लज्जा क्यों हो रही थी?

उत्तर:
सेनापति ने राजा को बताया कि इस स्त्री ने (मधूलिका) ने उसे दुर्ग के दक्षिण की ओर से रात में आक्रमण होने की सूचना दी है। मधूलिका ने दुर्ग के दक्षिण की भूमि अपने खेत के बदले राजा से माँगी थी, उसी भूमि से अरुण दुर्ग पर आक्रमण करने वाला था। अपने कृत्य का स्मरण कर मधूलिका को लज्जा आ रही थी और वह घृणा से गढ़ी जा रही थी।

प्रश्न 34.
श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के हाथ में क्यों जाय।’ मधूलिका का ऐसा सोचने के पीछे क्या कारण है?

उत्तर:
मधूलिका ने अरुण के प्रेम में अन्धी होकर कोसल राज्य पर अधिकार करने की उसकी योजना में सहयोग किया था। अब उसको लग रहा था कि अरुण अपने काम में सफल हो जायेगा। उसको अपनी भूल समझ में आ रही थी। एक देशभक्त पिता की बेटी होकर वह देशद्रोह का पाप करने चली थी। उसका मन उसको धिक्कार रहा था। वह सोच रही थी कि अपने स्वार्थ के लिए उसको ऐसा काम नहीं करना चाहिए। मधूलिका का हृदय-परिवर्तन तथा मन में देशभक्ति का उदय ही इस सोच का कारण है।

प्रश्न 35.
कोसल के उत्सव के नियमों का उल्लंघन मधूलिका ने क्यों किया ?

उत्तर:
कोसल के उत्सव के कुछ नियम थे। उनके अनुसार राज्य द्वारा उसकी भूमि ली गई थी तथा पुरस्कारस्वरूप चार गुना मूल्य दिया गया था। यह स्वीकर न करके मधूलिका ने नियमों का उल्लंघन किया था। नियमों के उल्लंघन के पीछे मधूलिका का स्वार्थ अथवा विद्रोह कारण नहीं थे। वह अपने पूर्वजों की भूमि बेचना नहीं चाहती थी। पुरस्कार की धनराशि में भूमि का मूल्य ही था। अत: उसने इसको स्वीकार नहीं किया।

प्रश्न 36.
मधूलिका ने अरुण की योजना सेनापति को क्यों बताई?

उत्तर:
मधूलिका अपने देश से प्रेम करती थी। उसके मन में अपने प्रेम तथा देश के प्रति कर्तव्य के बीच भीषण हलचल हो रही थी। अन्त में देशप्रेम की भावना के प्रबल होने पर उसने कोसल को बचाने के लिए अरुण की योजना सेनापति को बता दी।

प्रश्न 37.
मधूलिका ने महाराज से अपने लिए प्राणदण्ड क्यों माँगा?

उत्तर:
मधूलिका राजकुमार से प्रेम करती थी। कोसल को हस्तगत करने की योजना में उसने उसकी सहयोग किया था। वह स्वयं को भी देशद्रोह का अपराधी समझती थी।

प्रश्न 38.
राजकुमार अरुण ने मधूलिका को अपनी योजना में सहयोगिनी क्यों बनाया था?

उत्तर:
अरुण जानता था कि वह अपनी योजना को मधूलिका के सहयोग से ही पूरा कर सकेगा। दुर्ग के दक्षिण की भूमि उसे. मधूलिका की सहायता से ही मिल सकती थी। वहाँ से वह दुर्ग पर आक्रमण करता।

प्रश्न 39.
चोट खाकर राजकुमार लौट पड़ा-‘ राजकुमार को किसकी चोट लगी थी ?

उत्तर:
मधूलिका ने राजकुमार को प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया था। राजकुमार को इस बात की चोट लगी और वह लौट पड़ा।

प्रश्न 40.
अपकी दृष्टि में राजकुमार अरुण का मधूलिका के प्रति प्रेम कैसा था ?

उत्तर:
मधूलिका के प्रति राजकुमार अरुण का प्रेम नि:स्वार्थ नहीं था। वह उसकी सहायता से कोसल पर विजय पाना चाहता

प्रश्न 41.
‘मधूलिका ! यह सत्य है ?’ महाराज ने मधूलिका से क्या जानना चाहा ?

उत्तर:
महाराज जानना चाहते थे कि सेनापति द्वारा दी गई सूचना कि कोई गुप्त शत्रु दुर्ग पर रात्रि में आक्रमण करेगा-क्या सच

प्रश्न 42.
यदि मधूलिका सेनापति को अरुण की योजना के बारे में न बताती तो क्या होता ?

उत्तर:
यदि मधूलिका सेनापति को अरुण की योजना के बारे में न बताती तो अरुण श्रावस्ती दुर्ग पर अधिकार करने में सफल हो जाता और कोसल का पतन हो जाता।

प्रश्न 43.
मधूलिका पुरस्कार के रूप में अरुण के लिए क्षमादान माँग सकती थी, उसने ऐसा क्यों नहीं किया ?

उत्तर:
मधूलिका जानती थी कि कोसल की जनता को यह स्वीकार नहीं होगा। अतः उसने ऐसा पुरस्कार न माँग कर अपने लिए प्राणदण्ड माँगा।

प्रश्न 44.
कोसल में कौन-सा उत्सव मनाया जाता था ?

उत्तर:
कोसल में कृषि-उत्सव मनाया जाता था। महाराज एक दिन के लिए कृषक बनते थे। खेत में स्वर्ण जड़ित हल चलाते थे और बीज बोते थे। उसके लिए किसी कृषक का खेत चार गुना मूल्य देकर ले लिया जाता था। वह महाराज का खेत कहलाता था।

प्रश्न 45.
कोसल के महाराज के साथ खेत में मधूलिका क्या कर रही थी तथा क्यों ?

उत्तर:
मधूलिका महाराज के साथ खेत में बीज बो रही थी। महाराज के संकेत पर वह बीजों भरी थाली उनके सामने कर देती थी। उस वर्ष महाराज की खेती के लिए मधूलिका का ही खेत लिया गया था। अतः बीज देने का सम्मान उसी को प्राप्त हुआ था।

प्रश्न 46.
‘पुरस्कार’ कहानी के प्रमुख पात्रे कौन-कौन हैं ?

