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जीवों का विकास कक्षा 10वीं पाठ 1

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कक्षा 10वीं पाठ 1 जीवों का विकास

पृथ्वी पर हजारों लाखों की संख्या में जीवों की प्रजातियों हैं। इनमें से कुछ जीवों से हम सभी परिचित हैं, कुछ के बारे में हमने सिर्फ सुना है कुछ ऐसे जीव है, जो विलुप्त हो गये हैं, उनके अवशेष या जीवाश्म से ही उनके होने की पुष्टि होती है। इन्हीं में से एक है डायनोसॉर।

डायनोसॉर के खत्म होते होते विशालकाय हाथी जैसे स्तनधारी और अन्य जीवों की संख्या बढ़ने लगी। वर्तमान युग में डायनोसॉर के युग के जीवों की कुछ प्रजातियाँ पाई जाती हैं परंतु डायनोसॉर नहीं पाये जाते।

जरा सोचिए। ऐसा कैसे हुआ होगा? कैसे-कैसे नये-नये जीव बने होंगे या जीवों में परिवर्तन कैसे आया होगा?

किसी भी जीवों के आवास में उनकी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति होती है अर्थात भोजन, प्रजनन एवं सुरक्षा। आवास में पर्याप्त संसाधन की उपस्थिति होने से उनकी संख्या में वृद्धि होती है। हम यह भी देखते हैं कि कुछ प्रजातियों की संख्या बहुत बढ़ रही है तो कुछ को तेजी से घट रही है।

यदि किसी जीव की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई तो क्या होगा? इस प्रकार जीवों का आवास एवं संसाधन उनकी उत्पति, विलुप्ति या बदलाव का एक कारण हो सकता है। क्या किसी प्रजाति के जीव की संख्या में वृद्धि जितनी तेजी से होती है, उसके लिए खाद्य संसाधन (जैविक और अजैविक दोनों घटक) भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ते होंगे?

वैज्ञानिकों का मानना था कि जनसंख्या में यदि अनियंत्रित रूप से बढ़ोतरी होगी तो खाद्य संसाधन पर्याप्त नहीं होंगे, ऐसी स्थिति में प्राकृतिक आपदा, परस्पर दवंद व लड़ाई से कुछ जीव मर जाएँगे जबकि कुछ बच जाएँगे। इस तरह से जीवों की संख्या में वृद्धि नियंत्रित रहती है।

बीगल के सफर के दौरान डार्विन के कुछ महत्वपूर्ण अवलोकन इस प्रकार हैं जिनसे उन्हें जीवों के विकास का सिद्धान्त प्रतिपादित करने में मदद मिली- जीवाश्म अनुसार “जो ढल गया वही जीव बच जाता है।” उष्णकटिबंधीय जंगलों के कई विविध प्रकार के प्राणियों और उनके आवास का अवलोकन डार्विन ने पहली बार किया था। दक्षिण अमेरिकी पहाड़ों के ऊपर उन्हें ऐसी चट्टानें मिलीं जिनमें समुद्री जीवों के जीवाश्म मिले।

बीगल के पूरे सफर के दौरान जीवों रंग, आकार, भोजन, आवास आदि संबंधी कई तथ्यों व प्रमाणों को जुटाया।

सजातीय लक्षण क्या है ?

प्रतान (कदा झुमकलता), काँटे (नींबू) तथा कन्द (आलू) इन सभी की उत्पत्ति तने की कलिका से हुई है. पर इनके कार्य अलग-अलग है। इस प्रकार हम पौधों की पत्तियों में भी सजातीय लक्षण देखते हैं।

पक्षी व चमगादड़ के पंख, डाल्फिन व सील के पंख, भेड़ व कुते की अगली टांग एवं मनुष्य व छळूदर के अग्रपादों को देखा है, ये सभी उत्पत्ति व रचना की दृष्टि से समानता प्रदर्शित करते हैं।

समवृत्ति लक्षण क्या है ?

कुछ अन्य लक्षण जैसे तितलियों और पक्षियों के पंखों का कार्य समान है पर उनकी उत्पत्ति एक समान नहीं है। एक तरफ जहाँ पक्षी का पंख उसके अग्र टाँग से बना है वहीं तितलियों का पंख उनकी टाँग से नहीं बल्कि मुख्य रूप से त्वचा से बना है। इस प्रकार के लक्षणों को ‘समवृत्ति लक्षण’ (Analogous characters) कहा जाता है जो यह दर्शाते हैं कि इनके पूर्वज अलग-अलग थे। अर्थात, सजातीय लक्षण ऐसे लक्षण हैं जिनकी उत्पत्ति एक जैसी जबकि कार्य अलग हैं और समवृत्ति लक्षणों में उत्पत्ति अलग-अलग हैं पर कार्य एक जैसे हैं।

