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एक था पेड़ और एक था ठूंठ (निबंध ) कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर हिंदी कक्षा 10 वीं पाठ 6.2

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कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर: जीवन परिचय

कन्हैयालाल मित्र प्रभाकर हिन्दी के जाने-माने निबंधकार हैं। इन्होंने राजनैतिक और सामाजिक जीवन से संबंध रखने वाले कई निबंध लिखे हैं। इन्होंने भारत के स्वाधीनता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, जिसके कारण कई बार इन्हें जेल भी जाना पड़ा। वस्तुतः साहित्य के माध्यम से प्रभाकर जी गुणों की खेती करना चाहते थे और अपनी पुस्तकों को शिक्षा के खेत मानते थे जिनमें जीवन का पाठ्यक्रम था। वे अपने निबंधों को विचार यात्रा मानते थे और कहा करते थे- इनमें प्रचार की हुंकार नहीं, सच्चे मित्र की पुकार है, जो पाठक का कंधा थपथपाकर उसे चिंतन की राह पर ले जाती है। उनका मुख्य कार्यक्षेत्र पत्रकारिता था। ये ज्ञानोदय के संपादक भी रहे।

इनकी प्रमुख रचनाएँ – जिंदगी मुसकाई, माटी हो गई सोना, दीप जले शंख बजे आदि।

एक था पेड़ और एक था ठूंठ (निबंध ) कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर

जिस मकान में मैं ठहरा, उसकी खिड़की के सामने ही खड़ा था एक पूरा, पनपा बाँझ का पहाड़ी पेड़। पलंग पर लेटे-लेटे वह यों दिखता कि जैसे कुशल-समाचार पूछने को आया कोई मेरा ही मित्र हो। एक दिन उसे देखते-देखते इस बात पर मेरा ध्यान गया कि यह इतना बड़ा पेड़ हवा का तेज़ झोका आते ही पूरा-का-पूरा इस तरह हिल जाता है, जैसे बीन की तान पर कोई साँप झूम रहा हो और उसका ऊपर का हिस्सा, हवा जब और तेज़ हो जाती है तो काफ़ी झुक जाता है, पर हवा के धीमे पड़ते ही वह फिर सीधा हो जाता है।

हवा मौज में थी, अपने झोंकों में झूम रही थी, इसलिए बराबर यह क्रिया होती रही और मैं उसे देखता रहा। देखता क्या रहा, उसकी झुक-झूम में रस लेता रहा। पड़े-पड़े वह पेड़ पूरा न दिखता था, इसलिए मैं पलंग से खिड़की पर आ बैठा। अब मुझे वह पेड़ जड़ से खूगल तक दिखाई देने लगा और मेरा ध्यान इस बात की ओर था कि हवा कितनी भी तेज़ हो, पेड़ की जड़ स्थिर रहती है – हिलती नहीं है।

एक था पेड़ और एक था ठूंठ (निबंध ) कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर

यहीं बैठे मेरा ध्यान एक दूसरे पेड़ पर गया, जो इस पेड़ से काफी निचाई में था। पेड़ का दूंठ सूखा वृक्ष और सूखा वृक्ष माने निर्जीव-मुरदा वृक्षा सोचा, यह वृक्ष का कंकाल है, जैसा एक दिन सभी को होना है। अब मैं कभी इस हरे-भरे पेड़ की ओर देखता, कभी उस सूखे ढूँठ की तरफ। यों ही देखते-भालते मेरा ध्यान इस बात की ओर गया कि वह धीमे चले या वेग से यह ह्ठ न हिलता है. न झुकता है।

न हिलना, न झुकना; मन में यह दो शब्द आए और मैंने आप ही आप इन्हें अपने में दोहराया- न हिलना. न झुकना।

दूर अंतर में कुछ स्पर्श हुआ, पर वह स्पर्श सूक्ष्म था, यों ही संकेत सा। शब्द चक्कर काटते रहे, न हिलना। न झुकना और तब आया वह वाक्य-न हिलना, न झुकना जीवन की स्थिरता का, दृढ़ता का चिह्न है और वह वीर पुरुष है, जो न हिलता है. न झुकता है। तभी मैंने फिर देखा उस ठूंठ की ओर। वह न हिल रहा था, न झुक रहा था।

मन में अचानक प्रश्न आया- न हिलना, न झुकना जीवन की स्थिरता का चिह्न है, पर उस ढूँठ में जीवन कहाँ है? यह तो मुरदा पेड़ है।

अब मेरे सामने एक विचित्र दृश्य था कि जो जीवित था, वह हिल रहा था, और जो मृतक था वह न हिल रहा था, न झुक रहा था। तो न हिलना, न झुकना जीवन की स्थिरता का चिह्न हुआ या मृत्यु की जड़ता का?