उत्तर:
‘पुरस्कार’ कहानी की प्रधान पात्र तथा नायिका मधूलिका है। दूसरा प्रमुख पात्र अरुण है। वह मगध का निर्वासित महत्वाकांक्षी राजकुमार है। इनके अतिरिक्त कोसल नरेश, कोसल के सेनापति, प्रतिहारी, सैनिक आदि पात्र हैं। प्रमुख पात्र दो ही हैं।

प्रश्न 47.
पुरस्कार’ कहानी में मधूलिका का क्या महत्व है?

उत्तर:
‘पुरस्कार’ कहानी का घटनाक्रम उसी के आसपास घूमता है। अन्य पात्रों के साथ जुड़कर वही कहानी के कथानक को आगे बढ़ाता है। अपनी भूमि के बदले पुरस्कार लेने से वही मना करती है और पुरस्कारस्वरूप अपने लिए प्राणदण्ड वही माँगती है।

प्रश्न 48.
देशकाल की दृष्टि से पुरस्कार’ कैसी कहानी है?

उत्तर:
‘प्रसाद’ जी एक कुशल कहानीकार हैं। उनकी कहानियों में देशकाल की प्रभावशाली योजना रहती है। ‘पुरस्कार’ भी देशकाल की दृष्टि से एक सफल तथा उत्तम कहानी है। कहानी में लेखक ने आरम्भ में वातावरण का निर्माण किया है। मधूलिका तथा. अरुण के प्रथम मिलन तथा पुनः मिलने में भी अनुकूल वातावरण का ध्यान रखा गया है। कहानी का कथानक ऐतिहासिकता से प्रभावित है। कहानी का घटना स्थल कोसल देश है। कहानीकार ने पात्रों के नाम, वेशभूषा तथा उत्सव के चित्रण में देशकाल का पूरा ध्यान रखा है।

प्रश्न 49.
‘संवाद’ की दृष्टि से पुरस्कार’ कहानी की समालोचना कीजिए।

उत्तर:
कहानी के संवाद छोटे, प्रभावशाली, मार्मिक और पात्रों के चरित्र के अनुकूल हैं। संवादों का प्रयोग कहानीकार ने पात्रों के चरित्र का उद्घाटन करने के लिए भी किया है। अपने प्रेम और देशप्रेम के द्वंद्व में पड़ी मधूलिका सेनापति से कहती है-“पगली। नहीं। यदि वही होती तो इतनी विचार-वेदना क्यों होती ?” राजा के आग्रह करने पर वह अरुण के बराबर जाकर खड़ी होती है, कहती है-‘तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले।’ इस तरह हम देखते हैं कि कहानी के संवाद प्रसंगानुकूल हैं तथा प्रभावशाली हैं। प्रसाद जी एक प्रसिद्ध नाटककार हैं। अतः उनके संवादों में नाटकीयता भी पाई जाती है।

प्रश्न 50.
‘पुरस्कार’ कहानी में कहानीकार ने क्या संदेश दिया है ?

उत्तर:
‘पुरस्कार’ कहानी में मधूलिका के अरुण से प्रेम तथा देशप्रेम के बीच संघर्ष की कहानी है। प्रेम में पड़कर मधूलिका को अति भ्रम हो जाता हैं और वह अरुण की सहयोगिनी बन जाती है। परन्तु शीघ्र ही उसको अपनी भूल पता चल जाती है। वह देशप्रेम पर अपने प्रेम का बलिदान कर देती है। इस तरह इस कहानी में प्रसाद जी ने देशप्रेम को सर्वोपरि मानकर उसके लिये त्याग-बलिदान करने का संदेश दिया है।

प्रश्न 51.
मगध का एक राजकुमार अरुण अपने रथ पर बैठा बड़े कुतूहल से यह दृश्य देख रहा था। अरुण कौन-सा दृश्य देख रहा था ?

उत्तर:
कोसल का प्रसिद्ध कृषि उत्सव मनाया जा रहा था। महाराज स्वर्ण-रजित हल की मूठ पकड़कर खेत जोत रहे थे और बीज बो रहे थे। बीजों को थाल लिए कुमारी मधूलिका महाराज के साथ थी। बीज बोते समय महाराज बीजों के लिए जब हाथ बढ़ाते तो मधूलिका थाल उनके सामने कर देती। मधूलिका का खेत होने के कारण बीज देने का सम्मान भी उसी को मिला था। मधूलिका सुन्दरी थी, कुँवारी थी। वह कौशेय वस्त्र धारण किए थी, जो उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं सुशोभित हो रहा था। कभी वह उसको सँभालती थी तो कभी अपने रूखे बालों को सँभालती थी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें छलक रही थीं। वे उसकी बरौनियों में गुँथ रही थीं। सम्मान और लज्जा के भाव उसके हृदय में प्रकट हो रहे थे।

उसके अधरों पर मन्द-मन्द मुस्कराहट थी। वह महाराज को बीज देने में तल्लीन थी। इस कार्य में वह किसी प्रकार की असावधानी नहीं कर रही थी। सब लोग देख रहे थे कि महाराज अपने खेत में हल चला रहे थे। हल स्वर्ण-रंजित था तथा उसमें पुष्ट बैल जुते हुए थे। जो महाराज का संकेत पाकर हल को खींच रहे थे। उधर राजकुमार अरुण मधूलिका के सौन्दर्य पर दृष्टि जमाये था। उसके नैन कृषक बालिका मधूलिका के पवित्र सौन्दर्य को मुग्धभाव से देख रहे थे। वह सोच रहा था-कितना भोला सौन्दर्य है। कितनी सरल चितवन है।

प्रश्न 52.
मधूलिका के अन्तर्द्वन्द्व की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर:
मधूलिका कोसले के पूर्व सेनापति सिंहमित्र की कन्या है। उसके पिता ने कोसल की रक्षार्थ अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए थे। मधूलिका भी स्वदेश के प्रति गहरा अनुराग रखती थी। कोसल के उत्सव के समय उसकी उसकी भेंट मगध के राजकुमार अरुण से हुई। अरुण उस पर मुग्ध था। उसने उसके समक्ष प्रेम निवेदन किया किन्तु मधूलिका को वह स्वीकार नहीं हुआ। समय बीतता गया। अरुण को मगध से निर्वासित कर दिया गया। वह एक बार पुन: कोसल आया। उसकी मधूलिका से भेंट हुई।

