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खनिज संसाधन और औद्योगिकीकरण कक्षा 10वीं सामाजिक विज्ञान भूगोल खंड पाठ 4

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खनिज संसाधन और औद्योगिकीकरण कक्षा 10वीं

कक्षा 10वीं सामाजिक विज्ञान भूगोल खंड पाठ 4 खनिज संसाधन और औद्योगिकीकरण

खनिज किसके हैं ?

हर प्रकार का खनिज सार्वजनिक संपत्ति यानी सभी भारतीयों की साझी संपत्ति है जिसका उपयोग सबके हित के लिए किया जाना है। सभी लोगों की ओर से केन्द्रीय और राज्य सरकारें इनके उपयोग का संचालन करेंगी और उनसे मिलने वाली आय का उपयोग सार्वजनिक हित के लिए करेंगी।

खनिज नीति

भारत में खनिज संपदा के उपयोग से संबंधित नीतियाँ हमारे विकास और औद्योगीकरण नीति के विकास के साथ-साथ बदलती रही हैं। खनन नीति निर्माण के तहत कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार करना होता है। पहला पक्ष है, राष्ट्रीय विकास और औद्योगीकरण में खनिजों की भूमिका। यह किसी दौर में औद्योगिक विकास की नीति से संबंधित है।

1990 से पहले विश्व भर के देश चाह रहे थे कि उसके देश के खनिज का उत्खनन और उपयोग उसी देश के लोग और वहाँ की ही कंपनियाँ करें। वे दूसरे देशों को उत्खनन में आने नहीं देना चाहते थे। लेकिन यह 1990 के बाद तेजी से बदलने लगा। आपको याद होगा कि वैश्वीकरण का नया दौर 1990 के दशक में शुरू हुआ था। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, चीन जैसे खनिज प्रचुर देश अपनी नीतियों को बदलने लगे ताकि खनन में निजी कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बढ़ावा मिले, वे नई तकनीकी और पूँजी लेकर आएँ और औद्योगिक उत्पादन की बढ़ती माँग के लिए खनिज संपदा का दोहन करें। इसके साथ ही खनिजों का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार और व्यापार अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा और कोई भी उद्योगपति अपनी जरूरत के खनिज वहाँ से खरीद सकता था।

वर्तमान में सरकारें अपने आपको खनन कार्य तथा खनिज भण्डार खोज से हटा रही हैं और उसे पूरी तरह निजी कंपनियों को दे रही हैं। अब सरकारें मुख्य रूप से तीन कार्य करती हैं। पहला, खनिज संपदा के बारे में वैज्ञानिक जानकारी एकत्र करना और बाँटना। सरकारें अपने देश में कहाँ क्या खनिज संसाधन उपलब्ध हैं इसकी वैज्ञानिक जानकारी इकट्ठा करती हैं और उसे सार्वजनिक करती हैं ताकि विभिन्न कंपनियाँ उनके उत्खनन के लिए आगे आएँ।

दूसरा, खनन उद्योग को विनियमित या रेगुलेट करना। सरकारों का दायित्व है कि खनन कायदे कानून के तहत हों और पर्यावरण व मजदूरों की सुरक्षा को अनदेखा न किया जाए। सरकार कंपनियों को खनिज भण्डार खोजने और उत्खनन की अनुमति देती है और यह सुनिश्चित करती है कि कंपनियों उन शर्तों का पालन करें। तीसरा, खनन से शुल्क या कर वसूल करना। सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि खनिजो से प्राप्त आय का उचित हिस्सा सरकार को शुल्क या टैक्स के रूप में मिले जिसे वह देश के विकास कार्य में लगा सके। इसी तारतम्य में भारत में भी खनिज नीति में बदलाव होने लगा।

भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत 1991 में हुई। 1993 में सरकार ने एक नई राष्ट्रीय खनिज नीति की घोषणा की जिसमें कहा गया कि सरकार केन्द्रीय सार्वजनिक उपक्रमों के लिए आरक्षित खनिज को भी अब निजी क्षेत्रों को देगी। सरकार का कहना था कि उसके पास इतनी पूँजी नहीं है कि वह पर्याप्त मात्रा में निवेश कर पाए और न ही उसके पास इस काम के लिए तकनीकी विशेषज्ञता है। इस कारण से देश खनिज उत्पादन में पिछड़ रहा है और खनिज की बढ़ती अन्तर्राष्ट्रीय माँग का लाभ नहीं उठा पा रहा है। इस वजह से सरकार ने निजी व विदेशी कंपनियों को आमंत्रित करने का निर्णय लिया। 1994, 1999 और 2008 में खनिज कानूनों में संशोधन किए गए ताकि निजी निवेशक और विदेशी कंपनियाँ आसानी से भारतीय खनन उद्योग में निवेश करें।

खनन के निजीकरण के कई प्रभाव पिछले 20 वर्षों में देखे गए हैं जिनका प्रभाव चिन्ताजनक है। भारत के सकल घरेलू उत्पादन में खनन का हिस्सा 2000 में 3 प्रतिशत था जो कि 2014 में घटकर 2.3 रह गया। इसमें जितने लोगों को रोजगार मिला वह इन 14 वर्षों में स्थिर रहा है, यानि न आय बढ़ी है और न ही रोज़गार दूसरी ओर यह देखा गया है कि खनन द्वारा उत्पादन बढ़ा है मगर इससे राज्य को आय कम मिल रही है। इसका प्रमुख कारण यह रहा है कि निजी कंपनियों को बहुत कम शुल्क में उत्खनन के ठेके दिए गए।

तीसरी समस्या यह रही है कि निजी कंपनियाँ खनन के बाद खदानों को बिना किसी भरपाई के छोड़ देती हैं। कहा जाता है कि भारत में सैंकड़ों बड़ी खदानें हैं जो अभी बन्द हैं और पर्यावरण के विनाश की कहानी को बयाँ कर रही हैं। खनन के साथ-साथ पर्यावरण का संरक्षण कैसे हो? निजी कंपनियाँ जो केवल मुनाफा कमाने में रुचि रखती हैं पर्यावरण संरक्षण में पैसे क्यों खर्च करेंगी, उन्हें इसके लिए कैसे बाध्य किया जाए? इन बातों पर अभी चर्चा चल रही है।

भारत में खनिज उन्हीं इलाकों में पाई जाती है जहाँ जंगल अधिक हैं, जहाँ से नदियाँ निकलती हैं और जहाँ अधिकांशतः हमारे जनजाति समूह रहते हैं। खनन के कारण जंगल नष्ट हो रहे हैं। एक आकलन के अनुसार 1981 से अब तक 186000 हेक्टेयर जंगल खनन के लिए कटे हैं। इसके अलावा खनन और खनिजों की धुलाई के लिए स्थानीय जल स्रोतों का भयंकर प्रदूषण होता है। पर्यावरण के इस तरह से खराब होने से वहाँ रहने वाले लोगों की आजीविका खतरे में है। कानून के अनुसार वहाँ रहने वाले जनजाति समुदाय की सहमति से ही खनन किया जा सकता है मगर अकसर इस प्रावधान को सही तरीके से अमल नहीं किया जाता है। फलस्वरूप जनजाति समुदाय संसाधनयुक्त होने के बावजूद सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।

खदानों का दोहन खदान क्षेत्र के बंद होने के पश्चात् के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसके तहत खदान भूमि को दोहन पूर्व की स्थिति में लाना अथवा उसे अन्य उत्पादक कार्य के लिए उपयोगी बनाना (उदाहरणतः खेती इत्यादि) प्रमुख लक्ष्य हैं। सर्वप्रथम खदानी क्षेत्र की ऊपरी मिट्टी (Topsoil) की परत जो खनन के पश्चात् पुनः वनीकरण के लिए अत्यन्त आवश्यक है वहाँ वृक्षारोपण करना होगा। साथ ही क्षेत्र के जैव ईंधन (Biomass) को बनाए रखते हुए छोटे-छोटे क्षेत्रों मे वन लगाए जाएँ जो कि खदानी क्षेत्र की पारिस्थितिकी के पुनर्वास के लिए उपयोगी हैं। खदानी क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव को हरी घास के सुरक्षात्मक कवच द्वारा बचाया जा सकता है।

