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मरिया (कहानी) डॉ. परदेशी राम वर्मा हिंदी कक्षा 10 वीं पाठ 5.2

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डॉ. परदेशी राम वर्मा के जीवन परिचय

डॉ. परदेशी राम वर्मा जी का जन्म 18 जुलाई, 1947 को भिलाई इस्पात संयंत्र के करीबी गाँव लिमतरा में हुआ। इन्होंने छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी में उपन्यास, कथा संग्रह, संस्मरण, नाटक एवं जीवनी आदि का लेखन किया है। छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी में नव साक्षरों के लिए भी पुस्तकें लिखी हैं। इनके द्वारा पंथी नर्तक स्व देवदास बंजारे पर लिखित पुस्तक ‘आरूग फूल’ को मध्यप्रदेश शासन द्वारा माधवराव सप्रे सम्मान प्राप्त है।

इनका छत्तीसगढ़ी उपन्यास ‘आवा’ पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में एम.ए. के पाठ्यक्रम में शामिल है। 2003 में इसी विश्वविद्यालय द्वारा इन्हें मानद डी.लिट की उपाधि प्रदान की गई। इनके लेखन में छाीसगढ़ी जनजीवन, लोक संस्कृति की दुर्लभ, मनोहारी और रोचक प्रस्तुति हुई है। वैविध्यपूर्ण लेखन के लिए प्रदेश और देश में इनकी विशिष्ट पहचान है। सम्प्रति स्वतंत्र लेखनरत।

मरिया (कहानी) डॉ. परदेशी राम वर्मा

संझौती जल्दी नाँगर ल ढील देकर बेटा – रामचरण अपन एकलौता पोसवा बेटा ला समझइस। रामचरण के बाई मुच ले हाँस दिस। हॉसत देखि त ओकर बेटा सिकुमार पूछिस- काबर हाँसे दाई? ददाह बने त किहिस। सँझौती जल्दी ढील दे नाँगर ल काहब म हाँसी काबर आईस भई? दाई किहिस – देख बेटा, तोरो अब लोग-लइका होगे। तोर उम्मर बाढ़ गे फेर तोर ददा के मया ल मैं देखव ग। ददा बर लइका ह जनमभर लइके रिथे रे। तेमा एक ठन बेटा। एक बेटा अउ एक आँखी के गजब मया ग। डोकरा के मया ल देखेंव त हाँस परेंव।

अभी ये गोठ-बात चलते रिहिस। डोकरा उठिस खटिया ले अउ दम्म ले गिर गे। एक ठन गोड़ लझम पर गे। डोकरा ल देख के दाई चिचअइस – सिकुमार दउड़ त बेटा, लथरे अस करथ हे गा। सिकुमार दउड़ के अइस। ददा के एक पाँव, एक हाथ झूल गे। ददा मचिया म एकंगी परे रहिगे। देखो-देखो होगे। चरणदास बइद ल बलइन। रमेसर मंडल आगे। मनराखन चोंगी पियत खखारत अइस। जे मुँह ते बात लोकवा तो होगे रे सिकुमार, बइद ह बतइस।

रमेसर मंडल सदा दिन के समाजिक मनखे। रखमखा के उठगे, किहिस देख रे सिकुमार समाज के कान्हून ल हमला झन बता रे बाबू। कान्हून ल हम जानथन। कान्हून हिरसिंग दिरखिन बारे ल सब हम पढ़े बइठे हन जी। करजी दिखय मरनी के बेर। मँय गाँव के पटेल मँय गाँव समाज के कुरहा। बाबू रे, तोर बाप ह जियतभर कान्हून बर ठठ्ठा मड़इस, अब मरे म झन ठठा कर। दे बर परही भात। सब घर फुदर- फुदर के खाय हव, अब खवाय बर परत हे त कान्हून ल गोहराहू रे।

सब झन रमेसर के संग दे दिन। सिकुमार हो गे अकेल्ला। भात देवर माने ल परगे। घर डाहर आवत खानी रमेसर ल सुकालू किहिस- अच्छा जम्हेड़े भॉटोए बिछलत रिहिस बुजा ह। बिछलत रिहिस बुजा ह। अब उड़ाबो-लडुवा- पपची इट के।

