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छत्तीसगढ़ की लोककलाएँ (लेख ) दानेश्वर शर्मा हिंदी कक्षा 10 वीं पाठ 4.3

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दानेश्वर शर्मा का जीवन परिचय

भिलाई इस्पात संयंत्र के पूर्व प्रबंधक, अखिल भारतीय स्तर के साहित्यकार, लोक साहित्य के अधिकारी विद्वान, हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी के यशस्वी कवि, ललित निबंध एवं स्तंभ लेखक, फिल्मी गीतकार, कवि सम्मेलनों के कुषल संचालक तथा श्रीमद् भागवत पुराण के प्रवचनकार श्री दानेष्वर शर्मा जी का जन्म ग्राम मेडेसरा, जिला दुर्ग (छ.ग.) में 10 मई, 1931 में हुआ। आपकी प्रकाशित पुस्तकें- छत्तीसगढ़ के लोक गीत (विवचे नात्मक), हर मौसम में छन्द लिखूगा (गीत संग्रह), लव कुष (खंडकाव्य), लोक दर्षन (धार्मिक-आध्यात्मिक ललित निबंध संग्रह), तपत कुरू भई तपत कुरू (छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह) तथा गीत-अगीत (हिन्दी काव्य संग्रह) है। ‘शब्दानुशासनम्’ में कहा गया है-“लोके वेदे च” अर्थात् लोक में और वेद में भी। ‘लोक’ की यह प्रथम प्रतिष्ठा अकारण नहीं है। वह वेद से भी अधिक प्राचीन है। लोक-मानस ने धरती को माता और अपने को उसका बेटा माना है। माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथ्वीव्याः। नाते रिश्तों के इस प्रेम ने उसे प्रकृति और उसकी संतान के साथ जोड दिया और यहीं से फूटी लोक-रचना की अजस्र धारा लोक गीत, लोक गाथा, लोक नाट्य और लोक नृत्य के रूप में आज तक प्रवाहित होती चली आ रही है। मनुष्य का सम्पूर्ण चिंतन, दर्शन और राग- विराग लोक कला में इसी कारण सन्निहित है।

छत्तीसगढ़ की लोककलाएँ (लेख )

1 नवंबर 2000 से छत्तीसगढ़ स्वतंत्र राज्य है। गढ़ अर्थात किला। यहाँ कभी छत्तीस किले थे। रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बिलासपुर, रायगढ़, सुकुमा, दंतेवाड़ा, सूरजपुर, बीजापुर आदि 27 जिलों में यह भू-भाग साहित्य, संगीत और कला के क्षेत्र में अपनी अनेक विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। रायपुर (वर्तमान बलौदाबाजार) जिले के तुरतुरिया नामक स्थान में वाल्मीकि का आश्रम माना गया है। इस नाते, कविता की पहली ऋचा यहाँ फूटी आदि शंकराचार्य के भी गुरु श्री गोविंद पाद स्वामी इसी धरती के संत थे। संगीत और कला के क्षेत्र में भी इसी प्रकार की अनेक बातें कही जाती हैं।

छत्तीसगढ़ लोक-कला का भी गढ़ है। यहाँ खेत-खार, पर्वत नदियाँ, वन-उपवन सब गाते हैं-

गेहूं गाए गीत खेत में
और बाजरा झूमे नाचे
चना बजाता पुंगरू छन-छन
और मूंग ज्यों कविता बाँचे,
लोक गीत की कड़ी-कड़ी में
जीवन का सरगम सजता है
लोक कला का जादू ऐसा
कदम-कदम बंधन लगता है

लोक कला के इन जादूगरों का लंबा इतिहास है किन्तु आज भी छत्तीसगढ़ में ऐसे सैकड़ों कलाकार हैं जिन्होंने देश के कोने-कोने में और विदेशों में भी अपनी छाप रख छोड़ी है। लोक कला के अंतर्गत कुछ प्रतिनिधि लोक गीतों, लोक कथाओं, लोक नाट्यों एवं लोक नृत्यों की चर्चा संभव है।

झूमते-झुमाते लोक गीत गाए जाते हैं। किसी भी अंचल के लोक गीतों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का आधिपत्य रहता है। छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति है किन्तु जो बात छत्तीसगढ़ी लोक गीतों को अन्य भारतीय लोक गीतों से अधिक विशिष्ट बनाती है, वह है धुनों की विविधता’। ददरिया, सुवा, गौरा, भोजली, जंवारा, बिहाव, और भजन प्रमुख लोक गीत हैं।