खनन प्रक्रिया

खनन प्रक्रिया क्या है? किन-किन जगहों पर किस तरह के खनिज का कितना जमाव (निक्षेप) है। भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग तथा उस देश/ राज्य का खनन विभाग सर्वेक्षण के माध्यम से जानकारी जुटाने का काम करते हैं। केन्द्रीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्टों के माध्यम से सरकार ऐसे खनिज निक्षेपित भूमियों की नीलामी करती है। नीलामी की प्रक्रिया में कई कंपनियाँ हिस्सा लेती हैं। प्रक्रिया के अनुसार जिसे भी ठेका (लीज) मिलता है उसे उस भूमि पर संबंधित खनिज के उत्खनन का अधिकार होता है।

कुछ महत्वपूर्ण खनिज और उनके प्रयोग

विश्व में तीन हज़ार से भी अधिक खनिज पाए जाते हैं। ये सभी खनिज हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं।

भारत में खान एवं खनिज विकास विनियमन एक्ट 1957 के अनुसार खनिजों को चार वर्गों में रखा गया है –

1.परमाणु खनिज – यूरेनियम, थोरियम।

2. ऊर्जा खनिज कोयला, खनिज तेल व प्राकृतिक गैस ।

3. धात्विक खनिज – लौह अयस्क, बॉक्साइट, क्रोमाइट, मैंगनीज, ताँबा, सोना, चौंदी, इत्यादि।

4. गौण या अधात्विक खनिज – भवन निर्माण कार्य में आने वाले खनिज, जैसे ग्रेनाइट, हीरा, संगमरमर, चूना पत्थर, कंकड़, बालू, इमारती पत्थर।

खनिजों के गुणधर्म एवं संरचना के आधार पर खनिजों को दो वर्गों में बाँटा जाता है।

धात्विक खनिज और अधात्विक खनिज ।

धात्विक खनिज को भी दो उपवर्गों में बाँटा जाता है।

ऐसे खनिज जिसमें लौह अंश होता है, जैसे-लौह अयस्क, मैग्नीज़, क्रोमाइट, पाइराइट, टंग्स्टन, निकिल और कोबाल्ट।

दूसरा, ऐसे खनिज जिसमें लौह अंश नहीं होता, जैसे- सोना, चाँदी, ताँबा, सीसा, बॉक्साइट, टिन, मैग्नीशियम ।

अधात्विक खनिज में धातुएँ नहीं होती हैं, जैसे चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम आदि।

भारत के प्रमुख खनिज संसाधन हैं-

लौह अयस्क, कोयला, क्रोमाइट, मैंगनीज, टंगस्टन, बॉक्साइट, ताँबा,सीसा, पेट्रोलियम, यूरेनियम इत्यादि।

लौह अयस्क

लौह अयस्क से कच्चा लोहा तथा कई प्रकार के इस्पात तैयार किए जाते हैं। यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आधुनिक विकास का आधार लोहा है। आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि आधुनिक जीवन, कृषि, औद्योगिक उत्पादन, निर्माण और यातायात में लोहा और इस्पात का कहाँ-कहाँ और कितनी मात्रा में उपयोग होता है। इसी कारण कच्चे लोहे का उत्पादन अन्य धातुओं के उत्पादन से भी अधिक होता है। इसकी विशेषता होती है कि इसमें अन्य धातुओं को मिलाकर इसकी मज़बूती और कडेपन को घटाया बढ़ाया जा सकता है। लौह अयस्क शुद्ध रूप में नहीं पाया जाता। चट्टान में लोहे के अतिरिक्त अन्य खनिज भी मिले होते हैं, जैसे-गंधक, फास्फोरस, ऐल्युमिना, चूना, मैग्नीशियम, सिलिका, टिटेनियम आदि। इसे लौह अयस्क कहते हैं। रासायनिक प्रक्रिया के द्वारा लोहे को इनसे अलग किया जाता है।

