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कक्षा चौथी विषय हिन्दी पाठ 10 संत रविदास

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कक्षा चौथी विषय हिन्दी पाठ 10 संत रविदास

कक्षा में कबीर नानक, दादू गुरु घासीदास आदि संतों की चर्चा कीजिए और साप्त शिविदारक के संबंध में संक्षेप में बताइए। एक अनुच्छेद का आदर्श वाचन कीजिए और बच्चों से अनुकरण वाचन कराइए । संत रविदास के संबंध में अतिरिक्त जानकारी लेकर कक्षा में बताइए। समाज में सब बराबर हैं, यह भी बताएँ। पाठ का एक-एक अनुच्छेद एक-एक समूह को देकर परस्पर चर्चा कराएँ। अन्त में पूरे पाठ पर चर्चा करें।

भारत के इतिहास में एक समय ऐसा था जब धर्म के नाम पर भारतवासियों पर बहुत अत्याचार हुए। उस समय के शासक निर्दोष जनता को लूटने और सताने को ही अपना कर्तव्य समझते थे। उच्च जाति माननेवाले लोग अपने से छोटी जाति को माननेवाले लोगों पर अत्याचार करते थे। दुखी लोगों की पुकार सुननेवाला कोई नहीं था। ऐसे समय में भारत में कई संतों और महात्माओं ने
जन्म लिया। उनमें से एक थे-संत रविदास, जिन्हें संत रैदास भी कहते हैं।


संत रविदास का जन्म माघ पूर्णिमा संवत् 1433 को बनारस के समीप मेंडवाडीह गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम मानदास और माता का करमा देवी था। इनके पूर्वज चमड़े का काम करते थे।
बचपन से ही बालक रविदास की रुचि साधु-महात्माओं के सत्संग में थी। जहाँ भी पूजा-पाठ अथवा हरिकीर्तन होता, वे वहीं पहुँच जाते। ऐसे समय वे प्रायः घर का काम-धाम भूल जाते। उनके ऐसे स्वभाव को देखकर उनके माता-पिता को चिंता हुई कि उनका बेटा कहीं बैरागी न हो जाए। इसलिए उन्होंने रविदास का विवाह कर दिया और यह कहकर- “बेटा, कमाओ और खाओ,” उन्हें घर से अलग कर दिया।


पत्नी लूणादेवी के साथ रविदास घास-फूस की झोपड़ी बनाकर रहने लगे। वे चमड़े का काम करते और उसी आय पर अपना जीवन निर्वाह करते। कुछ वर्षों के पश्चात् उनके यहाँ एक पुत्र-रत्न भी पैदा हुआ।


विवाह-बधन रविवार को ईश्वर भक्ति से विमुख नहीं रख सका। साधु-सेवा.
सत्सग तथा पूजा-पा० निरंतर चलता रहा। उन दिनों स्वामी रामानंद जी की भक्ति, ज्ञान तथा विदवता की प्रसिद्धि पूरे भारत में फैली हुई थी। वे बनारस के ही रहनेवाले थे। प्रभु-भक्ति के प्यासे रविदास स्वामी जी के चरणों में पहुंच गए। शिष्य की अथाह भक्ति ने स्वामी जी का हदय जीत लिया।
रविदास स्वामी रामानंद के शिष्य बन गए। अब रविदास को अपना लक्ष्य प्राप्त करने का मार्ग मिल गया।
संत रविदास संत कबीर के गुरु भाई भी हो गए। दोनों जात-पात तथा ऊँच-नीच में विश्वास नहीं रखते थे। दोनों ने समाज के झूठे आडंबरों का विरोध किया। रविदास विनम्र और मधुर भाषी थे। यही कारण है कि समाज के बहुत से लोगों ने उनके विचारों को बहुत ध्यान से सुना और उन्हें ग्रहण किया।
गुरु रविदास के शिष्यों तथा भक्तों की संख्या दिनों-दिन बढ़ने लगी। उनकी इस प्रसिद्धि को जधी जाति के लोग सह नहीं सके। ये काशी नरेश वीरदेव सिंह के दरबार में पहुंचे। उन्होंने रविदास की शिकायत की- “महाराज, आपके राज्य में रविदास नाम का एक व्यक्ति है। वह अपने आपको बड़ा भक्त समझाता है। वह लोगों को गुमराह कर रहा है। वह कहता है कि सभी लोग बराबर है। यदि ऐसे विरोधी व्यक्ति के कामों को न रोका गया तो समाज छिन्न-भिन्न हो जाएगा।”
राजा ने उन लोगों की बात शांतिपूर्वक सुनी और कहा – “एक पक्ष की बात सुनकर ही निर्णय दे देना राजा का धर्म नहीं। मैं स्वयं सत जी से मिलूंगा और तभी कोई निर्णय करूँगा।”
दूसरे दिन काशी नरेश संत रविदास की कुटिया पर पहुँच गये। संत जी उन्हें देखकर चकित रह गए। उन्होंने आदरपूर्वक राजा से उनके आने का प्रयोजन पूछा।
राजा बोले- संत जी, मैं आपसे कुछ पूछने आया हूँ। क्या आप लोगों को यह शिक्षा दे रहे है कि समाज में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता? क्या समाज में सभी बराबर हैं?
संत रविदास मुस्कराए और निर्भय होकर बोले-

“रविदास जन्म के कारण होत न कोऊ नीच।
नर दूंनीच करति है, ओछे करम की कीच।।
जात-पात के फेर महि, उरमि रहइ सब लोग।
मानवता के.खात है, रविदास जात का रोग।।