प्राकृतिक चयन (Natural selection)

डार्विन ने सुझाया कि प्राकृतिक चयन (Natural selection) यानि प्रकृति में स्वतः चलने वाली चयन की प्रक्रिया से दुनिया के अधिकाँश जीवों की उत्पत्ति हुई है।

प्रजातियाँ पूर्ववर्ती प्रजातियों से ही उत्पन्न होती है।

विकास का सिद्धान्त (theory of evaluation)

1. जीवों में विविधता पाई जाती है, जिसके कारण उनके जीने की क्षमता में भी थोड़े बहुत अंतर पाए जाते कोई कम जीता है तो कोई ज्यादा। किसी की कम संताने होती हैं तो किसी की ज्यादा। जिनकी जीने की क्षमता ज्यादा होती है वही परिवेश में ढलकर जीते हैं और उनकी एक नई प्रजाति दिखाई देती है।

2. विश्व में प्रजातियों की रचना एक झटके में नहीं शाखित पेड़ बल्कि पहले से मौजूद प्रजातियों से होती है।

3. विविध जीवों की उत्पत्ति एक समान पूर्वज से हुई है इसलिए विकास की प्रक्रिया को एक शाखित पेड़ के रूप में दर्शाया जा सकता है।

4. किसी भी जगह की जनसंख्या में पाए जाने वाले जीवों में विभिन्नताएँ होती हैं। इनमें से कुछ विभिन्नताएँ ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाती हैं।

5. हर प्राणी विशेष का अस्तित्व बनाए रखने के लिए उनमें कुछ खास विभिन्नताएँ होती हैं। एक प्रजाति में यह विभिन्नताएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी
तक पहुँचती हैं तो धीरे-धीरे संतान पीढ़ी, जनक पौढ़ी से भिन्न होती रहती है और एक नई प्रजाति का रूप ले लेती है। प्रजातियों का विकास, पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचने वाली ऐसी कुछ विभिन्नताओं से होता है और किसी परिस्थिति में ये लाभदायक सिद्ध होती हैं।

6. लाभदायक भिन्नताओं वाली विविध प्रजातियों किसी आवास में पनपने लगती और साथ इन प्रजातियों की आबादी में वृद्धि होती रहती है जो पहले से उपस्थित प्रजातियों की आबादी को प्रभावित करता है। उस आवास में जीने के लिए ज्यादा सक्षम प्रजातियों की आबादी अन्य प्रजातियों की आबादी का स्थान लेने लगती है। इस प्रकार प्रजातियों की आबादी में क्रमशः बदलाव होता है जिससे जीवों का विकास चलता रहता है।

जैव विकास के सिद्धान्त एवं उसे प्रतिपादित करने का विवरण डार्विन द्वारा लिखित पुस्तक “ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीस बाइ नैचुरल सेलेक्शन” तथा वैलेस द्वारा लिखित पुस्तक “डारविनिज़म” में मिलता है। ये पुस्तक क्रमशः सन् 1859 और 1889 में छपी थीं।

अनुकूलन और प्रजातिकरण (Adaptation and Speciation)

समय के साथ किसी जीव का अपने आवास में ढल जाने को प्रक्रिया को हम
‘अनुकूलन’ (adaptation) कहते हैं। अपने आवास में अनुकूलित जीवों की आबादी समय के साथ बढ़ती रहती है।

जीवों में विविधता से अलग-अलग प्रजातियों के बनने को प्रजातिकरण (Speciation) कहा जाता है।

किसी प्राकृतिक आपदा से या आवास और खाद्य संसाधनों में बदलाव से अक्सर प्रजातिकरण होने की संभावना रहती है।

जैव-विकास (Organic evolution)  क्या है?

पृथ्वी पर वर्तमान जटिल प्राणियों का विकास प्रारम्भ में पाए जाने वाले सरल प्राणियों में परिस्थिति और वातावरण के अनुसार होने वाले परिवर्तनों के कारण हुआ। सजीव जगत में होने वाले इस परिवर्तन को जैव-विकास (Organic evolution) कहते हैं।

प्रजाति की परिभाषा क्या है ?

ग्रीन (Green) के अनुसार, प्रजाति एक बड़ा जैविकीय मानव-समूह है जिसमें अनेक विशेष आनुवंशिक लक्षण पाए जाते हैं, जो कुछ सीमा के अन्दर भिन्न होते हैं.

अनुकूलन क्या है?

अनुकूलन किसी विशेष वातावरण में सुगमता पूर्वक जीवन व्यतीत करने एवं वंशवृद्धि के लिए जीवों के शरीर में रचनात्मक एवं क्रियात्मक स्थायी परिवर्तन उत्पन्न होने की प्रक्रिया है। यह शरीर का अंग या स्थिति नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है

प्राकृतिक चयन क्या है?

