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कलातीर्थ: खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय लेख डॉ. राजन यादव हिंदी कक्षा 9वीं पाठ 2.3

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कलातीर्थ: खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय लेख डॉ. राजन यादव


               कलात्मक सौंदर्य का संबंध जीवन और समाज से होता है। युग की उपलब्धियां और सीमाएं दोनों ही कला में उभरती है। इसलिए कला को भारतीय जीवन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यहां कला के विविध रूपों की साधना हमारी जीवन यात्रा की लंबी और गौरवपूर्ण गाथा है। भारतीय संस्कृति जीतनी पुरानी है,उतनी ही पुरानी इसकी कलाएंँ हैं। भारतीय कला चिंतन में कला को एक साधना माना गया है। प्राचीन आचार्य ने कला को भक्ति से भी जोड़ा है। भर्तृहरि मैं तो साहित्य संगीत और कला से विहीन मनुष्य को नीच और सिंह से रहित साक्षात् पशु कहा है-‘साहित्य संगीत कला विहीन:, साक्षात् पशु पुच्छविषाण हीन:।’भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता का एक कारण उसकी कलात्मकता भी है। संगीत संगीत आदि ललित कला मानव जीवन को पूर्णता प्रदान करती है तथा मानवता को प्रांजल बनाती है। इनमें व्यक्ति का व्यक्तित्व तो भास्कर होता ही है, समष्टि चेतना भी समन्वित रूप में बलवती होती है। भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर इन्हीं कलाम के संवर्धन और संरक्षण में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ का योगदान अविस्मरणीय है। विगत 56 वर्षों में विश्वविद्यालय ने उन्नति के अनेक शिखर छुए हैं।

                खैरागढ़ भारत के मध्य भाग में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले के अंतर्गत आता है। यहां का ग्रामीण एवं शांत परिवेश विश्वविद्यालय की कला और कला साधना में विशेष सहायक है। यहां रियासत कालीन कलात्मक व गुलाबी रंग के महल की अपनी विशेषता है। नागवंश के दानवीर राजा रानी में अर्ध शक्ति पहले जो संगीत की बगिया लगाई थी, उसमें आज संगीत ही नहीं, सभी ललित कलाओं के बहुरंगी व बहुगंदी पुष्प विकसित हो रहे हैं।

              खैरागढ़ राज्य और नाग वंश के अतीत पर दृष्टि डालें तो खैरागढ़ के इतिहास का आरंभ खोलवा परगना से होता है जिसे मंडला के राजा ने लक्ष्मी निधि कारण राय को उनकी वीरता के लिए सन 1487 में पुरस्कार स्वरूप दिया था। इन्हीं के चारण कवि दलपतराम ने इस क्षेत्र के लिए पहली बार छत्तीसगढ़ शब्द का प्रयोग अपनी कविता में 1497 ईस्वी में किया था। स्व. लाल प्रद्युमन सिंह रचित ग्रंथ नागवंश के अनुसार वर्तमान खैरागढ़ में नागवंशी राजाओं के इतिहास का आरंभ राजा खड़ग राय से हुआ। अरे खोल वाह राज्य के 16 तथा नई राजधानी खैरागढ़ के प्रथम राजा थे। उन्होंने पिपरिया, मुस्का तथा आमनेर नदी के मध्य अपने नाम से एक नगर बसाया। उस नगर के चारों ओर खैर वृक्षों की अधिकता थी। इतिहासकार दोनों मान्यताओं से सहमत है कि राजा खड़ा कराया खैर वृक्षों की अधिकता की वजह से नगर को खैरागढ़ कहा जाने लगा।

