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कक्षा 10 संस्कृत पाठ 3 क्रियाकारक-कुतूहलम

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पाठ-परिचय-

वाक्य रचना के समुचित ज्ञान से ही किसी भाषा पर अधिकार किया जाता है। वाक्य-रचना में कारक और क्रिया का संबंध सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता हैं। इसलिए भाषा के गहन गम्भीर ज्ञान के लिए कारक और क्रिया-पदों के पारस्परिक संबंध का ज्ञान होना आवश्यक है। संस्कृत में तो यह ज्ञान और भी अधिक आवश्यक है। क्योंकि उसमें विशेष परिस्थिति में किसी विशेष विभक्ति के प्रयोग के अनेक नियम है। भाषा-ज्ञान के लिए कारक और क्रिया के अतिरिक्त क्रिया के काल अर्थात् लकारों का ज्ञान होना भी अत्यावश्यक है। प्रस्तुत पाठ में सरल श्लोकों के माध्यम से कारकों एवं क्रिया के सकारों का बोध करया गया है। आरंभ के सात श्लोकों में क्रमशः सातों कारक और विभक्तियों का प्रयोग समझाया गया है और अतिम पाँच श्लोकों के माध्यम से पाँचों लकारों का बोध कराया गया है।

कक्षा 10 संस्कृत पाठ 3 क्रियाकारक-कुतूहलम

उद्यमः साहसं धैर्य, बुदधिः शक्तिः पराक्रमः।
घडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत।। 1।।


विनयो वंशमाख्याति, देशमाख्याति भाषितम्।
सम्ममः स्नेहमाख्याति, वपुराख्याति भोजनम्।। 2।।

मृगाः मृगैः संगमनुव्रजन्ति, गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरङ्गै।
मूर्खाश्च मूर्खः सुधियः सुधीभिः समानशील-व्यसनेषु सख्यम्।। 3।।


विदया विवादाय धनं मदाय, शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतद्, ज्ञानाय, दानाय च रक्षणाय।। 4।।


क्रोधात् भवति संमोहः, संमोहात स्मृतिविधमः।
स्मृतिअंशाद्-बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।। 5।।


अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतः सुखम्।। 6।।


शैले शैले न माणिक्यं, माँक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र, चन्दनं न वने वने ।। 7।।


पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्यं निगृहति गुणान् प्रकटीकरोति।
आपद्गगतं च न जहाति ददाति काले,
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः ।। 8।।


निन्दन्तु नीतिनिपुणाः यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।। 9।।


अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।। 10।।


अपठद् योऽखिलाः विद्याः, कलाः सर्वाः अशिक्षत।
अजानात् सकलं वेदयं, स वै योग्यतमो नरः।। 11।।


दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं, मनःपूतं समाचरेत्।। 12।।


रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्, भास्वानुदेभ्यति हसिष्यति पंकजश्रीः।
इत्थं विचिन्तयति कोशगत विरेफे, हा हन्त! हन्त! नलि/ गजउज्जहार।। 13।।


अभ्यासः


1. उचितं विकल्पं चिनुत –


1 वपुः आख्यातिः –
(क) भोजनम्
(ख) स्नेहम
(ग) वंशम


2. खलस्य विद्या कस्मै भवति?


(क) ज्ञानाय
(ख) विवादाय
(ग) रक्षणाय


3.के न सर्वत्र भवन्तिः?


(क) माणिक्यानि
(ख) चन्दनम्
(ग) साधवः


प्रश्ना:-
1- सन्मित्रस्य एकं लक्षणं लिखतु।
2- ‘गुह्यं निगृहति’ इति वाक्यस्य भावार्थ लिखत।
3- ‘इदं प्रवदन्ति सन्तः’ इति वाक्यस्य हिन्दीभाषया अनुवादं लिखत्।
4- ददाति’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् अस्ति?
5- ‘गतम्’ इति पदे प्रकृतिप्रत्ययश्च लिखत।
6- श्लोके प्रयुक्तम् अव्ययपदं लिखत।
7. श्लोके लिखितानि लट्लकारस्य धातुरूपाणि चित्वा लिखत।


प्रश्न 5.अधोलिखिताना संस्कृतभाषया अनुवादं कुरुत।
1.विद्या ज्ञान के लिए होती है।
2आलसी मनुष्य को विदया प्राप्त नहीं होती है।
3.सभी पर्वत में मणी नहीं होते हैं।
4.अच्छे मित्र गुणों को प्रकट करते है।
5. धीरपुरुष न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते है।