दोनों ने पुरानी बातों को स्मरण किया। दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए और प्रेम में पड़ गए। महत्वाकांक्षी अरुण ने इसका लाभ उठाया। उसने मधूलिका की सहायता से कोसल को हस्तगत करने की योजना बनाई। मधूलिका ने उसकी सहायता की। उसने महाराज से श्रावस्ती दुर्ग के दक्षिण की भूमि प्राप्त कर ली। उस स्थान का उपयोग रात में दुर्ग पर आक्रमण के लिए होना था। अरुण ने प्रात:काल होते ही उसको कोसल की राजरानी बनाने का वचन दिया था। मधूलिका रात में अपनी झोंपड़ी की ओर लौट रही थी। उसका मन द्वन्द्व से भरा था। वह सोच रही थी कि उसके कारण दुर्ग पर विदेशी का अधिकार हो जायेगा।

उसके पिता ने जिसकी रक्षार्थ अपने प्राण दिए, उसी को वह संकट में डाल रही है। उसके पिता मानों उसे पुकार रहे थे। मधूलिका व्याकुल हो उठी। उसने भावावेश में कोसल के सेनापित के सामने अरुण की योजना का रहस्य खोल दिया। उसके प्रेम पर यह देशप्रेम की विजय थी उसके मन में व्यक्तिगत प्रेम और स्वदेश प्रेम के बीच जो भीषण द्वन्द्व छिड़ा था उसमें स्वदेश प्रेम की। विजय हुई थी। मधूलिका का यह अन्तर्द्वन्द्व अत्यन्त सार्थक है। इसके द्वारा कहानीकार ने स्वदेश की रक्षा का संदेश दिया है तथा उसको मनुष्य के अपने प्रेम और हित से ऊपर बताया है।

प्रश्न 53.
मधूलिका स्वदेश की रक्षार्थ प्राण देने वाले वीर पिता की पुत्री थी। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जिनके कारण वह स्वेदश के विरुद्ध अरुण की सहायता के लिए तैयार हुई ?

उत्तर:
मधूलिका के पिता देशप्रेमी थे। मधूलिका के मन में भी अपने देश के प्रति प्रेम कम नहीं था। वह स्वाभिमानी थी। उसने राज्य का अनुग्रह स्वीकार नहीं किया था। अपने श्रम से जो मिलता उसी से गुजर करती थी। उसने एक बार राजकुमार अरुण का प्रेम निवेदन अस्वीकार कर दिया था। मधूलिका अकेली मधूक वृक्ष के नीचे अपनी जर्जर पर्णकुटी में रहती थी। निर्धनता और अकेलेपन की पीड़ा उसे निरन्तर सताती थी। जर्जर झोपड़ी से शीतकाल की रात में वर्षा का पानी टपकता था और वह ठिठुर-सिकुड़कर एक ओर बैठी थी। ओढ़ने को भी कुछ नहीं था। तभी द्वार पर अरुण उपस्थित हुआ। अपनी विपन्न दशा में मधूलिका अरुण के प्रस्ताव का स्मरण कर रही थी। दोनों मिले तो प्रेम दृढ़ हुआ। अवसर का लाभ उठाकर अरुण ने उसे देशद्रोह के लिए प्रेरित किया। अपनी निर्धनता और अकेलेपन की पीड़ा से मुक्ति पाने की आशा में मधूलिका का पैर फिसल गया। उसके मन में अरुण के द्वारा उत्पन्न कल्पना ने आँखों के सामने चकाचौंध उत्पन्न कर दी। वह स्वदेश प्रेम के पथ पर दृढ़ता से खड़ी न रह सकी। उपर्युक्त परिस्थिनियों में वह अरुण की योजना की सहयोगिनी बन गई परन्तु अपने मन की दुर्बलता पर उसने शीघ्र ही काबू पा लिया।

प्रश्न 54.
पुरस्कार’ कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर:
‘पुरस्कार’ जयशंकर प्रसाद’ द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कहानी है। इस कहानी में लेखक ने प्रधान पात्र मधूलिका के प्रेम तथा देशप्रेम के बीच होने वाले मानसिक संघर्ष का महत्वपूर्ण ढंग से चित्रण किया है। अरुण के प्रेम में पड़कर मधूलिका अपने देश के प्रति गद्दारी करने के लिए भी तैयार हो जाती है। वह अरुण की कोसल को हस्तगत करने की महत्वाकांक्षी योजना का अंग बन जाती है। उसके पूछने पर कहती है- “जो कहोगे वही करूंगी। | वह उसके कहने पर दुर्ग के दक्षिण में नाले के पास की भूमि अपनी खेती के लिए माँग लेती है। यह सामरिक महत्व की भूमि है। अरुण यहाँ से दुर्ग पर आक्रमण कर उस पर अधिकार करना चाहता है। परन्तु जल्दी ही मधूलिका को अपनी भूल पता चल जाती है। वह स्वदेश रक्षार्थ अपने प्रेम का बलिदान करने का निश्चय कर लेती है और सेनापति को सब कुछ बता देती है। | इस कहानी द्वारा हमको शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को अपने देश से प्रेम करना चाहिए। स्वदेश के हित में अपने व्यक्तिगत सुख-दुख, प्रेम आदि को त्याग देना ही उचित है। व्यक्ति से देश बड़ा होता है। हमें अपने देश को शत्रुओं से बचाना चाहिए। किसी प्रलोभन में पड़कर स्वदेश के विरुद्ध कोई काम नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 55.
मधूलिका ने अरुण के साथ ही अपने लिए भी प्राणदण्ड की याचना की। क्या आपकी दृष्टि में उसका ऐसा करना उचित है?

उत्तर:
मधूलिका अरुण को प्रेम करती थी। वह उसको हृदय से चाहती थी। अपने प्रेम के वशीभूत होकर ही वह अपने देश के विरुद्ध उसका साथ दे रही थी। परन्तु उसका हृदय देश प्रेम के महान् विचारों से भरा था। उसको अपनी भूल शीघ्र पता चल गई और उसने अरुण की योजना सेनापति के समक्ष खोल दी। अरुण बन्दी हुआ। महाराज ने उसको प्राणदण्ड देने की स्वीकृति दी। मधूलिका से राजा ने पुरस्कार माँगने के लिए कहा। उसने उचित समय पर सूचना देकर दुर्ग का पतन रोका था। बहुत कहने पर मधूलिका ने अपने लिए प्राणदण्ड माँगा और बन्दी अरुण के पास जाकर खड़ी हो गई। अपने लिए प्राणदण्ड की याचना अनुचित नहीं थी।