रमेसर ओकर पीठ म एक मुटका मारिस अउ हाँस के कहिंस-उहाँ तो मुँह म लडुवा गोंजे रेहे रे।

अउ अब पपची बर नियत गड़िया देस। तोर बर केहे हे रे बाबू, “छिये बर, न कोड़े बर, धरे बर खोखला।” हाना सुन-सुना के हाँसत मुचमुचावत सारा-भाँटो घर आ गे। सिकुमार के होगे जग अँधियार। घर आके सिकुमार अपन दाई ल सब बतइस। दाई किहिस- पंच मन कुछु नइ किहिन रे। सिकुमार किहिस-दाई, सब किहिन तोर अँगना म खाबो, तिहि बहुत बड़ बात ये। पबरित करबो काहत हैं। दाई किहिस- बुड़ा के काहत हें नहकौनी दे। वाह रे जमाना। दुनिया कहाँ ले कहाँ आगे रे। हमरो उम्मर पहागे सब देखत देखत पढ़ई-लिखई बहुत होगे बाबू, फेर दुनिया उर्ह के उहें है। अरे! जब समाज के बड़े मन रइपुर के अधिवेशन म तय कर दीन के मरिया के भात खववनी बंद करे चाही त बंद कर देबर चाही। फेर वाह रे मनुख जात। करे के आनए केहे के आन। नियम बनाये हैं के नेवता खाय बर साते झन जाहीं, फेर जार्थे सत्तर झन। मट-मटमट-मट। मोटर-गाड़ी से भरा के नेवता खाय बन जाथे। अब तो बाबू रे, माई लोगन घलो जात हे नेवता खाय बर। एसो बड़े मंगह पारा बिहाव होइस त टूरी मन नेवता खाय बन आगें। अउ बरात म जो टूरा मन नाचिन।

सब मंद मउहा पीये रथे, नाचबे करहीं। सिकुमार समझइस। दाई किहिस-मंदे मउहा त पीही रे बाबू। तोर बाबू त चल दिस। गजब बड़ नाचा के कलाकार ग। खुदे गीत बनावय। हमरे गाँव के समारू अउ रिखी जोक्कड राहँय। कुछु नई जमिस त तोर बाबू गीत बनइस ग….रिखि राम सोच के काहत हे समारू ल दूध-दही पीबोन भइया, नई पीयन दारू ल।

फेर होत हे उल्टा, दूध-दही नँदा गे। सब धर लिन दारू। दारू पी के पंचइती करथै। अउ मरिया के भात ल खाय बिन नइ राहन किथे। काहत-काहत दाई रो डारिस।

मरता क्या न करता। आखिर दो एक्कड़ खेत बेचागे। खात-खवई म सिरागे रुपिया। खेत गय त बड़ला ला घलो बेच दिस सिकुमार, खेतिहर, किसान ले मजदूर होंगे। बनिहार होगे। रेडिया म गीत बाजय…..

अब बनिहार मन किसान होगे रे,
हमर देस म बिहान होगे रे।

त सिकुमार रो डरय। ओ सोचय कोन जनी कहाँ के मजदूर किसान होगे। मैंय तो किसान ले मजदूर होगेंव। बनिहार होगेंव।
ठलहा का करतिस, बनिहारी करे लागिस। एक दिन गाँव के चटरू भूखन ह ओला किहिस-सिकुमार, पुलुस बनबे?

सिकुमार अकबकागे। पूछिस- कोन मोला पुलुस बनाही भाई भूखन किहिस- करे करम के नागर ल भुतवा जोतय। तोर बर मौका है। मँय रोज जाथव भेलई। उहाँ हे रामनगीना सिंह। हमर दोस। ओकर पुलुस कंपनी हे। पाँच सौ रुपिया लागही। ओला देबे त ओ हा तोला पुलुस बना दिही। तँय तौ चौथी पास हस। धीरे-धीरे बने काम करबे त हवलदार हो जबे।