धातु की मात्रा के अनुसार लौह अयस्क को चार प्रकार में बाँटा जाता है: हेमेटाइट (इसमें 70% लोहा होता है), मेग्नेटाइट (70.4%). लाइमोनाइट (59.63%) तथा सिडेराइट (48.2%)| भारत में अधिकांश भंडार हेमेटाइट और मेग्नेटाइट का है। भारत में लौह अयस्क का अनुमानित भंडार (1 अप्रैल 2010 में) 1788 करोड़ टन है।

हेमेटाइट अयस्क प्रमुखतः प्रायद्वीपीय पठार में पाया जाता है। उच्च कोटि के हेमेटाइट अयस्क के लिए छत्तीसगढ़ का बैलाडीला क्षेत्र, कर्नाटक का बेल्लारी-होस्पेट क्षेत्र तथा झारखण्ड-ओडिशा का सिंहभूमि-सुन्दरवन क्षेत्र प्रमुख है। मेग्नेटाइट किस्म का अयस्क कर्नाटक, गोवा, केरल, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और झारखण्ड में है। झारखण्ड और ओडिशा के लौह अयस्क के भंडार आर्थिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं तथा देश में लोहा व इस्पात कारखानों की स्थिति निर्धारण पर इनका निर्णायक प्रभाव पड़ा है।

छत्तीसगढ़ में 26476 मिलियन टन लौह अयस्क के भंडार हैं जो देश का लगभग 18.67% है। देश में लौह अयस्क उत्पादन में छत्तीसगढ़ तीसरे स्थान पर है। राज्य का उच्च कोटि का लौह अयस्क भंडार बैलाडील को माना जाता है। दंतेवाड़ा, दुर्ग, कांकेर तथा राजनांदगाँव में लौह अयस्क संचित हैं।

मैंगनीज

मैंगनीज का प्रमुख उपयोग लोहा-इस्पात उद्योग में किया जाता है जहाँ उसे लोहे के साथ मिलाकर इस्पात तैयार किया जाता है। इस्पात में 12 से 14 प्रतिशत मैंगनीज़ होता है। लगभग सारे मैंगनीज का उपयोग लोहा इस्पात उद्योग में ही किया जाता है। मैंगनीज़ युक्त इस्पात अधिक मजबूत, कठोर और घर्षण सहने की क्षमता वाला होता है। मैंगनीज़ इस्पात का उपयोग क्रशर जैसी मशीन बनाने में होता है। क्रशर से चट्टान पीसकर अलग-अलग आकार में गिट्टी बनाया जाता है। इसके अलावा मैंगनीज़ का प्रमुख उपयोग काँच तथा मिट्टी के बर्तन, प्लास्टिक, फर्श के टाइल्स, ग्लास, वार्निश तथा शुष्क बैटरी सेल बनाने में किया जाता है।

भारत में मैंगनीज अयस्क का कुल अनुमानित भंडार (1 अप्रैल 2010 में) 43 करोड़ टन है। सर्वाधिक मैंगनीज भण्डार ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में है।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में 516.66 मिलियन टन उच्च कोटि के मैंगनीज़ अयस्क के भंडार हैं। इसके अलावा मुलमुला, सेमरा, कोलिहाटोला में मैंगनीज अयस्क के जमाव हैं।

