कृषि कक्षा 10वीं सामाजिक विज्ञान भूगोल खंड पाठ 3

कक्षा 10वीं सामाजिक विज्ञान
कक्षा 10वीं सामाजिक विज्ञान

कृषि कक्षा 10वीं सामाजिक विज्ञान भूगोल खंड पाठ 3

भारत में फसल ऋतु

भारत में फसल ऋतु कृषि की विशेषता ऐसी है कि कहीं पूरे साल खेती की जा सकती है तो कहीं केवल वर्षा ऋतु में। हमें पता है कि भारत में सालभर एक जैसी जलवायु नहीं होती। इस कारण यहाँ सालभर एक जैसी फसल नहीं उगाई जाती। इसके उदाहरण भारत के विभिन्न भागों में उपलब्ध हैं। जैसे छत्तीसगढ़ के सिंचित क्षेत्रों में बारिश में धान, ठंड में गेहूँ या सब्जियाँ तथा गर्मी के मौसम में सब्जियों की खेती की जाती है। वर्ष के विभिन्न मौसम में फसल की किस्में बदल जाती हैं। भारत में वर्ष को फसलों के उत्पादन की दृष्टि से तीन ऋतुओं में विभाजित किया गया है। इन तीनों ऋतुओं में भारत में उगाए जाने वाली फसलों में भिन्नता है। इस कारण तीनों ऋतुओं में भारत में अलग फसल.देखने को मिलती हैं, जो अग्रांकित हैं।

१. खरीफ :

इस ऋतु का आरम्भ मानसून के आगमन के साथ ही हो जाता है। मानसूनी वर्षा लगभग पूरे भारत में होती है। इससे खेती के लिए पानी की उपलब्धता आसानी से हो जाती है। इसलिए इस ऋतु में देश के लगभग पूरे कृषि भूमि पर खेती की जाती है। इस ऋतु में मुख्यतः अधिक आर्द्रता और उच्च तापमान वाली फसलें उपजाई जाती हैं। इस मौसम की मुख्य फसलें धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मडुआ, तुअर, मूग, उड़द, तिल, मूंगफली, सोयाबीन आदि हैं।

2. रबी :

खरीफ समाप्त होते ही रबी की खेती शुरू हो जाती है जो पूरे शीत ऋतु तक चलती है। इस ऋतु में वर्षा बहुत कम होती है। वर्षा के कम हो जाने के कारण कृषि सिंचित अथवा नमी वाले प्रदेशों में ही की जाती है। इस ऋतु में बोई गई भूमि का रकबा खरीफ की तुलना में बहुत कम हो जाता है। इस ऋतु में शीत बर्दाश्त करने वाली फसलें बोई जाती हैं। रबी की प्रमुख फसलें गेहूँ, जौ, तोरिया, सरसों, अलसी, मसूर, चना आदि हैं। शीतकाल में जहाँ कुछ वर्षा होती है या सिंचाई द्वारा पानी की उपलब्धता अधिक है वहाँ धान की फसल भी ली जाती है। उदाहरण के लिए इस काल में पश्चिम बंगाल में धान की खेती की जाती है।

3. जायद :

शीत ऋतु के बाद इस ऋतु का आगमन होता है। इसे गरमा कृषि भी कहते हैं। इस मौसम में वर्षा नहीं होती है। इसलिए इस समय केवल उन्हीं भागों में खेती की जाती है जहाँ सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है। इस मौसम में बोया गया क्षेत्र और भी संकुचित हो जाता है। आमतौर पर इस मौसम में नदियों के किनारे, झील के निकट निम्न मैदानों के सिंचाई सुविधायुक्त भागों तक ही फसल का क्षेत्र सीमित हो जाता है। अधिकांश भूमि पड़ती पड़ी रहती है। यह मौसम ग्रीष्म काल की फसलों का है। इसमें उच्च तापमान सहने वाली फसलों का उत्पादन होता है। इस मौसम की प्रमुख फसलें खीरा, ककड़ी, तरबूज, सब्जियाँ आदि हैं। इस मौसम में सिंचाई आधारित धान को भी खेती की जाती है जो छत्तीसगढ़ के मैदानी भागों में देखी जा सकती है।