मधूलिका अरुण से प्रेम करती थी। वह अपराधी था तो उसका साथ देने के कारण मधूलिका भी अपराधी थी। वह अपने मन में अपराध बोध का अनुभव कर रही थी। अत: प्राणदण्ड की याचना करना उचित ही कहा जायगा। मधूलिका ने देशप्रेम के लिए अपने प्रेम की बलि दी थी। अब उसके सामने अपने प्रेम को सच्चा सिद्ध करने की चुनौती थी। उसने इसे स्वीकार किया और अपने प्रेम के लिए आत्मोत्सर्ग करने का निश्चय कर लिया। इस दृष्टि से भी अपने लिये राजा से प्राणदण्ड की याचना करना तर्कसंगत ही कहा जायगा।

प्रश्न 56.
राजकुमार अरुण के चरित्र की चार विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:
अरुण मगध का राजकुमार था। वह कोसल का उत्सव देखने आया था। वहाँ वह कृषकबाला मधूलिका के प्रेम में पड़ गया था। उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलखित हैं

मधूलिका का प्रेमी –

अरुण मगध का राजकुमार है। प्रथम दर्शन के समय से ही वह मधूलिका से प्रेम करता है। मधूलिका उसका प्रणय-निवेदन स्वीकार नहीं करती परन्तु दूसरी बार उसे निर्वासित देखकर उसको प्रेम करने लगती है।


महत्वाकांक्षी –

अरुण एक महत्वाकांक्षी युवक है। महत्वाकांक्षी होने के कारण ही उसको मगध से निर्वासित कर दिया जाता है। वह सौ सैनिकों के साथ कोसल आ जाता है। उसको पता है कि कोसल राज्य दुर्बल है। वह उसको अपने अधिकार में करना चाहता है।


स्वार्थी –

अरुण स्वार्थी है, वह जानता है कि कोसल नरेश मधूलिका को बहुत मानते हैं। वह मधूलिका को अपनी खेती के बदले श्रावस्ती दुर्ग के दक्षिण की भूमि महाराज से माँगने को प्रेरित करता है। वह इस भूमि से रात में दुर्ग पर आक्रमण करने का रास्ता बनाता है। अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु वह मधूलिका को अपने देश विरुद्ध काम करने को उकसाता है।


दण्ड का पात्र –

मधूलिका अपने भोलेपन तथा प्रेम के आकर्षण के कारण अरुण का साथ देने को तैयार हो जाती है परन्तु अपनी भूल जानकर शीघ्र ही उसका भण्डाफोड़ कर देती है। अरुण बंदी बनाया जाता है और उसको मृत्युदण्ड मिलता है। अरुण पुरस्क्रार कहानी का महत्वपूर्ण पात्र है। कथावस्तु के विकासों उसका योगदान है।

महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्याएँ

  1. आर्द्रा नक्षत्र, आकाश में काले-काले बादलों की घुमड़, जिसमें देव-दुंदुभि का गंभीर घोष। प्राची के एक निरभ्र कोने से स्वर्ण पुरुष झाँकने लगा था-देखने लगा, महाराज की सवारी। शैलमाला के अंचल में समतल उर्वरा भूमि से सोंधी बास उठ रही थी। नगर-तोरण से जयघोष हुआ, भीड़ में गजराज का चामधारी शृंड उन्नत दिखाई पड़ा। वह हर्ष और उत्साह का समुद्र हिलोरें भरता हुआ आगे बढ़ने लगा।


सन्दर्भ एवं प्रसंग-

प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘पुरस्कार’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इसके रचयिता ‘जयशंकर प्रसाद’ हैं।

कहानीकार ने कोसल राज्य में होने वाले कृषि महोत्सव का वर्णन किया है। इसमें भाग लेने वहाँ के महाराज आने वाले थे। उनके स्वागत में प्रकृति और नागरिक सभी उत्साहित थे।

व्याख्या-

उस समय आर्द्रा नक्षत्र लग चुका था। आकाश में काले बादल उमड़-घुमड़ रहे थे। देव-दुंदुभि की गम्भीर आवाज गूंज रही थी। पूर्व दिशा में एक बादल रहित कोने से सूर्य दिखाई देने लगा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह महाराज की सवारी देख रहा हो। वह पर्वत तले की समतल उपजाऊ भूमि थी। उसमें से सुन्दर गंध उठ रही थी। नगर के द्वार से महाराज की जय का स्वर हुआ। भीड़ में हाथी की उठी हुई सँड़ दिखाई दी, जिसमें चामर था। नागरिकों की भीड़ प्रसन्नता और उत्साह से भरकर आगे बढ़ रही थी।

विशेष-
(i) कोसल के कृषि उत्सव से पूर्व महाराज के क्षेत्र में आगमन का वर्णन है।
(ii) भाषा संस्कृतनिष्ठ शब्दावली युक्त है।
(iii) शैली वर्णनात्मक तथा चित्रात्मकता लिए हुए सजीव है।

  1. बीजों का एक थाल लिए कुमारी मधूलिका महाराज के साथ थी। बीज बोते हुए महाराज जब हाथ बढ़ाते तब मधूलिका उनके सामने थाल कर देती। यह खेत मधूलिका का था, जो इस साल महाराज की खेती के लिए चुना गया था। इसलिए बीज देने का सम्मान मधूलिका ही को मिला। वह कुमारी थी। सुंदरी थी। कौशेय-धसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे सम्हालती और कभी अपने रूखे अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी। वे सब बरौनियों में गुंथे जा रहे थे, सम्मान और लज्जा उसके अधरों पर मन्द मुस्कराहट के साथ सिहर उठते, किन्तु महाराज को बीज देने में उसने शिथिलता न दिखाई।

प्रसंग-

कथाकार ने कोसल के कृषि महोत्सव का वर्णन किया है। मधूलिका सिंहमित्र की सुन्दरी कन्या है। उस वर्ष उसका खेत महाराज के खेत के रूप में चुना गया है। वह बीज बोने में महाराज का सहयोग कर रही है।