क्रोमाइट अयस्क

क्रोमियम का एक मात्र अयस्क क्रोमाइट है। मैंगनीज़ की तरह क्रोमियम का भी उपयोग लोह इस्पात में मिश्रण के लिए किया जाता है। इसके उपयोग से उच्च ताप सहने वाला इस्पात बनता है। इस्पात में क्रोमियम की थोड़ी मात्रा (3%) मिलाने पर रेती (आरी), कुल्हाड़ी, और हथौड़े आदि बनाने के लिए कठोर इस्पात बनता है। इससे थोड़ी अधिक मात्रा (12 से 15%) मिलाने पर उष्मा सह घर्षण और संक्षारण सह इस्पात बनता है जिसका उपयोग रसोई घर के बर्तन – छुरी-काँटा, मशीन की बेयरिंग आदि बनाने में किया जाता है। क्रोमियम के साथ निकिल मिलाने पर इस्पात में भाप, जल, आर्द्र वायु तथा अम्ल द्वारा होने वाले क्षरण को सहने की क्षमता आती है। क्रोमियम के साथ टंग्स्टन, कोबाल्ट और मालिब्डेनम मिलाने से बहुत ही मज़बूत इस्पात तैयार होता है जिसे स्टेलाइट कहते हैं जिससे उच्च वेग वाली मशीनों के पुर्जे बनाए जाते हैं। क्रोमाइट का उपयोग उच्च ताप वाली भट्ठियों में किया जाता है। इसका उपयोग रंग, चमड़ा और वस्त्र उद्योगों में भी किया जाता है। भारत में क्रोमियम का कुल अनुमानित भंडार (1 अप्रैल 2010 में) 20.3 करोड़ टन आँका गया है। ओडिशा में भारत का क्रोमियम का सर्वाधिक भंडार है, ये विशेषकर सुकिन्दा घाटी, कटक एवं जाजपुर जिलों में पाया जाता है।

टंग्स्टन (Tungsten) –

आधुनिक धात्विक उद्योगों में मिश्रित इस्पात (एलॉय स्टील) बनाने में टंग्स्टन का विशेष महत्व है। इसके उपयोग से इस्पात में मजबूती, कठोरता, घषर्ण तथा धक्का सहने की क्षमता बढ़ जाती है। टंग्स्टन-मिश्रित स्टील का उपयोग उच्च श्रेणी के काटने वाले उपकरण और पत्थर छिद्रक उपकरण बनाने में किया जाता है। टंग्स्टन, कोबाल्ट और क्रोनियम मिश्रित स्टेलाइट का प्रयोग कवचपट्ट, बन्दूकें कवच अंतर्वेधक आदि बनाने में किया जाता है। विद्युत उपकरण जैसे बल्ब तथा ट्यूब के फिलामेंट में भी टंग्स्टन का उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें विद्युत प्रवाह को सहने की क्षमता अधिक होता है। विद्युत को प्रकाश में बदलने की इसकी क्षमता इतनी अधिक होती है कि फिलामेंट के लिए इसका विकल्प नहीं ढूंढा जा सका है। यह राजस्थान, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक में पाया जाता है।

ताँबा (Copper)-

ताँबे का उपयोग मानव प्राचीन काल से कर रहा है। ताँबे के टिन मिश्रित करके काँस्य का निर्माण किया गया था। ताँबे के मिश्रण से पीतल भी बनाया जाता है जिसका उपयोग उपकरण, सिक्के आदि बनाने में किया जाता है। उन्नीसवीं सदी में विद्युत के आविष्कार के बाद ताँबे का महत्व बहुत बढ़ गया क्योंकि यह ताप तथा बिजली का सुचालक है तथा रासायनिक क्षरण का अवरोधक है। इसी कारण आधे-से-अधिक ताँबे का प्रयोग विद्युत उद्योग में किया जाता है। ताँबा–मिश्र धातुओं का उपयोग टेलीफोन, रेडियो, रेल उपकरण, हवाई जहाज, जल जहाज़, रेफ्रिजिरेटर, घरेलू उपयोग की अन्य चीजें तथा युद्ध सामग्री बनाने में किया जाता है।

देश के कई भागों में ताँबे की खोज की जा रही है। भारत में ताबा अयस्क का कुल अनुमानित भंडार (1 अप्रैल 2010 में)155 करोड़ टन आँका गया है। फिर भी भारत में ताँबा उत्पादन अपेक्षाकृत कम है और माँग की अधिकता के कारण इसका आयात होता है।

ताँबे का अधिकांश जमाव झारखण्ड, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों में है। साथ ही इसके छोटे संचय गुजरात, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में भी पाए गए हैं। देश का 37 प्रतिशत से अधिक भंडार झारखण्ड राज्य में है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में स्थित मलाजखण्ड ताँबा की खान देश में प्रसिद्ध है।