              कालांतर में हूं कि ना कौन सी राजा उमराव सिंह व राजा कमल नारायण सिंह जैसे प्रजापत सर विद्यालय रागी कला प्रेमी तथा साहित्य जाकर आ जाओ विश्वास तथा संगीत कला पर विशेष ध्यान दिया। प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक वैभव से संपन्न इसी धरती के मनोहर प्रांगण में आज से 56 वर्ष पूर्व एक अपूर्व विश्वविद्यालय का अविर्भाव हुआ। गुरु शिष्य परंपरा से पल्लवी संगीत की शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय की परिकल्पना भी बाल्यावस्था में थी उसी समय तत्कालीन मध्य प्रदेश के अंतर्गत छत्तीसगढ़ में स्थित खैरागढ़ नगर को इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना का गौरव प्राप्त हुआ यहां के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह एवं रानी पद्मावती देवी की प्रसिद्धि सदा मुस्कती ही रहेगी जिन्होंने अपनी दिवंगत पुत्री राजकुमारी इंदिरा की स्मृति में संपूर्ण राजभवन का उदारता पूर्वक दान करके इस विश्वविद्यालय की स्थापना की 14 अक्टूबर 1956 ईस्वी में श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसका उद्घघाटन किया यहीं से मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के सहयोग से एशिया के अस्पताल एवं एकमात्र विश्वविद्यालय की स्वर्ण यात्रा आरंभ हुई।

               इस विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति पद्मभूषण पंडित एसएन राजेंद्र करने संगीत के आरंभिक पाठ्यक्रम बनाने में महत्व दान रहा। उन्होंने संगीत की शिक्षा को घराना की चहारदीवारी से निकालकर संस्थागत किया। शास्त्र और प्रयोग को एक दूसरे के नजदीक लाने और जोड़ने का कार्य किया इससे गीत, संगीत और नृत्य की शिक्षा के प्रति समाज का दृष्टिकोण सकारात्मक हुआ।

             वर्तमान में विश्व विद्यालय के शिक्षण विभाग द्वारा संगीत कला चित्र कला मूर्तिकला छापा कला लोक कला तथा साहित्य संबंधित डिप्लोमा स्नातक तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम संचालित है। यहां के बीए बीए (ऑनर्स) संगीत नृत्य लोक संगीत तथा बी एफ ए एम ए एम एस ए के पाठ्यक्रम रोजगार मूलक तथा जीवन पर्यंत उपयोगी है यहां गायन पक्ष में हिंदुस्तानी गायन  कर्नाटक गायन सुगम संगीत कथा लोक संगीत की प्रभावी शिक्षण व्यवस्था है। नृत्य पक्ष में कत्थक भरतनाट्यम तथा ओडिसी नृत्य शास्त्री और प्रयोगात्मक शिक्षा दी जाती है वाद्य पक्ष में तबला वायलिन सितार सरोद नाटक बेला तथा लोक वाद्यों की शिक्षा दी जाती है। दृश्य कला के अंतर्गत चित्र कला मूर्तिकला तथा छापा कला में स्नातकोत्तर तक की शिक्षा व्यवस्था है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यू जीसी द्वारा स्वीकृत 2 स्पेशलाइजेशन पाठ्यक्रम बैचलर ऑफ वोकेशन वॉक फैशन डिजाइनिंग और टेक्सटाइल डिजाइनिंग का पाठ्यक्रम संचालित करने वाला एकमात्र विश्वविद्यालय है।

              यहां कला संकाय में हिंदी अंग्रेजी संस्कृत भाषा एवं साहित्य के पाठ्यक्रम संचालित है। प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व तथा थिएटर की स्नातकोत्तर की पढ़ाई होती है यहां पर्यावरण से लेकर दैनिक जीवन में उपयोगी अनेक प्रकार की शिक्षा दी जाती है विश्वविद्यालय में दर्जनों मनोरंजक तथा रोजगार मूलक डिप्लोमा तथा सर्टिफिकेट कोर्स संचालित है विश्वविद्यालय में 5 संकाय के 20 विभागों द्वारा संस्थागत जीवन शिक्षण तथा व्यावसायिक शिक्षा दी जाती है छत्तीसगढ़ का यह एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिनके संबंध महाविद्यालय भारत के कई राज्यों में है। संपूर्ण भारत में 24 संबंध महा महाविद्यालयों तथा 35 परीक्षा केंद्रों में पर्याप्त यह विश्वविद्यालय ललित कलाओं का गौरव स्तंभ है। महाविद्यालय तथा 35 परीक्षा केंद्र में पड़ी व्याप्त यह विश्वविद्यालय ललित कलाओं का गौरव स्तंभ है यहां पीएचडी तथा बी लेट तक शोध कार्य होते हैं यहां से प्रकाशित उच्चस्तरीय शोध पत्रिकाएं कला सौरभ कलाकार अभय तथा लिटरेरी डिसकोर्स विश्वविद्यालय के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दर्पण हैं यहां ललित कलाओं के सृजित चित्रकार मूर्तिकार वास्तुकार संगीतकार और काव्य कार सभी नवीन भावनाओं को मूर्त रूप देने के प्रयास में संलग्न है।