व्याख्या-

मधूलिका के हाथों में बीजों से भरा थाल था। महाराज बीज बो रहे थे। वह हाथ बढ़ाते तो मधूलिका थाल उनके सामने कर देती थी। वह खेत मधूलिका का था। इस वर्ष उसे महाराज की खेती के लिए चुना गया था। अतः बीज देने का सम्मान मधूलिका। को मिला था। मधूलिका कुमारी थी और सुन्दरी थी। उसने रेशमी वस्त्र पहन रखे थे। वह उसके शरीर पर इधर-उधर लहरा रहे थे। मधूलिका कभी हवा से उड़ते अपने वस्त्रों को तो कभी अपने रूखे बालों को सँभालती थी। किसान-कन्या मधूलिका के माथे पर पसीने की बूंदें छलक रही थीं। वे उसकी बरौनियों से मिल रही थीं। महाराज को बीज देने का सम्मान मिलने पर वह प्रसन्न थी। सम्मान और लज्जा के भाव उसके होंठों पर मन्द मुस्कान के रूप में व्यक्त हो रहे थे। परन्तु वह अपने कर्तव्य के प्रति सतर्क थी। वह महाराज को बीज देने का कार्य सतर्कता से कर रही थी।

विशेष-


(i) कृषक-कन्या मधूलिका महाराज के द्वारा बीज बोने में उनका सहयोग कर रही थी।
(ii) मधूलिका के सौन्दर्य का सजीव चित्रण हुआ है।
(iii) भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त तथा वर्णनानुकूल है।
(iv) शैली वर्णनात्मक है।

3.‘देव! यह मेरे पितृ-पितामहों की भूमि है। इसे बेचना अपराध है, इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य के बाहर है।” महाराज के बोलने के पहले वृद्ध मंत्री ने तीखे स्वर से कहा-“अबोध! क्या कह रही है? राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार! तेरी भूमि से चौगुना मूल्य है, फिर कोसल का यह सुनिश्चित राष्ट्रीय नियम है। तू आज से राजकीय रक्षण पाने की अधिकारिणी हुई, इस धन से अपने को सुखी बना। “राजकीय-रक्षण की अधिकारिणी तो सारी प्रजा है मंत्रिवर! महाराज को भूमि-समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध न था और न है, किन्तु मूल्य स्वीकार करना असम्भव है।”-मधूलिका उत्तेजित हो उठी॥

प्रसंग-

मधूलिका को राज्य के नियमों के अनुसार उसकी अधिग्रहीत भूमि के बदले कुछ स्वर्ण मुद्राएँ दी गईं। थैली को सादर माथे से लगाकर उसने उनको महाराज के ऊपर निछावर करके बिखेर दिया। महाराज को कुछ कुपित होते देखकर उसने विनम्रतापूर्वक इसका कारण बताया।

व्याख्या-

मधूलिका ने विनम्रता से कहा-‘हे महाराज ! यह भूमि मेरे पूर्वजों की है। इस भूमि को बेचना अपराध है। अत: इसकी कीमत लेना मुझे स्वीकार नहीं है।’ महाराज के कुछ कहने से पूर्व ही बूढ़े मंत्री ने तेज आवाज में कहा-‘अरी अज्ञानी ! तू कहती क्या है? यह राज्य की ओर से कृपापूर्वक दिया गया धन है। इसका अपमान करना उचित नहीं है। तुझे जो धन दिया गया है वह तेरी भूमि के मूल्य का चार गुना है। उस पर यह कोसल राज्य का निश्चित नियम है। आज से तुझको राज्य की सुरक्षा प्राप्त हो रही है। इस धन को लेकर सुखपूर्वक रह।’ मधूलिका ने उत्तर दिया-‘हे मंत्रीश्रेष्ठ! मैं महाराज को अपनी भूमि समर्पित करने की विरोधी नहीं हूँ। पहले भी मेरा विरोध नहीं था आज भी नहीं है। किन्तु मूल्य स्वीकार करना मेरी सामर्थ्य की बात नहीं है।’ यह कहते-कहते मधूलिका उत्तेजित हो उठी।

विशेष-
(i) भाषा प्रवाहपूर्ण, संस्कृतनिष्ठ हिन्दी खड़ी बोली है॥
(ii) शैली नाटकीय है।
(iii) मधूलिका तथा राज्य के मंत्री के बीच हुए संवाद का प्रभावपूर्ण वर्णन हुआ है।

  1. अरुण ने देखा, एक छिन्न माधवी-लता वृक्ष की शाखा से च्युत होकर पड़ी है। सुमन मुकुलित थे, भ्रमर निस्पंद। अरुण ने अपने अश्व को मौन रहने का संकेत किया, उस सुषमा को देखने के लिए। परन्तु कोकिल बोल उठी-उसने अरुण से प्रश्न किया, छिः कुमारी के सोये हुए सौंदर्य पर दृष्टिपात करने वाले धृष्ट, तुम कौन ?’ मधूलिका की आँख खुल पड़ी। उसने देखा एक अपरिचित युवक। वह संकोच से उठ बैठी। “भदे! तुम्हीं न कल उत्सव की संचालिका रही हो?”

प्रसंग-

कोसल के कृषि महोत्सव में मगध के राजकुमार अरुण ने मधूलिका को देखा तो उसके रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया। प्रात:काले वह अपने घोड़े पर बैठकर मधूलिका से मिलने पहुँचा। मधूलिका मधूक वृक्ष के नीचे अपने हाथ पर सिर रखे सो रही थी।

व्याख्या-

अरुण ने मधूलिका को देखा तो उसको ऐसा लगा जैसे एक टूटी, मुरझाई हुई माधवी लता वृक्ष की शाखा से अलग होकर नीचे गिर गई हो। उस प्रभातकाल में फूल खिले थे परन्तु भौंरे शान्त थे। अरुण ने इशारा करके अपने घोड़े को चुप रहने को कहा। वह मधूलिका के सौन्दर्य को दत्तचित्त होकर देखना चाहता था। इसी बीच कोयल बोलने लगी, मानो वह अरुण से पूछ रही हो-सोती हुई कुमारी के सौन्दर्य को देखने वाले तुम कौन हो? तुम्हारा यह काम प्रशंसनीय नहीं है। तुम बड़े ढीठ प्रतीत होते हो। तभी मधूलिका जाग उठी। उसने सामने एक अपरिचित युवक को पाया। वह संकोच के साथ उठकर बैठ गई। राजकुमार अरुण ने उससे पूछा-‘भद्रे! तुम वही हो जो कल के उत्सव का संचालन कर रही थीं?