सीसा (Lead)-

सीसे का उपयोग वर्तमान समय में परिहवन, संचार और बिजली के उत्पादन में होता है। यह भारी, नरम और लचीला होता है। इसका सर्वाधिक उपयोग विद्युत उद्योग में संचालक बैटरी (storage battery) तथा तार गढ़ने के लिए किया जाता है। रसायन उद्योग इसका दूसरा उपभोक्ता है जहाँ टेट्राएथिल सीसा, रंग, प्लास्टिक और कीटानाशक बनाए जाते हैं।भारत में सीसा अयस्क का कुल अनुमानित भंडार (1 अप्रैल 2010 में) एक करोड टन आँका गया है। राजस्थान में इसका सर्वाधिक भंडार है।

बॉक्साइट (Bauxite)-

बॉक्साइट एल्युमिनियम धातु का प्रमुख स्रोत है। भारत में बॉक्साइट के प्रचुर भंडार हैं। भारतीय भूगर्भिक सर्वेक्षण विभाग के अनुसार 2010 में कुल भंडार 348 करोड़ टन था। देश के कुल अनुमानित भंडार का लगभग आधा ओडिशा राज्य में है। इसके अलावा आन्ध्र प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में बॉक्साइट के भंडार हैं। ओडिशा के कालाहांडी, कोरापुट, सम्बलपुर, बलांगिर, और क्योंझर जिले, आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिले, मध्य प्रदेश के शहडोल, मंडला, और बालाघाट जिले तथा छत्तीसगढ़ के सरगुजा, बलरामपुर, रामानुजगंज और कोरबा जिले में बॉक्साइट के विशाल भंडार हैं।

कोयला –

ऊर्जा के स्रोतों में कोयला प्रमुख संसाधन है। प्रारम्भ में कोयले का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता था। कोयला अठारहवीं सदी के औद्योगीकरण का महत्वपूर्ण आधार बना। इसका औद्योगिक उपयोग कई परिवर्तनों से जुड़ा है। अठारहवीं सदी में इसका उपयोग लौह अयस्क को गलाने तथा लोहा इस्पात उद्योग में किया जाने लगा। भाप संचालित इंजन, जिसका उपयोग रेलगाड़ी खींचने, जहाज़ चलाने व कारखाने की मशीनों को चलाने के लिए किया जाता था, कोयले के बिना संभव नहीं हो पाता। वर्तमान में कोयले का उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन में होता है।

भारतीय भूगर्भिक सर्वेक्षण विभाग ने 2006 में अनुमान लगाया है कि 1200 मीटर की गहराई तक कोयले की तहों में लगभग 253 अरब टन कोयला संचित है। यह विश्व के कुल अनुमानित भंडार का केवल एक प्रतिशत है। यह मुख्यतः बिटुमिनस प्रकार का कोयला है जो उत्तम प्रकार का नहीं है। इसमें वाष्पीय पदार्थों तथा राख की मात्रा अधिक है और कार्बन की मात्रा 55 प्रतिशत से अधिक नहीं है। अधिकांश भंडार पूर्वी प्रायद्वीपीय पठार की कुछ नदियों की घाटियों में संचित हैं। इस कारण भारत को प्रति वर्ष 15 से 20 करोड़ टन कोयले का आयात करना पड़ता है।

भारत में कोयला क्षेत्रों का वितरण – भारत में कोयला क्षेत्र निम्नलिखित चार नदी घाटियों में स्थित है।

1. दामोदर घाटी झारखण्ड और पश्चिम बंगाल के कोयला क्षेत्र।

2. सोन घाटी – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कोयला क्षेत्र।

3. महानदी घाटी – छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कोयला क्षेत्र।

4. गोदाबरी घाटी – दक्षिण-पश्चिम मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आन्ध्र प्रदेश के कोयला क्षेत्र।