प्राकृतिक चयन मुख्य प्रक्रिया है जो जीवों को बेहतर अस्तित्व के लिए अपने पर्यावरण के अनुकूल बनाने और इंटरब्रीडिंग के माध्यम से आबादी में व्यक्तियों की संख्या बढ़ाने की अनुमति देती है। प्राकृतिक चयन विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
विविधता, वंशानुक्रम, जनसंख्या वृद्धि की उच्च दर, अंतर अस्तित्व और प्रजनन डार्विन की प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया के पांच चरण हैं।
लंबे गर्दन वाले जिराफ की प्रमुखता प्राकृतिक चयन का एक और उदाहरण है। छोटी गर्दन वाले जिराफ की तुलना में लंबे गर्दन वाले जिराफ बेहतर खिलाने में सक्षम हैं।

कृत्रिम चयन क्या है

कृत्रिम चयन जानवरों और पौधों के चयनात्मक प्रजनन है जो वांछनीय और अंतर्निहित वर्णों के साथ संतान पैदा करते हैं। कृत्रिम चयन वांछित पात्रों की एक मानव निर्मित चयन प्रक्रिया है, और यह मुख्य रूप से पशुधन और बेहतर फसलों में उपयोग किया जाता है।\
बेल्जियम की गाय अपने त्वरित दुबले मांसपेशियों की वृद्धि के कारण चयनात्मक प्रजनन द्वारा बनाए रखी जाती है।

 जीवाश्म किसे कहते है ?

पृथ्वी पर किसी समय जीवित रहने वाले अति प्राचीन सजीवों के परिरक्षित अवशेषों या उनके द्वारा चट्टानों में छोड़ी गई छापों को जो पृथ्वी की सतहों या चट्टानों की परतों में सुरक्षित पाये जाते हैं उन्हें जीवाश्म (जीव + अश्म = पत्थर) कहते हैं। जीवाश्म से कार्बनिक विकास का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है। इनके अध्ययन को जीवाश्म विज्ञान या पैलेन्टोलॉजी कहते हैं।

सम्वृति लक्षण क्या है ?

सम्वृति  अंग –  भिन्य  भिन्य  जीवधारियों के ऐसे  अंग जो कार्य में तो समान  होते है परन्तु उत्पत्ति में एक दूसरे से भिन्य  होते है समवर्ती अंग  कहलाते है | 
उदहारण = चिड़िया का  पंख एवं  किट का पंख
और ऐसे लक्षण प्रदर्शित करना संवृति लक्षण कहलाता है .

सजातीय लक्षण क्या है ?

समजात अंग – विभिन्य जीवधारी के ऐसे अंग जो उत्पत्ति  के आधार पर  समान होते है परन्तु कार्य के आधार पर   भिन्य  होते है | समजात  अंग कहा जाता है |  उदहारण  –  हेल  का पिलपर और चमगादड़ का पंख |
और ऐसे लक्षण प्रदर्शित करना सजातीय लक्षण कहलाता है .

अवशेषी अंग क्या है ?

अवशेषी अंग -जीवो के ऐसे  अंग जिनमे काफी समय  पहले कार्य समपर्ण किये जाते थे | लेकिन धीरे धीरे उन अंगो की उपयोगिता नहीं रही गई  तथा जो इस कारण पृष्ट भूमि में चले गए , अवशेषी अंग अंग कहा जाता है| 
 उदाहरण = मानव में वर्मीफॉर्म अपेंडिक्स , बाह्य कान  की पेशिया , पुच्छ कशेरुक आदि  | 

जीवों का विकास से आधारित वीडियो क्लास

कक्षा 10वीं पाठ 1 जीवों का विकास

कृत्रिम चयन  व प्राकृतिक चयन में अंतर में क्या अंतर है ?

मनुष्य द्वारा चयनित लक्षणों के अनुसार जीवों में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया कृत्रिम चयन है। प्रकृति में निरंतर होने वाली चयन की प्रक्रिया जिनमें भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप लक्षणों का चयन होता रहता है, प्राकृतिक चयन कहा जाता है।
प्राकृतिक चयन एक प्रकृति-निर्मित चयन है, और कृत्रिम चयन एक मानव-निर्मित चयन है। 
प्राकृतिक चयन: प्राकृतिक चयन एक विशाल जैविक विविधता का उत्पादन करता है।
कृत्रिम चयन: कृत्रिम चयन चयनित लक्षणों के साथ जीवों का उत्पादन करता है।
प्राकृतिक चयन: प्राकृतिक आबादी में प्राकृतिक चयन होता है।
कृत्रिम चयन: कृत्रिम चयन मुख्य रूप से घरेलू आबादी में होता है।