           ललित कलाओं की दृष्टि से यहां का ग्रंथ आले भारतवर्ष में प्रथम है जो 43000 से अधिक पुस्तक के ऑडियो (श्रव्यता फो़न) अभिलेख और सीडी भारतीय चित्रकारों की वीडियो स्लाइड्स लोक एवं जनजाति कलाकारों के कला नमूनों की उल्लेखनीय संग्रह से सुसज्जित है ग्रंथ हाला में भव्य श्रव्य कक्ष है जहां विद्यार्थी शोधार्थी तथा कला जिज्ञासु अपने विषय के अनुरूप महान कलाकारों के ऑडियो वीडियो कैसेट्स द्वारा ज्ञान अर्जन करते हैं विश्वविद्यालय के संग्रहालय में कलात्मक अवशेषों का विपुल संग्रह है जो देश के इस हिस्से की बहुत समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करता है शास्त्री एवं लोक संगीत के राज्यों की कला वीथिका भी मनोहारी है विश्वविद्यालय का शिक्षण तथा प्रशासनिक कार्य दो परिसर में संपन्न होता है।

             छत्तीसगढ़ का प्रथम तथा भव्य ऑडिटोरियम विश्वविद्यालय में स्थित है अत्याधुनिक संसाधनों से युक्त रिकॉर्डिंग रूम तथा लैंग्वेज लैब की अपनी विशिष्टता है हाई टेक कंप्यूटर सेंटर तथा योग केंद्र की भी मां की भूमिका है देश विदेशी विद्यार्थियों शोधार्थियों के लिए सुविधा युक्त कोई महिला एवं पुरुष छात्रावास है साथ ही बाहर से आने वाले अतिथियों के ठहरने के लिए अतिथिगृह की भी उत्तम व्यवस्था है इतना ही नहीं यहां का हरा भरा परिसर कला साधकों की साधना के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित करता है।

            इस उत्सव धर्मी विश्वविद्यालय में वर्ष भर राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में कार्यशाला उत्सव प्रदर्शनी आयोजित होती है देश-विदेश के ख्याति लब्ध कलाकार साहित्यकार नाटककार इस कलाकृति में आकर गौरव का अनुभव करते हैं महान नृत्य गुरु पंडित लच्छू महाराज संगीत मर्मज्ञ ठाकुर जय सिंह प्रसिद्ध नृत्यांगना सितारा देवी विश्व प्रसिद्ध सितार वादक पंडित रविशंकर भारत रत्न लता मंगेशकर छत्तीसगढ़ माटी के विश्वविख्यात रंग निदेशक हबीब तनवीर प्रख्यात कला विदुषी डॉ कपिला वात्स्यायन चित्रकला के पुरोधा सैयद हैदर रजा विश्व प्रसिद्ध कलाकार जोहरा शाहगंज सदृश्य अनेक विभूतियां इस विश्वविद्यालय में मानद डी लिट से सम्मानित हुई है।

            इस कला तीर्थ में भारत पर कविता तथा श्रीलंका पोला इन थाईलैंड ऑस्ट्रेलिया सीजी तुर्की मॉरीशस नेपाल अफगानिस्तान मलेशिया आदि देशों से विद्यार्थी शोधार्थी श्रद्धा भाव से आते हैं अलग-अलग स्थानों से आए विभिन्न संस्कृतियों के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम एवं शोध आवश्यकताओं की अपेक्षा पूरी होती है यहां की अनूठी प्रकृति विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध पारंपरिक भारतीयता के ज्ञानार्जन की अनुभूति कराती है।