विशेष-


(i) भाषा संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली युक्त है।
(ii) शैली वर्णनात्मक है।
(iii) सोती हुई मधूलिका के सौन्दर्य और उसको मुग्धभाव से निहारते राजकुमार अरुण का चित्रण हुआ है।

  1. “यह रहस्य मानव-हृदय का है, मेरा नहीं। राजकुमार नियमों से यदि मानव-हृदय बाध्य होता तो आज मगध के राजकुमार का हृदय किसी राजकुमारी की ओर न खिंचकर एक कृषक-बालिका का अपमान करने न आता।” मधूलिका उठ खड़ी हुई।चोट खाकर राजकुमार लौट पड़ा। किशोर किरणों में उसका रत्न किरीट चमक उठा। अश्व वेग से चला जा रहा था और मधूलिका निष्ठुर प्रहार करके क्या स्वयं आहत न हुई। उसके हृदय में टीस-सी होने लगी। वह सजल नेत्रों से उड़ती हुई धूल देखने लगी।

प्रसंग-

मधूलिका अपनी जमीन छिनने से दु:खी थी। राजकुमार अरुण ने उससे कहा कि वह उसकी भूमि महाराज से उसे वापस दिला देगा मधूलिका ने अस्वीकार किया। वह राजकीय नियम को भंग करना नहीं चाहती थी। अरुण ने पूछा कि उसका रहस्य क्या है?

व्याख्या-

मधूलिका ने उत्तर दिया कि रहस्य उसका नहीं, मानव के हृदय का है। अपनी भूमि से उसे प्रेम है परन्तु साथ ही राष्ट्रीय नियम का पालन करना उसका कर्तव्य भी है। भूमि के जाने से दु:खी होकर पह अपने राष्ट्रीय नियम का उल्लंघन नहीं कर सकती। मनुष्य का हृदय नियमों से बँधा नहीं होता। यदि ऐसा होता तो वह मगध का राजकुमार ह्मेकर एक कृषक कन्या मधूलिका से प्रेम-निवेदन करके उसका अपमान नहीं करता। यह कहकर खड़ी हो गई। राजकुमार अरुण भी इस उत्तरे से दु:खी हुआ। वह वापस चल पड़ा। सूर्य की प्रभातकालीन किरणों के पड़ने से उसका रत्नों से जड़ा मुकुट चमकने लगा। उसका घोड़ा तेजी से दौड़ रहा था। उधर मधूलिका को भी अरुण के प्रेम का अपमान करने से चोट पहुँची थी। अपनी निष्ठुरता पर वह दुःखी थी। उसका हृदय वेदना से भरा था। उसके नेत्रों में आँसू थे। वह उड़ती हुई धूल को देख रही थी।

विशेष-


(i) भाषा सरस, संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली युक्त खड़ी बोली है।
(ii) संवाद शैली है।
(ii) राजकुमार अरुण द्वारा मंधूलिका के प्रति प्रेमाकर्षण तथा मधूलिका द्वारा उसको अस्वीकार करने का वर्णन है, यद्यपि वह भी अरुण के प्रति आकर्षित है।
(iv) मानव मन के भावों का पजीव चित्रण हुआ है।

  1. आज मधूलिका उस बीते हुए क्षण को लौटा लेने के लिए विकल थी। दरिद्रता की ठोकरों ने उसे व्यथित और अधीर कर दिया है। मगध की प्रासाद-माला के वैभव का काल्पनिक चित्र-उन सूखे डंठलों की रंध्रों से, नभ में बिजली के आलोक में नाचता-हुआ दिखाई देने लगा। खिलवाड़ी शिशु जैसे श्रावण की संध्या में जुगुनू को पकड़ने के लिए हाथ लपकाता है, वैसे ही मधूलिका अभी वह निकल गया, मन ही मन कह रही थी। वर्षा ने भीषण रूप धारण किया। गड़गड़ाहट बढ़ने लगी; ओले पड़ने की संभावना थी। मधूलिका अपनी जर्जर झोंपड़ी के लिए काँप उठी॥

प्रसंग-

अपने खेत के छिन जाने से मधूलिका दु:खी थी। दूसरों के खेत पर काम करके जो मिलता उसी से गुजर करती और मधूक वृक्ष के नीचे अपनी पर्णकुटी में सो जाती थी। सर्दी की ऋतु में वर्षा के कारण उसकी छाजन चमक रही थी। अपनी इस दयनीय अवस्था में उसे राजकुमार अरुण की याद सता रही थी।

व्याख्या-

लेखक कहते हैं कि आज मधूलिका उस क्षण को अपने जीवन में लौटाना चाहती थी, जब राजकुमार अरुण से उसकी भेंट हुई थी। अपनी भीषण गरीबी के कारण वह व्याकुल हो उठी थी। प्रथम भेंट के अवसर पर अरुण ने उसे राजरानी बनाने का प्रस्ताव दिया था। मधूलिका मगध के राजमहलों की विशाल पंक्तियों के ऐश्वर्य की कल्पना कर रही थी।

अपनी पत्तों की कुटिया के सूखे डंठलों के छेदों से उसको बाहर चमकती बिजली का प्रकाश दिखाई दे रहा था और उस प्रकाश में मगध के वैभव को चित्र दिखाई दे रहा था। खिलाड़ी शिशु सावन के महीने में शाम को चमकते जुगुनू को पकड़ने के लिए, हाथ फैलाता है परन्तु उसे पकड़ नहीं पाता, यही अवस्था मधूलिका की थी। वह मन ही मन कह रही थी कि यह वैभव उसके हाथ से निकल गया है। तभी वर्षा का रूप भयानक हो उठा। बादल जोर से गरजने लगे। लग रहा था कि ओले गिरेंगे। मधूलिका को भय हुआ कि उसकी टूटी-फूटी झोंपड़ी भी नष्ट न हो जाये।

विशेष-
(i) भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली है।
(ii) शैली वर्णनात्मक है।
(iii) मधूलिका की मानसिक अवस्था के साथ ही उसकी भीषण गरीबी का सजीव चित्रण हुआ है।

  1. युवती का वक्षस्थल फूल उठा। वह हाँ भी नहीं कह सकी, न भी नहीं। अरुण ने उसकी अवस्था का अनुभव कर लिया। कुशल मनुष्य के सामने उसने अवसर को हाथ से न जाने दिया। तुरंत बोल उठा-“तुम्हारी इच्छा हो तो प्राणों से प्रण लगाकर मैं तुम्हें इस कोसल के सिंहासन पर बिठा हूँ मधूलिका। अरुण के खड्ग का आतंक देखोगी?” मधूलिका एक बार काँप उठी। वह कहना चाहती थी, नहीं-किन्तु उसके मुंह से निकला, “क्या?