सिकुमार किहिस- कस जीए कइसे पाँच सौ म पुलुस बन जाहूँ। ठठ्ठा झन मड़ा रे भाई। भूखन किहिस- तोला पेड़ गिनना हे ते आमा खाना हे जी। पुलुस के काम। ड्रेस पुलुस के। ठाठ के काम रिही। आजकल प्रावेट पुलुस हैं। उही मन सब सुरच्छा के काम देखथे। आगू आ, आगू पा। किथें नहींए आगम अँइसा पानी पीये, पीछू के पावय चिखला। अभी भरती चलत है। काल तँय बता दे बाबू। सिकुमार संसों म परगे। अपन बाई ल बतइस। बाई किहिस मोर सों सॉटी बाँचे हे। ले जाव। बेच लव। तुम रहू ते कतको साँटी आ जही।

सिकुमार किहिस- इही ले कहे गे रहे तन बन नइये लत्ता जाय बर कलकत्ता। खाय बर घर म चाउँर नईये मैं पुलुस बने बन तोरे गोड़ के गहना उतारत हँव।

बाई किहिस- दुख सब उपर आथे। राजा नल पर बिपत परे तब पूँजे मछरी दाहरा म कुदगे। समे ताय सिकुमार बाई के बात ल मान गे। सॉटी बेचागे। दूसर दिन भूखन संग गीस। रामनगीना संग ओला देख के किहिस- वाह जवान। खाने को बासीए मगर देखो शरीर। जबर जवान हे भाई। भरती कर लेते हैं भाई बाकी काम तगड़ा हैए हिम्मत का है खेत नहीं जोतना है। दादागिरी का मुकाबला करना है। कर सकोगे न। सिकुमार अपन काम के जगा म गीस। तोड़फोड़ करइया साहेब मन गाड़ी म बइठ गे रहय। सिकुमार पाछू के डाला म बइठगे। गाड़ी चल परिस। जाके नरवा तीर के एक गजब बड़ घर म गाड़ी रुक गे। साहेब मन

अपन दल के तोड़ फोड़ वाला मन ल किहिस- धरव रे भइँस मन ल। चढ़ावव गाड़ी म । तोड़ दव सब खटाल ल।

अतका सुनना रिहिस के खटाल मालिक लउठी बेड़गा धर के आगे। लगिन गारी देय। अब सब साहेब गाड़ी म चढ़ गें। गाड़ी भर्र के भगा गे। बाँच गे सिकुमार। खटालवाला मन ओही ल पा परिन। गजब बजेडिन अउ छोड दिन, मूडी कान फूट गे सिकुमार के। रोवत ललावत कइसनों करके अपने दफ्तर अइस। अपन साहेब रामनगीना ल किहिस- साहेब मार खवाय बर कहाँ भेज दे रहेव। गजब ठठाय हे ददा। देख लव।

रामनगीना ल किहिस- साहेब मार खवाय बर कहाँ भेज दे रहेव। गजब ठठाय हे ददा। देख लव। रामनगीना किहिस- अरे घोंचू, तुम्हारी आज से छुट्टी। मार खाके आनेवाले का यहाँ क्या काम। जाओ अपने गाँव। भूल जाओ नौकरी।

सिकुमार किहिस- सरजी, आनके कारन मार खायेंव। दवा दारू बर कुछु देहू के नहीं। अब रामनगीना गुसियागे। किहिस- भागता है कि नहींए कि , एकाद हाथ मैं भी। बड़े आये हैं दवा का पैसा मांगने। अरे जिनसे मार खाकर आया है उनसे मांग। हम क्यों देंगे? ये तरा ले सिकुमार के छूट गे नौकरी। घर म ओकर महतारी अऊ घरवाली नइ बोलिन। गाँव के हितु पिरितु सकलइन अउ किहिन- देखों जी बाहरी मनखे मन तोला कइसे मरवा दिन। तोला रोजी माँगे बर बाहरी मनखे करा नइ जाना रिहिस।

सिकुमार किहिस- देखो जी, कहावत है- भूख न चीन्हें जात कुजात, नींद न चीन्हें अवघट घाट। बाहरी हा तो हाडा गोड़ा टोरवा दिस अउ तूमन सदा दिन के संग के रहैया मन का कमती करेव। बाप के मरिया के भात नई छोड़ेव। मोर खेती बेचागे। में किसान ले मजदूर होगेंव।