काशी नरेश ध्यानमग्न होकर संत जी की वाणी सुन रहे थे।
संत जी ने बात जारी रखी- “राजन, जन्म और जाति से कर्म बड़ा है। जो कर्म से ऊँचा है. वही वास्तव में ऊँचा है। राजा भी वही महान है जो न्यायकारी है। अन्यायी राजा, यदि ऊँचे कुल का भी होगा, तो भी उसे हीन ही समझा जाएगा।”
काशी नरेश ने संत जी के घरण पकड़ लिए और विनय की- “गुरु जी, इस प्राणी को भी स्वीकार कीजिए। मेरा भी उधार कीजिए।”

संत रविदास ने काशी नरेश का कल्याण तो किया ही भारत के असंख्य लोगों को मानव-प्रेम और ईश्वर भक्ति का पाठ भी पढ़ाया। उनकी प्रसिद्धि देश के कोने-कोने में फैल गई। चित्तौड़ के महाराणा साँगा सहित कई राजाओं ने उनकी शिक्षा को ग्रहण किया। कृष्ण-भक्ति की दीवानी मीराबाई ने तो सनसे दीक्षा भी ली थी। गुरु नानक जी तो बात-बात में संत रविदास जी वी वाणी का उल्लेख करते थे।
संत रविदास के जीवन की एक घटना का कई जगह उल्लेख हुआ है। कहते है कि कोई सिद्ध पुरुष उनकी कुटिया पर पहुंचे। संत जी का जीवन बहुत ही साधारण था। उन सिद्ध पुरुष को संत जी की आर्थिक स्थिति देखकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने संत जी को अभावमय जीवन में परिवर्तन लाने के लिए उन्हें एक मणि देनी चाही। उसकी विशेषता बताते हुए सिद्ध पुरुष ने बताया, “यह मणि अपने स्पर्श से लोहे की वस्तु को सोने की बना देगी। इससे भारत दरिद्रता दूर हो जाएगी।”
संत रविदास ने कहा- “महाराज! मुझे धन की कोई इच्छा नहीं। आप यह मणि अपने पास ही रखिए।
सिद्ध पुरुष ने जब बहुत अधिक जोर दिया तो संत रविदास ने कहा, “महाराज आप इतना आग्रह कर रहे हैं तो आप ही इसे झोपड़ी में कहीं रख दीजिए।
सिद्ध पुरुष उस मणि को झोपड़ी में, घास-फूस के बीच में, रखकर चले गए। एक वर्ष बाद वे फिर से संत रविदास से मिलने आए। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि रविदास की आर्थिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। उन्होंने संत जी से पूछा- “संत जी मैं आपको मणि देकर गया था। उसका आपने क्या किया?”
संत रविदास बोले- “महाराज! वह, जहाँ आप रख गए थे, वहीं देख लीजिए। वह वहीं होगी।
सिद्ध पुरुष ने तलाश किया तो वह मणि उन्हें उसी जगह पर रखी मिली। उन्हें लगा कि यह व्यक्ति निर्लोभी है। इसे धन की कोई कामना नहीं।
संत रविदास उच्च कोटि के भक्त होने के साथ ही कबीर के समान एक उच्च कोटि के समाज-सुधारक भी थे। वे जाति-प्रथा के विरोधी थे। समाज में कोई छोटा, कोई बड़ा नहीं।
सब समान हैं। वे हिंदू-मुसलमानों की एकता में विश्वास करते थे। उन्होंने लिखा है-
मंदिर मसजिद दोउ एक है, उन महँ अंतर नाहिं।
रविदास राम रहमान का. झगड़ा कोऊ नाहिं।।
उन्होंने हिंदू-मुसलमानों के बीच फैले द्वेष को मिटाने का प्रयत्न किया। हम इनकी
महानता इसी बात से ओंक सकते हैं कि मीराबाई जैसी कृष्ण-भक्ति में सूची राजघराने की महिला ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। युगों-युगों तक गुरु रविदास की वाणी भूले-भटक लोगों को मानव-प्रेम का पाठ पढ़ाती रहेगी।

प्रश्न और अभ्यास


प्रश्न 1 संत रविदास का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?
प्रश्न 2 संत रविदास के विचारों से सहमत अन्य संत-महात्माओं के नाम लिखो।
प्रश्न 3 काशी के लोग संत रविदास से क्यों नाराज थे?
प्रश्न 4 संत रविदास ने जनता को क्या उपदेश दिए?
प्रश्न 5 किस घटना से प्रभावित होकर काशी नरेश संत रविदास की शरण में गए?
प्रश्न 6 किस घटना के कारण हम यह कह सकते हैं कि संत रविदास के मन में धन के प्रति कोई आकर्षण नहीं था?
प्रश्न 7 निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर के चार-चार विकल्पों में से सबसे सही विकल्प चुनकर लिखो।
अ. रविदास के माता-पिता चिंतित रहते थे-
(क) क्योंकि वे पढ़ते-लिखते नहीं थे।
(ख) क्योंकि वे साधु-संतों के पीछे लगे रहते थे।
(ग) क्योंकि वे बड़े हो गए थे, उन्हें उनका विवाह करना था।
(घ) क्योंकि वे हरिकीर्तन में घर का काम-धाम भूल जाते थे।

कक्षा चौथी विषय हिन्दी पाठ 10 संत रविदास