प्रसंग-

मधूलिका की कल्पना साकार हुई। उसकी राजकुमार अरुण से पुन: भेंट हुई। अरुण कोसल के दुर्ग को हस्तगत करना चाहता था। वह मधूलिका के प्रेम का लाभ उठाना चाहता था। दोनों बातें कर रहे थे। अरुण उसके प्रेम की प्रशंसा कर रहा था।

व्याख्या-

अरुण के मुख से अपने प्रेम की प्रशंसा सुनकर मधूलिका का मन उत्साह और प्रसन्नता से भर गया। जब अरुण ने उससे पूछा कि क्या वह सचमुच उसे प्यार करती है तो वह न स्वीकार कर सकी, न अस्वीकार। अरुण एक कुशल मनुष्य था। उसने मधूलिका के मन की दशा को जान लिया था। वह इस अवसर को हाथ से जाने देना नहीं चाहता था। उसने तुरन्त मधूलिका से कहा कि यदि वह चाहे तो वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर उसे कोसल के राजसिंहासन पर बैठा दे। क्या मधूलिका उसकी तलवार का आतंक देखना चाहेगी? अरुण के इस कथन पर एक बार तो मधूलिका काँप उठी। वह उत्तर में नहीं कहना चाहती थी। किन्तु अनायास उसके मुँह से निकला-क्या?

विशेष-
(i) गरीबी के कारण मधूलिका विचलित हो उठी थी। वह अनजाने ही अरुण की योजना की हिस्सेदार बन रही थी।
(ii) अरुण के प्रति प्रेम का भाव उसकी कमजोरी थी। इस कारण देश के प्रति प्रेम और कर्तव्य के पथ से वह विचलित हो रही थी।
(iii) भाषा संस्कृतनिष्ठ है। प्रसाद जी की भाषा का रूप सदा एकसा रहता है।
(iv) शैली वर्णनात्मक है।

  1. एक घने कुंज में अरुण और मधूलिका एक दूसरे को हर्षित नेत्रों से देख रहे थे। संध्या हो चली थी। उस निविड़ वन में उन नवागत मनुष्यों को देखकर पक्षीगण अपने नीड़ को लौटते हुए अधिक कोलाहल कर रहे थे। प्रसन्नता से अरुण की आँखें चमक उठीं। सूर्य की अंतिम किरणें झुरमुट से घुसकर मधूलिका के कपोलों से खेलने लगीं। अरुण ने कहा-“चार पहर और विश्वास करो, प्रभात में ही इस जीर्ण कलेवर कोसल-राष्ट्र की राजधानी श्रावस्ती में तुम्हारा अभिषेक होगा। और मगध से निर्वासित मैं, एक स्वतन्त्र राष्ट्र का अधिपति बनूंगा, मधूलिका!”


प्रसंग-

अरुण ने मधूलिका की सहायता से श्रावस्ती दुर्ग के दक्षिण में नाले के पास जमीन हस्तगत कर ली थी। वहाँ उसके लोग स्वतंत्रतापूर्वक घूम रहे थे और मार्ग बना रहे थे। अरुण एक कुंज में मधूलिका के साथ बैठकर बातें कर रहा था।

व्याख्या-

पेड़ों के एक घने कुंज में अरुण मधूलिका के साथ बैठा था। दोनों प्रसन्नता के साथ एक-दूसरे को देख रहे थे। संध्या हो रही थी। उस घने वन में इन नये आए हुए लोगों को देखकर पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौटते समय बहुत शोर मचा रहे थे।

अरुण प्रसन्न था। खुशी के कारण उसकी आँखों में चमक थी। कुंज के घने वृक्षों से होकर सूर्य की किरणें मधूलिका के गालों पर पड़ रही थीं। अरुण ने मधूलिका से चार पहर और प्रतीक्षा करने को कहा। उसने उसे विश्वास दिलाया कि सबेरा होने तक वह कमजोर हुए कोसल राष्ट्र पर अधिकार कर लेगा और सबेरा होते ही राजधानी श्रावस्ती में मधूलिका का राजतिलक होगा। तब मगध का निर्वासित राजकुमार अरुण इस नवीन राष्ट्र का स्वामी बनेगा। मधूलिका इस राज्य की रानी होगी।

विशेष-
(i) तत्सम शब्दों से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली का प्रयोग हुआ है।
(ii) शैली वर्णनात्मक है।
(iii) राजकुमार अरुण और मधूलिका के प्रेम मिलन का चित्रण है॥

  1. पथ अंधकारमय था और मधूलिका का हृदय भी निविड़तम से घिरा था। उसका मन सहसा विचलित हो उठा, मधुरता नष्ट हो गयी। जितनी सुख-कल्पना थी, वह जैसे अंधकार में विलीन होने लगी। वह भयभीत थी, पहला भय उसे अरुण के लिए उत्पन्न हुआ; यदि वह सफल न हुआ तो! फिर सहसा सोचने लगी, वह क्यों सफल हो? श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में क्यों चला जाय? मगध कौसल का चिर शत्रु! ओह; उसकी विजय! कौसल-नरेश ने क्या कहा था-‘सिंहमित्र की कन्या।’ सिंहमित्र कोसल का रक्षक वीर, उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है? नहीं, नहीं। मधूलिका! “मधूलिका!” जैसे उसके पिता उस अंधकार में पुकार रहे थे, वह पगली की तरह चिल्ला उठी। रास्ता भूल गयी।

प्रसंग-

राजकुमार अरुण से विदा लेकर मधूलिका अपनी झोंपड़ी की ओर चली। अँधेरा हो गया था। कोसल राज्य को हस्तगत करने में अरुण की सहायता करने के अपने काम से वह विचलित थी। उसके मन में व्यक्तिगत प्रेम और देशप्रेम का अन्तर्द्वन्द्व उठ रही था।

व्याख्या-

मधूलिका अपने निवास की ओर जा रही थी। उस समय अँधेरा हो चुका था। मधूलिका के हृदय में भी घना अँधेरा छाया था। अचानक उसका मन व्याकुलता से भर गया और उसकी मधुरता जाती रही। उसके मन में कोसल की रानी बनने की कल्पना का सुख था, वह सहसा नष्ट हो गया। वह सुख मन के अँधेरे में खो गया। उसको भय लगने लगा। पहले उसको अरुण के बारे में डर लगा। उसने सोचा कि यदि कोसल का राज्य प्राप्त करने में उसको सफलता न मिली तो क्या होगा। तभी उसके मन में विचार आया कि अरुण एक विदेशी राजकुमार है।