‘ददरिया शृंगार गीत है।

संझा के बेरा तरोई फूले रे
तोर चिमटी भर कनिहा तोही ल खुले रे

अर्थात शाम के समय तरोई का फूल खिलता है। एक चिमटी में समा जाने वाली तुम्हारी पतली कमर तुम्हारे व्यक्तिव को और अधिक निखार देती है। इस गीत में सवाल-जवाब भी चलता है खेत में या तालाब-नदी के पास में बैठे हुए किसी नायक ने ददरिया का एक पद गा दिया और दूसरी और से भी किसी ने उसका जवाब दे दिया तो स्पर्धा शुरू हो गई। यह सिलसिला काफी लंबा चलता है और आसपास छिटके हुए श्रोता इस प्रतिस्पर्धा का आनंद लेते हैं। लोक कला में आशु-कवित्व भी है और ददरिया उसका उदाहरण है।

‘सुआ गीत’ में महिलाएँ बाँस की टोकनी में भरे धान के ऊपर ‘सुभा’ अर्थात तोते की प्रतिमा रख देती हैं और उसके चारों ओर वृताकार स्थिति में नाचती-गाती हैं। ‘सुवा’ को छत्तीसगढ़ी लोक गीतों में कबीर के ‘हंसा’ की तरह आत्मा का प्रतीक माना गया है।

सेमी के मड़ पर कुंदरवा के झूल वो
जेही तरी गोरी कूटे धान
एएदे धान ए सिया रे मोर

केंवटिन गिरगे माडी के भार
केंवट उठाए नगडेना के भार

देवार जाति की महिलाएँ प्रायः गाती और नाचती हैं। नाचने की कला में वे इतनी प्रवीण होती है कि लोक नृत्य में ‘देवरनिन नाच’ एक विधा हो गई है। देवार जाति के कलाकारों में मनहरण, कौशल, गणेश, बरतनिन बाई, किस्मत बाई, फिदा बाई, पद्मा आदि प्रमुख है।

‘पंडवानी’ पांडवों की कथा है। झाडूराम देवांगन पंडवानी के शीर्षस्थ कलाकार थे। उन्हें मध्यप्रदेश शासन का शिखर सम्मान प्राप्त था। विदेशों में भी अनेक कार्यक्रम हुए हैं। उनके शिष्यो की बहुत बड़ी संख्या है, जिनमें से पूनाराम निषाद को संगीत अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ है। श्रीमती तीजनबाई कापालिक शैली की पंडवानी गायिका हैं और उन्हें पद्मभूषण का अलंकरण प्राप्त है। रेवाराम, लक्ष्मी बाई, सामेशास्त्री देवी आदि सिद्ध हस्त पंडवानी गायक, गायिकाओं की श्रेणी में रितु वर्मा भी उभर कर आई है। पंडवानी का एक उदाहरण है –

रथ ला हाँकत हे भगवान
कूकुर लुंहगी, सॉप सलगनी
हाथी हदबद, गदहा गदबद
सैना करिस पयान
रथ ला हाँकत हे भगवान
लोक नाट्य का कलेवर, व्यंग्य का तेवर

छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य में प्रमुख है – नाचा, चन्दैनी और रहस। ‘नाचा’ अत्यन्त सशक्त विधा है और लोक प्रिय भी। इसमें पुरुष ही महिला के वेश में ‘परी’ बनकर गाते और नाचते हैं। दो चार नाच के बाद गम्मत या प्रहसन होता है जिसमें ‘जोक्कड़’ (जोकर या विदूषक) के अतिरिक्त कुछ अन्य पात्र प्रहसन पेश करते हैं। गम्मत या प्रहसन में अत्यन्त तीखा व्यंग्य होता है किन्तु उसका समापन किसी अच्छे आदर्श को इंगित करता है। नाचा और गम्मत दोनों को मिलाकर ‘नाचा’ कहा जाता है। नाचा रात भर चलता है और सबेरे ‘करमा’ के साथ समाप्त होता है। स्व. मँदराजी दाऊ नाचा के बहुत बड़े कलाकार थे।

आज से 60 वर्ष पहले बोइरा, रिंगनी और रवेली की नाचा पार्टी प्रसिद्ध मानी जाती थी। बाद में रिंगनी, रवेली पार्टी एक हो गई। लालूराम और मदन लाल इस पार्टी के सशक्त कलाकार थे जिनके नाम से लोग टूट पड़ते थे । लालू राम ने हबीब तनवीर के निर्देशन में तैयार ‘चरणदास चोर’ में चरणदास की अविस्मरणीय भूमिका निभाई और विदेशों में भी ख्याति अर्जित की। फिल्म ‘मेसी साहब’ में उसकी छोटी सी भूमिका भी प्रभावकारी है। नया थियेटर दिल्ली के एक नाट्य में मद्रासी पंडित का जीवंत रोल करने का ‘करेंट’ ने उसका चित्र छापते हुए टिप्पणी की थी कि Hindi Stage has yet to find lalu Ram लमज जव पिदक संसन उ अर्थात हिंदी रंग मंच पर अभी लालूराम पैदा नहीं हुआ है। भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित भारत प्रसिद्ध ‘छत्तीसगढ़ लोक कला महोत्सव’ में इस लोक कलाकार का अभिनंदन किया गया था। मध्यप्रदेश शासन ने लोक नाट्य के पाँच छत्तीसगढ़ी कलाकारों मदन लाल, भुलवाराम, गोबिन्द राम, देवीराम और फिदा बाई को ‘तुलसी सम्मान प्रदान किया था