पेट्रोलियम

आधुनिक युग का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत पेट्रोलियम है लेकिन प्लास्टिक और खाद जैसे रासायनिक उद्योगों में भी इसका बहुतायत उपयोग किया जाता है। भारत में 2015 में लगभग 4 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पन्न किया गया जो कि हमारे कुल उपयोग के एक-चौथाई से कम है। इस कारण भारी मात्रा में पेट्रोलियम और उससे बनी वस्तुएँ आयात करनी पड़ती हैं। 2015 में 19 करोड़ टन पेट्रोलियम और उससे वस्तुएँ आयात की गई। हमारे सकल घरेलू उत्पादन का लगभग पाँच प्रतिशत इस आयात में लगता है जो कि बहुत अधिक है।

1866 में भारत में ऊपरी असम घाटी में तेल खोजने के लिए कुएँ खोदे गए. परन्तु इसका पता 1890 में डिगबोई में लगा। 1893 में यहीं पेट्रोलियम को साफ करने के लिए तेलशोधक कारखाना खोला गया। 1899 में असम आयात कम्पनी की स्थापना की गई। अन्य क्षेत्रों में पेट्रोलियम खोजने का प्रयास किया गया और 1953 में नहरकटिया क्षेत्र की खोज हुई। 1960 में गुजरात के अंकलेश्वर क्षेत्र (वसुधारा) से उत्पादन प्रारंभ हुआ। 1961 के बाद पेट्रोलियम खोजने का काम काफी तेज़ किया गया और गुजरात के विभिन्न पेट्रोलियम क्षेत्रों का पता लगा। साथ ही असम में भी कई क्षेत्र ढूंढे गए। परिणामतः उत्पादन तेज़ी से बढ़ा। यह 1961 के 513 हजार टन से बढ़कर 1975 में 6311 हजार टन हो गया। तट के निकट (अपतटीय) समुद्र में खुदाई 1970 में गुजरात के अलियाबेत में आरंभ की गई। 1975 में मुम्बई हाई का पता लगा और अगले वर्ष से उत्पादन आरंभ हुआ। लगातार प्रयत्न के परिणामस्वरूप पूर्वी तटीय क्षेत्र कावेरी तथा कृष्णा-गोदावरी बेसिनों में भी पेट्रोलियम का पता चला और उत्पादन शुरू हो गया है। राजस्थान के बाड़मेर में पेट्रोलियम का बड़ा भंडार पाया गया है।

भारत में पेट्रोलियम का अनुमानित भंडार 17 अरब टन है। यह स्थलीय तथा अपतटीय क्षेत्र में संचित है। कुल भंडार चार क्षेत्रों में वितरित है। 1. उत्तर पूर्वी क्षेत्र (ऊपरी असम घाटी, अरुणाचल प्रदेश और नागालैण्ड) 2. गुजरात प्रदेश (खंभात बेसिन और गुजरात के मैदान) 3. मुम्बई हाई अपतट प्रदेश तथा 4. पूर्वी तटीय प्रदेश (गोदावरी-कृष्णा और कावेरी बेसिन)।

यूरेनियम और थोरियम –

ये दोनों नाभिकीय या परमाणु ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। भारत में यूरेनियम के स्रोत सीमित होने के कारण भारत को इसे आयात करना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में कर्नाटक के तुम्मलपल्ले और भीमा नदी घाटी में इसके विपुल भण्डार खोजे गए हैं। इसी प्रकार थोरियम भी केरल के समुद्र तट पर पाया गया है। भारत प्रयास कर रहा है कि उसके परमाणु संयंत्रों में थोरियम का उपयोग बढ़े क्योंकि भारत में यह खनिज विपुल मात्रा में पाया जाता है। परमाणु ऊर्जा के स्रोतों पर केन्द्र सरकार का पूर्ण नियंत्रण है और इसका खनन केवल केन्द्र सरकार के उपक्रम कर सकते हैं।

औद्योगीकरण

लगभग दो सौ साल पहले ज़्यादातर लोग खेती का काम करते थे और ज्यादातर उत्पादन भी खेतों से ही आता था। लेकिन आज दुनिया के विकसित देशों के ज्यादातर लोग उद्योगों में तथा उससे जुड़ी सेवाओं में काम करते हैं और बहुत कम लोग खेता में काम करते हैं। भारत में भी हालाँकि 60 प्रतिशत से अधिक लोग खेतों में काम करते हैं.