अजीब उलझन थी, पर समाधान क्या था? मैं दोनों को देख रहा था, देखता रहा और तब मेरे मन में आया कि जो परिस्थितियों के अनुसार हिलता, झुकता नहीं, वह वीर नहीं, जड़ है; क्योंकि हिलना और झुकना ही जीवन का चिह्न है। हिलना और झुकना; अर्थात् परिस्थितियों से समझौता। जिस जीवन में समझौता नहीं, समन्वय नहीं सामंजस्य नहीं, वह जीवन कहाँ है? वह तो जीवन की जड़ता है; जैसे यह ढूँठ और जैसे यह पहाड़ का शिखर।

मुझे ध्यान आया कि जीते-जागते जीवन में भी एक ऐसी मनोदशा आती है, जब मनुष्य हिलने और झुकने से इनकार कर देता है। अतीत में रावण और हिरण्यकश्यप इस दशा के प्रतीक थे तो इस युग में हिटलर और स्टॉलिन, जो केवल एक ही मत को सही मानते रहे और वह स्वयं उनका मत था। आज की भाषा में इसी का नाम है डिक्टेटरी, अधिनायकता।

विश्व की भाषा – दे. ले।

विश्व की जीवन-प्रणाली है – कह. सुन।

विश्व की यात्रा का पथ है – मान, मना।

इन तीनों का समन्वय है – हिलना-झुकना और समझौता-समन्वय जिसमें यह नहीं है, वह जड़ है, भले ही वह दूँठ की तरह निर्जीव हो या रावण की तरह जिद्दी।

मेरी खिड़की के सामने खड़ा हिल रहा था बाँझ का विशाल पेड़ और दूर दिख रहा था वह ढूँठ। समय की बात; तभी पास के घर से निकला एक मनुष्य और वह अपनी छोटी कुल्हाड़ी से उस ढूँठ की एक छोटी टहनी काटने लगा। सामने ही दिख रही थी-सड़क, जिस पर अपनी कुदाल से काम कर रहे थे कुछ मजदूर।

एक था पेड़ और एक था ठूंठ (निबंध ) कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर

कुल्हाड़ी और कुदाल; कुदाल और कुल्हाड़ी- मैने बार-बार इन शब्दों को दोहराया और तब आया मेरे मन में यह वाक्य-विश्व की भाषा है, दे, ले; विश्व की जीवन प्रणाली है कह, सुन, विश्व की यात्रा का पथ है-मान, मना; अर्थात् हिल भी और झुक भी, पर जो इन्हें भूलकर जड़ हो जाता है, वह ह्ठ हो, पर्वत का शिखर हो. अहंकारी मानव हो, विश्व उससे जिस भाषा में बात करता है उसी के प्रतिनिधि हैं ये कुल्हाड़ी- कुदाल।

साफ-साफ यों कि जीवन में दो भी, लो भी, कहो भी, सुनो भी, मानो भी, मनाओ भी; और यह सब नहीं, तो तैयार रहो कि तुम काट डाले जाओ, खोद डाले जाओ, पीस डाले जाओ।

मैं खिड़की से उठकर अपने पलंग पर आ पड़ा। बाँझ का पेड़ अब भी हिल रहा था, झुक रहा था, झूम रहा था, पर तभी मेरे मन में उठा एक प्रश्न- तो क्या जीवन की चरितार्थता बस यही है कि जीवन में हवा का झोंका आया और हम हिल गए? जीवन में संघर्ष का झटका आया और हम झुक गए? साफ-साफ यों कि यहाँ. वहाँ हिलते-झुकते रहना ही महत्वपूर्ण है और जीवन की स्थिरता-दृढ़ता, जीवन के नकली सत्य ही प्रश्न क्या है, कम्बख्त बिजली की तेज़ शॉक है यह, जो यों धकियाता है कि एक बार तो जड़ से ऊपर तक सब पाया संजोया अस्त व्यस्त हो उठे। सोचा- नहीं जी, यह हिलना और झुकना जीवन की कृतार्थता नहीं. अधिक से अधिक यह कह सकते हैं कि विवशता है। जीवन की वास्तविक कृतार्थता तो न हिलना. न झुकना ही है यानी दृढ़ रहना ही है।

मैं अपने पलंग पर पड़ा देखता रहा कि बाँझ का पेड़ झुक रहा है, झूम रहा है, हिल रहा है. और दूर पर खड़ा ठूठ न हिलता है, न झुकता है। जीवन है वृक्ष में, जो जीवन की कृतार्थता-दृढ़ता से हीन है और वह दृढ़ता है ठूठ में, जो जीवन से हीन है; अजीब उलझन है यह।

तभी हवा का एक तेज झोका आया और बाँस हिल उठा। मेरी दृष्टि उसकी झूमती देह यष्टि के साथ रपटी रपटती उसकी जड़ तक चली गई और तब मैंने फिर देखा कि हवा का झोंका आता है तो टहनियाँ हिलती है. तना भी झूमता है पर अपनी जगह जमी रहती है उसकी जड़। हवा का झोंका हल्का हो या तेज, वह न झुकती है न झूमती है।