उसको कोशल राज्य पर अधिकार पाने में सफल होना क्या उचित है? वह क्यों सफल हो ? श्रावस्ती का किला किसी विदेशी के अधिकार में क्यों जाये? मगध कोसल का पुराना शत्रु है। मगध के राजकुमार अरुण को कोसल पर विजय प्राप्त होनी नहीं चाहिए। कोसल नरेश ने कहा था-मधूलिका सिंहमित्र की कन्या है। सिंहमित्र ने कोसल की रक्षा के लिए अपने प्राण दिए थे। उसी सिंहमित्र की पुत्री है मधूलिका। वह आज क्या करने जा रही है। कोसल पर अधिकार करने में वह मगध के राजकुमार की सहायता क्यों कर रही है। उसने सोचा-नहीं, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। उसको लगा कि अँधेरे में उसके पिता सिंहमित्र उसे पुकार रहे थे-‘मधूलिका ऐसा मत करो। वह पागलों की तरह चिल्ला रही थी। वह रास्ता भूल गई थी।

विशेष-
(i) कहानीकार ने मधूलिका के मन की दवंद्वपूर्ण अवस्था का सजीव चित्र अंकित किया है।
(ii) भाषा प्रवाहपूर्ण है तथा तत्सम शब्दों से युक्त है।
(iii) शैली मनोविश्लेषणात्मक है॥

  1. सेनापति ने मधूलिका की ओर देखा। वह खोल दी गई। उसे अपने पीछे आने का संकेत कर सेनापति राजमन्दिर की ओर बढ़े। प्रतिहारी ने सेनापति को देखते ही महाराज को सावधान किया। वह अपनी सुख निद्रा के लिए प्रस्तुत हो रहे थे। किन्तु सेनापति और साथ में मधूलिका को देखते ही चंचल हो उठे। सेनापति ने कहा-“जय हो! देव! इस स्त्री के कारण मुझे इस समय उपस्थित होना पड़ा है।”


प्रसंग-

मधूलिका ने सेनापति को अरुण की योजना बता दी। सेनापति मधूलिका को साथ लेकर महाराज के समक्ष उपस्थित हुए और श्रावस्ती दुर्ग के लिए संकट की बात उनको बताई।

व्याख्या-

सेनापति अश्व के पीठ पर बँधी मधूलिका को लेकर राजभवन पहुँचे। वहाँ पहुँचकर सेनापति ने उसकी ओर देखा। उसके बन्धन खोल दिए गए। सेनापति ने उसको संकेत किया और अपने पीछे आने को कहा। वह राजभवन की ओर बढ़ी। द्वारपाल ने सेनापति को देखा तो तुरन्त महाराज को सूचना देकर सतर्क किया। महाराज रात में सुखपूर्वक सोने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने सेनापति, और उसके साथ मधूलिका को देखा। वह अस्थिर हो उठे। सेनापति ने उनको बताया कि उस स्त्री (मधूलिका) के कारण इतनी रात गए। उनको महाराज के सामने उपस्थित होना पड़ा था।

विशेष-


(i) भाषा प्रवाहपूर्ण है तथा तत्सम प्रधान है।
(ii) शैली वर्णनात्मक है।
(iii) सेनापति ने प्रमाणस्वरूप मधूलिका को साथ लेकर महाराज को श्रावस्ती दुर्ग के संकट में होने की सूचना दी है।

  1. उषा के आलोक में सभा-मंडप दर्शकों से भर गया। बंदी अरुण को देखते ही जनता ने रोष से हुँकार की-“वध करो!” राजा ने सहमत होकर कहा-“प्राणदण्ड।” मधूनिका बुलाई गई। वह पगली-सी आकर खड़ी हो गई। कोसल नरेश ने पूछा-“मधूलिका, तुझे जो पुरस्कार लेना हो, माँग।” वह चुप रही। राजा ने कहा-“मेरे निज की जितनी खेती है, मैं सब तुझे देता हूँ।” मधूलिका ने एक बार बंदी अरुण की ओर देखा। उसने कहा-“मुझे कुछ ने चाहिए।” अरुण हँस पड़ा। राजा ने कहा-“नहीं, मैं तुझे अवश्य देंगा। माँग ले।”“तो मुझे भी प्राणदण्ड मिले।” कहती हुई वह बंदी अरुण के पास जा खड़ी हुई।

प्रसंग-

कहानीकार ने मधूलिका के अरुण के प्रति प्रेम के साथ ही अपने देश कोसल के प्रति प्रेम का वर्णन किया है। मधूलिका ने स्वदेश प्रेम को व्यक्तिगत प्रेम पर वरीयता दी और अपने प्रेम का उत्सर्ग कर दिया।

व्याख्या-

सबेरा हो गया था और सूर्य का प्रकाश फैल रहा था। सभामण्डप दर्शकों से भरा था। अरुण को बन्दी बनाकर वहाँ लाया गया। उसको देखते ही जनता क्रुद्ध हो उठी। उसने तेज आवाज में उसको मृत्युदण्ड देने की माँग की। कोसल नरेश ने सहमतिपूर्वक उसको प्राणदण्ड देने का आदेश दिया। मधूलिका को बुलाया गया। वह आई और पगली के समान वहाँ खड़ी हो गई। कोसल के महाराज ने उससे पूछा-‘मधूलिका’ तू जो चाहे वह पुरस्कार माँग ले। मधूलिका कुछ नहीं बोली, चुप खड़ी रही। महाराज ने घोषणा की कि वह अपनी पूरी भूमि उसको दे रहे हैं। मधूलिका ने एक बार बन्दी बने हुए अरुण की ओर देखा और कहा कि उसको कुछ भी नहीं चाहिए। यह सुनकर अरुण हँस पड़ा। महाराज ने आग्रह किया कि वह उसको कुछ न कुछ पुरस्कार अवश्य देंगे वह जो चाहे सो माँग ले। मधूलिका ने कहा कि उसे भी प्राणदण्ड दिया जाय। यह कहकर वह बंदी अरुण के पास जाकर खड़ी हो गई।

विशेष-


(i) मधूलिका के आत्मोत्सर्ग का भव्य चित्रण हुआ है।
(ii) देशप्रेम को व्यक्ति के प्रेम के ऊपर बताया गया है।
(iii) भाषा प्रवाहपूर्ण है तथा तत्सम शब्दों से युक्त है।
(iv) शैली वर्णनात्मक तथा संवादमयी है।

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