गरीब बर सब के चलथे, घरवाला और बाहरी सब गरिबहा ल ठठाथे। अपन अउ बिरान सब भरम ताय। अब भइया हो अंते-तंते बात छोड़व। जउन होगे तउन होगे। जिनगी भर सीखे बर परथे। मोर बर गाँव के पटेल अउ भेलई के रामनगीना सिंह दूनों बरोबर हे।

मोरो दिन बहुरही। किसान ले मैं बनिहार हो गेंव। तुहर बात मानके मरिया-हरिया के भात खवा के लइका मन के मुँह म पेच गोंज पारेंव। अब कहाँ हे मरियाभात खवइया समाजः तेकर सेती भइया में सोच डारेंव, बाँह भरोसा तीन परोसा। न जात, न कुटुम, न अपन, न बिरान। धन ले धरम हे। अब ककरो उभरौती म नइ आवँव। देख सुनके रेगिहँव। अब तो चारों मुड़ा अंधियार है। आती के धोती, जाती के लिंगोटी। ओकर दुख ल देख के बिसाहू किहिस- सिकुमार! भले अकेल्ला रहि जते फेर खेत बेंच के मरिया के भात झन खवाते। जीयत हैं तेकर बर सोचना चाहीं देखा-देखी नइ करे चाही सिकुमार।

सिकुमार किहिस- चेथी के आँखी अब आगू डाहर अइस बिसाहू। अब तो एक ठन परन हैए मर भले जहूँ फेर मरिया के भात नइ खवाव।

शब्दार्थ

  • सँझउती – शाम;
  • पोसवा – पालित;
  • डोकरा – वृद्ध;
  • मचिया – छोटा खाट;
  • रोसियाना – गुस्सा होना;
  • गोटी – गोली;
  • लझम – काम नहीं करना (सुस्त);
  • अरजी – विनय (प्रार्थना);
  • गोहराहूँ – निवेदन करूँगा;
  • जम्हेई- डॉटा;
  • तनखा – वेतन।

पाठ से अभ्यास

1. रामचरण के लकवे का इलाज अस्पताल की जगह वैद्य के द्वारा क्यों कराना पड़ा?
2. सिकुमार ने बैठक में क्या विनती की?
3. ‘दुब्बर बर दू असाढ़ होंगे का क्या मतलब है?
4. सिकुमार किसान से मजदूर कैसे बन गया?
5. सिकुमार की माँ क्या कहते-कहते रो पड़ी?
6. गरीब बर सबके चलथेए घर वाला और बाहिरी सब गरीबहा ल ठठार्थे। सिकुमार ने ऐसा क्यों कहा?
7. ‘मरिया’ प्रथा ने सिकुमार की जिंदगी को किस तरह बदल दिया?

पाठ से आगे अभ्यास

1. कहानी में मरिया प्रथा के बारे में बताया गया है। इस प्रथा के अन्तर्गत मृतक के परिवारजन को
समाज वालों को भोजन कराने की बाध्यता है। अपने आस-पास में व्याप्त ऐसी ही किसी एक समस्या पर
साथियों से चर्चा कर प्राप्त विचारों को लिखिए।


2. वैद्य ने रामचरण के लकवे के उपचार के लिए काले कबूतर के खून से मालिश करने का उपाय
बताया। आपके आस-पास भी कई बीमारियों के ऐसे ही अंधविश्वास भरे इलाज किए जाते होंगे। इस प्रकार
के इलाजों की सूची बनाइए तथा इनसे होने वाले नुकसान पर शिक्षक तथा साथियों से चर्चा कीजिए।


3. कहानी में सिकुमार को भूखन ने पुलिस की नौकरी करने की सलाह दी ताकि वो ठाठ से रह सके।
अपने साथियों से चर्चा कीजिए कि वो क्या बनना चाहते है और क्यों?

4. कहानी में सिकुमार गाँव छोड़कर पुलिस बनने भिलाई जाता है। आपके गाँव तथा समाज के लोग
भी विभिन्न कारणों से शहर जाते होंगे। अपने साथियों से चर्चा कीजिए और उन कारणों को लिखिए।

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