अब स्थिति यह कि कभी मैं देख रहा हूँ स्थिर जड़ को और कभी हिलते-झूमते ऊपरी भाग को। लग रहा है कि कोई बात मन में उठ रही है और वह उलझन को सुलझाने वाली है, पर वह बात क्या है? बात मन की तह से ऊपर आ रही है – ऊपर आ गई है।

बात यह है कि हमारा जीवन भी इस वृक्ष की तरह होना चाहिए कि उसका कुछ भाग हिलने झुकने वाला हो और कुछ भाग स्थिर रहने वालाए यह जीवन की पूर्ण कृतार्थता है।

बात अपने में पूर्ण है, पर जरा स्पष्टता चाहती है और वह स्पष्टता यह है कि हम जीवन के विस्तृत व्यवहार में हिलते-झुकते रहें, समन्वयवादी रहें, पर सत्य के सिद्धांत के प्रश्न पर हम स्थिर रहें, दृढ़ रहें और टूट भले ही जाएँ, पर हिलें नहीं, समझौता करें नहीं।

जीवन में देह है, जीवन में आत्मा है। देह है नाशशील और आत्मा है शाश्वत, तो आत्मा को हिलना- झुकना नहीं है और देह को निरंतर-हिलना झुकना ही है, नहीं तो हम हो जाएँगे रामलीला के रावण की तरह, जो बॉस की खपच्चियों पर खड़ा रहता है- न हिलता है न झुकता है।

हमारे विचार लचीले हों, परिस्थितियों के साथ वे समन्वय साधते चलें, पर हमारे आदर्श स्थिर हों। हमारे पैरों में जीवन के मोर्चे पर डटे रहने की भी शक्ति हो और स्वयं मुड़कर हमें उठने-बैठने-लेटने में मदद देने की भी। संक्षेप में जीवन की कृतार्थता यह है कि वह दृढ़ हो, पर अड़ियल न हो।

दृढ़, जो औचित्य के लिए, सत्य के लिए टूट जाता है, वह हिलता और झुकता नहीं। अड़ियल जो औचित्य और अनौचित्य, समय-असमय का विचार किए बिना ही अड़ जाता है और टूट तो जाता है. पर हिलता झुकता नहीं। दो टूक बात यों कि जीवन वह है जो समय पर अड़ भी सकता है और समय पर झुक भी सकता है पर ठूठ वह है, जो अड़ ही सकता है, झुक नहीं सकता। एक है जीवंत दृढ़ता और दूसरा निर्जीव जड़ता।

हम दृढ़ हों, जड़ नहीं। मैंने देखा, बाँझ का पेड़ अब भी हिल रहा था, झुक रहा था और दूंठ अनझुका अनहिला, ज्यों का त्यों खड़ा था।

शब्दार्थ:-

  • चरितार्थ – घटित होना;
  • कृतार्थ – किसी पर उपकार करना;
  • देहयष्टि – शारीरिक सौष्ठव;
  • रपटी-रपटती फिसली – फिसलती हुई, अड़ियल;
  • औचित्य – जो उचित हो ठीक हो;
  • जीवंत – जीवन युक्त;
  • पनपा कॉपल फूटना, नए पत्ते निकलना;
  • फुगल – फुनगी; लूंठ – सूखा पेड़;
  • जड़ता – स्थिरता, जिसमें कोई हरकत न हो;
  • समाधान – हल;
  • समन्वय – विरोधी चीजों को मिलाना दोनों में तालमेल बिठाना।

अभ्यास

  1. बाँझ के हरे-भरे पेड़ और लूंठ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
  2. हमारे विचार लचीले और समन्वयवादी क्यों होने चाहिए? स्पष्ट कीजिए।
  3. बाँझ के हरे भरे पेड़ और दूंठ किस मानवीय भाव को प्रकट करते हैं? अपने शब्दों में लिखिए।
  4. दृढ़ता और जड़ता में फर्क को पाठ में किस प्रकार से बताया गया है? उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए।
  5. एक था पेड़ और एक था लूंठ पाठ के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

पाठ से आगे अभ्यास

  1. पाठ में जिस प्रकार के मानव स्वभाव का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार के लोग समाज में भी दिखाई पड़ते हैं। उनका प्रभाव लोगों पर कैसे पड़ता है। इस पर आपस में चर्चा कीजिए।
  2. आज की परिस्थितियों में एक आदर्श व्यक्ति के जीवन की विशेषताएँ क्या क्या हो सकती हैं। इस पर समाज के विभिन्न आयु वर्ग के लोगों से वार्ता कर इस विषय पर एक आलेख तैयार कीजिए।
  3. अपने शिक्षक की सहायता से हिटलर, स्टालिन, रावण, हिरण्यकश्यप, डिक्टेटर आदि पर चर्चा के लिए प्रश्नों की सूची बनाइए।
  4. तानाशाही क्या है? तानाशाह की जीवन शै- जैसी होती है? अपने शब्दों में लिखिए।

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