भारत में फसल उत्पादन

फसल उत्पादन का अर्थ कृषि से प्राप्त होने वाली उपज की मात्रा से है। विगत साठ वर्षों में कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है। देश में अनाज का कुल उत्पादन, 1950-51 में 51 मिलियन टन था जो 2010-11 में बढ़कर 244 मिलियन टन हो गया है। अनाज के उत्पादन में विगत 60 वर्षों में पाँच गुना वृद्धि हुई है। इसी काल में जनसंख्या में तीन गुना से अधिक वृद्धि हुई। 1951 में देश की जनसंख्या 36 करोड़ थी जो 2011 में बढ़कर 121 करोड़ हो गई है। इस प्रकार पिछले 60 वर्षों में जनसंख्या की तुलना में अनाज उत्पादन में अधिक वृद्धि हुई है। देश में 1950-51 में दाल का उत्पादन 8 मिलियन टन था जो 2010-11 में 18 मिलियन टन हो गया। इस काल में दाल के उत्पादन में लगभग दो गुना वृद्धि हुई। देश में 1950-51 में तिलहन का उत्पादन 5 मिलियन टन था जो 2010-11 में 32 मिलियन टन हो गया। यह पहले से छः गुना अधिक है। इस प्रकार देश में दाल के उत्पादन में कम वृद्धि हुई।

भारत में फसल उत्पादन 2

भारत में फसल उत्पादन 3

भारत में फसल उत्पादन 4

भूमंडलीकरण एवं भारतीय कृषि

भूमंडलीकरण का आशय किसी देश की अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ समन्वय है। इसका मुख्य उद्देश्य है, व्यापार अवरोधकों को कम करना जिससे वस्तुओं का विभिन्न देशों में बेरोक टोक आदान-प्रदान या व्यापार हो सके।

आज कृषि एक व्यापार बन चुका है। अपने देश की खाद्य सुरक्षा एवं इस व्यापार पर कब्जा करने के लिए विकसित देशों के द्वारा कई कदम उठाए गए हैं जो अग्रांकित हैं।

विकसित देशों की सरकारों द्वारा अपने किसानों को भारी मात्रा में अनुदान दिया जाता है। उदाहरण के लिए चावल उत्पादन में अमेरिका 47 प्रतिशत, यूरोपीय समुदाय 48 प्रतिशत एवं जापान 89 प्रतिशत सहायता देता है। इसी प्रकार गेहूँ उत्पादन में अमेरिका 47 प्रतिशत, यूरोपीय समुदाय 32 प्रतिशत एवं जापान 99 प्रतिशत सहायता देता है। विकसित देशों के द्वारा दिए जाने वाले इस अनुदान के कारण वहाँ के किसानों की फसल लागत कम या नहीं के बराबर हो जाती है। फसल लागत कम होने से विकसित देशों के कृषि उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सस्ते हो जाते हैं। इस कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी माँग अधिक होती है। विकासशील देश ये अनुदान नहीं दे पाते हैं।

भारत में अप्रत्यक्ष रूप से चावल उत्पादन पर 1.17 प्रतिशत एवं गेहूँ उत्पादन पर 3.83 प्रतिशत कर (टैक्स) लिया जाता है। इससे इनके कृषि उत्पाद महँगे होते हैं। अतः अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विकासशील देशों के कृषि उत्पाद पिछड़ जाते हैं। विकासशील देश विकसित देशों के द्वारा कृषि क्षेत्र में दिए जाने वाले अनुदान का हमेशा विरोध करते रहे हैं किन्तु विकसित देशों ने अनुदान देना बन्द नहीं किया है।

जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा जीवन रुपों में उनके आधारभूत स्तर पर हेरफेर कर दी जाती है ताकि उनमें विशिष्ट गुण या तत्व उत्पन्न हो सके। यह कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि को जन्म दे रही है। अब अनाज एवं सब्जियों की किस्मों, उर्वरकों, कीटनाशकों, पौध पोषकों आदि द्वारा कृषि उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई है। अब यह उत्पादन प्रयोगशालाओं में सीमित न रहकर विशाल व्यापारिक स्तर पर हो रहा है। इसमें लगभग पांच बिलियन डालर राशि का निवेश हो गया है। इस उत्पाद में लगे फर्म चार-पाँच करोड़ रुपए प्रतिवर्ष अनुसंधान पर ही खर्च कर देते हैं।

पश्चिमी देशों में ऐसी तीन सौ विज्ञान आधारित फर्म इस कार्य में लगी हुई थीं, जिनको दुनिया की बहुराष्ट्रीय फर्मों, जैसे- एलाइड, साइनामिड, शेबरोन, डूपोट, सीबा-गीगी आदि ने खरीद कर एकपक्षीय एकीकरण कर लिया है। परिणाम यह हुआ है कि एक ही कंपनी यदि बीज बेचती है तो उसके लिए विशिष्ट उर्वरक एवं कीटनाशक भी बेचती है जिसके अभाव में बीज कामयाब नहीं होता। अर्थात् किसानों को बीज खरीदते समय हमेशा उसी कम्पनी से उर्वरक और कीटनाशक खरीदना पड़ता है। इस प्रकार एक देश का किसान उस विदेशी कम्पनी पर आश्रित हो जाता है। इससे विकासशील देशों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।

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