शक्ति या ऊर्जा / बाज़ार / श्रम/ पूंजी/ प्रौद्योगिकी

नई औद्योगिकी नीति

नई औद्योगिक नीति का प्रभाव :

तीन प्रमुख नीतियाँ बनाई गई हैं, जो निम्नलिखित हैं

उदारीकरण :

उदारीकरण का अर्थ है नियमों व प्रक्रियाओं को आसान बनाकर लाइसेंस परमिट राज को कम करना जिससे विदेशी कंपनियों अपनी प्रौद्योगिकी व तकनीकी के साथ भारत में कारखाने लगा सकें। यह औद्योगिक विकास के लिए किया गया उपाय है जो सातवीं पंचवर्षीय योजना काल में अपनाया गया। आठवीं पंचवर्षीय योजना में इसे और अधिक प्रोत्साहित किया गया।

निजीकरण :

सरकार द्वारा सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में बेचा जाना उन उपक्रमों का निजीकरण करना कहलाता है। विगत सालों में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में घटते लाभ को देखते हुए इनके प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने, घाटे में चल रहे बीमार उपक्रमों को बंद करने की माँग तेजी से बढ़ने लगी। सार्वजनिक उपक्रमों में लगातार बढ़ती समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने अपने आर्थिक सुधार कार्यक्रमों की श्रृंखला के दौर में सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश की नीति अपनाई और इन सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण का मार्ग खोल दिया। इस प्रक्रिया में सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों के अंशों को बेचना आरंभ किया। इससे इनके प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी एवं अतिरिक्त संसाधनों का एकत्रीकरण भी हुआ।

वैश्वीकरण/भूमण्डलीकरण :

1980 व 1990 के दशकों में शुरू हई वैश्वीकरण की प्रक्रिया के तहत पूँजी के साथ-साथ वस्तुएँ और सेवाएँ, अमिक और संसाधन एक देश से दूसरे देश में स्वतंत्रतापूर्वक आ जा सकते हैं। वैश्वीकरण का मुख्य ज़ोर घरेलू और विदेशी प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाने पर है। वैश्वीकरण को हम दो तरह से समझ सकते हैं

1. एक आर्थिक व राजनैतिक प्रक्रिया जिसके तहत उत्पादन और वितरण का अंतर्राष्ट्रीयकरण होता है। अर्थात् देशों के बीच उत्पादन, पूँजी, श्रम, विचारों व संस्कृति के आवागमन या लेन-देन में जो बाधाएँ थीं या हैं, उनका खात्मा। ताकि पूरे विश्व में इन सब बातों का बे-रोकटोक लेन-देन हो सके।

2. वैश्वीकरण को आगे बढ़ाने के लिए सुझाई गई नीतियाँ जिन्हें हम उदारीकरण की नीतियाँ भी कहते हैं।

भारत के वृहत औद्योगिक प्रदेश

भारत के वृहत औद्योगिक प्रदेश

औद्योगिकीकरण के प्रभाव


औद्योगीकरण के कई फायदे हैं –

  • उद्योगों के विकास से बड़े पैमाने पर सामान का उत्पादन होने से काफी सस्ती दरों पर उपभोक्ता के लिए सामान उपलब्ध होता है।
  • औद्योगीकरण से लोगों के जीवन स्तर में काफी वृद्धि होती है।
  • उपभोक्ता वस्तुओं के कई विकल्प उपलब्ध हैं। ग्राहकों को विकल्पों की व्यापक विविधता मिलती है।
  • औद्योगीकरण नए रोज़गार के अवसर पैदा करता है।
  • औद्योगीकरण में आयात और निर्यात के लिए परिवहन का नए तरीके से विकास होता है।
  • संसाधनों का उपयोग किया जाता है।
  • विदेशी मुद्रा की कमाई होती है।
भारत के वृहत औद्योगिक प्रदेश
भारत के वृहत औद्योगिक प्रदेश