             कलाकार को मनुकूल परिवेश के लिए ऐसे समाज की तलाश होती है जिससे दीवानेपन का भाग ना हो और वह पड़ोस के समुदाय से भावनात्मक रूप से जुड़ सकें महात्मा गांधी ने 23 नवंबर 1924 में प्रसिद्ध संगीतज्ञ श्री दिलीप कुमार राय से कला के संबंध में बातें करते हुए कहा था “कलाकार जब कला को कल्याणकारी बनाएंगे और जनसाधारण के लिए सुलभ कर देंगे तभी उस कला को जीवन में स्थान मिलेगा जब कला लोक की ना रहकर थोड़े लोगों की रह जाती है तब मैं मानता हूं कि उसका महत्व कम हो गया।”

              राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भावना के अनुरूप इस कला तीर्थ के प्रथम कुलपति राजनकर हो या प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र जी का राम कथा गायक व विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ अरुण कुमार सेन हूं अब तक कार्यरत विश्वविद्यालय के समस्त कुलपति ओ शिक्षकों संगीतकारों में कर्मचारियों ने इसके संरक्षण और संवर्धन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है उत्थान से लेकर अब तक के बीच में कुलपति प्रो मांडवी सिंह ने ललित कला को समर्पित इस विश्वविद्यालय के विकास में प्रभावी भूमिका का निर्वाह किया है यहां राज्य सरकार के सहयोग से हर वर्ष खैरागढ़ महोत्सव का भव्य आयोजन होता है जिसमें देश विदेश के प्रणाम धन्य कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय आज प्रदेश का पहला विश्वविद्यालय है जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नेशनल एसेसमेंट एंड एक्रीडिटेशन काउंसिल) द्वारा 24 सितंबर 2014 को विश्वविद्यालय को प्रत्याशित करे दर्जा प्राप्त हुआ देश के प्रतिष्ठित संस्थान रिक्रूटमेंट केंद्रीय विश्वविद्यालय आते हैं जिसमें वहां के विद्यार्थी चयनित होते हैं राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार व फैलोशिप पप्त शिक्षक भारती तथा विद्यार्थी यहां की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए क्रियाशील है।

कलातीर्थ : खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय :- डाॅ राजन यादव
कलातीर्थ : खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय :- डाॅ राजन यादव

              यहां से दीक्षित कलाकार देश विदेश में भारतीय कला संस्कृति के ध्वजवाहक बने हुए हैं क्योंकि कला राष्ट्र के जीवन का एक मुख्य अंग है उससे ही हमारे जीवन को रस सुकुमार ता और सह्रदयता का आहार मिलता है आज अन्य देशों के लोगों ने अपनी जीत संस्कृति के आधार पर अपने विचार विचार और समस्त जीवन को कार्यान्वित किया है उससे वह रहे हैं मुझे भारतीय जीवन की सरलता मधुरता का उपयोगिता को अपनाने में सुख शांति का अनुभव कर रहे हैं भारतीय कृतियों में आनंद को समस्त कलाओं का एक मात्र लक्ष्य माना गया है स्वामी विवेकानंद के अनुसार समस्त कार्य चित्र कला और संगीत शब्द रंग और तूने के द्वारा भावना की ही अभिव्यक्ति है हमारी अवधारणा में मुंशी कोई पदार्थ नहीं पूर्ण चेतन है जो परमेश्वर का ही सांस्कृतिक प्रतिनिधि माना गया है यहां के कला साधक यही बोध कराने के लिए क्रियाशील है गायन विभाग के पूर्व प्रवक्ता डॉ अभिनेता सेन द्वारा रचित एवं स्वर बंद विश्वविद्यालय की कुल गीत में भी जन कल्याणकारी भावना प्रतिबिंबित होता है-
पृथ्वी पर जीवन नव कोणों में, विकसित होता जाए।
धन्य विश्वविद्यालय पावन, स्वर्ग धरा पर लाए।।

               इस कला तीर्थ का ध्येय वाक्य-सुस्वराः सन्तु सर्वेऽपि अर्थात सभी सुंदर स्वर वाले हो। कला के पथ पर निरंतर अग्रसर होते हुए हमारी समृद्ध संस्कृति का वाहक यह विश्वविद्यालय अपने ध्येय वाक्य की सार्थकता को सिद्ध कर रहा है।

कलातीर्थ : खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय :- डाॅ राजन यादव
कलातीर्थ : खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय :- डाॅ राजन यादव
कलातीर्थ : खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय :- डाॅ राजन यादव

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