‘चंदैनी’ लोक नाट्य में लोरिक और चंदा की प्रणय गाथा प्रस्तुत की जाती है। वस्तुतः, चंदैनी अब लोक नाट्य की एक ऐसी शैली हो गई है जिसमें कलाकारों की संख्या कम होती है और एक कलाकार अनेक पात्रों का अभिनय कर लेता है। रामाधार, सुखचंद और लतेलराम इस फन में माहिर कलाकार हैं। रामाधार साहू असाधारण प्रतिभा के धनी है और मंच पर इतनी अभिव्यक्तियाँ एक साथ दे देता है कि कभी-कभी बौद्धिक दर्शक भी उसके साथ चलने में अपने को असमर्थ पाते हैं।

बस्तर का ‘भतरानाट’ और बिलासपुर का ‘रहस’ भी लोक नाट्य है। ‘रहस’ वस्तुतः रास है तथाकृष्ण की रासलीला का ही प्रदर्शन है।

लोक नृत्य माँदर की थाप पर थिरकते पाँव वैसे तो अधिकांश लोक गीत, लोक गाथा और लोक नाट्य में लोक नृत्य का भी थोड़ा बहुत पुट रहता है किन्तु नृत्य प्रधान होने के कारण जिन लोक कथाओं को नोक नृत्य की श्रेणी में रखा जा सकता है, उनमें प्रमुख है- पंथी, रावत, नाच, गेंडी, डंडा नाच, देवारिन नाच और आदिवासी नृत्य।

‘पंथी’ सतनामी संप्रदाय के भक्तों द्वारा अपने गुरु घासीदास तथा उनके बताए सत्य की महिमा को रेखांकित करके गाया जाने वाला भाव-प्रवण नृत्य है-

इतना के बिरिया में कोन देव ला वो
मैं तो बंदत हवॅव दीदी, जय सतनाम
मैं तो बंदत हवॅव भइया, जय सतनाम

पंथी इतनी तेजी से नाचा जाता है कि पंजाब के भांगड़ा के समान गिने-चुने लोक नृत्य ही इसकी तुलना में रखे जा सकते हैं। माँदर और झाँझ केवल दो वाद्य इस नृत्य में पूरे वातावरण को झकझोर देते हैं। देवदास की पंथी पार्टी का नाम किसी समय शिखर पर था। बुधारू इस पार्टी का माँदर-वादक है और अपनी कोई सानी नहीं रखता। देवदास की पार्टी ने विदेशों में भी खूब ख्याति अर्जित की। नृत्य की तेज गति से आश्चर्य चकित होकर विदेशियों ने ध्यान चंद और ज्ञान चंद की हॉकी स्टिक की तरह देवदास के पैरों का भी परीक्षण किया। राधेश्याम, लतमार दास, पुरानिक लाल चेलक और अमृता बाई भी इस विधा के सशक्त कलाकार हैं। देवदास के निधन से पंथी लोक कला की बहुत बड़ी क्षति हुई है।

मुख्यतः मवेशी चराने का पेशा करने वाली राउत जाति का ‘राउत नाचा’ दीपावली के समय होता है। कुल देवता की आराधना करने के बाद हर रावत अपने घर से ‘काछन’ निकालता है। उस समय उसके पास अपार शक्ति होती है। मस्ती में अपने घर के ही छप्पर छानी को तोड़ते हुए निकलने वाला रावत अपनी लाठी से समस्त रावतों पर अकेले ही प्रहार करता है। उसके प्रहार को रोकने के लिए लगभग 30-40 राउत वहाँ एकत्र रहते हैं। जब उन्मादी राउत लाठी चलाते-चलाते थक जाता है, तब जमीन में लेट जाता है। देवता को धूप और नारियल भेंट करने के बाद वह स्वस्थ होता है और अपने में शामिल होकर घर से बाहर नाचने के लिए निकल जाता है। एक राउत दोहा है-

गोहड़ी चराएँव, बड दुःख पाएँव, मन अब्बड़ झुंझवाय
बरदी चराएँवं बढ़ सुख पाएँव, गंजर के दुहेव गाय

छत्तीसगढ़ में त्यौहारों का सत्र वर्षा ऋतु में हरेली (हरियाली) से प्रारंभ होता है। हल, कुदाली, फावड़ा आदि कृषि औजारों की पूजा की जाती है। इस अवसर पर गेड़ी भी बनाई जाती है । लगभग 8 फीट लम्बे बाँस में जमीन से लगभग 3 फीट की ऊंचाई पर बाँस का ही पायदान बनाया जाता है। इस तरह गेंडी तैयार होती है जिस पर चढ़कर नाचा जाता है। गेड़ी के पायदान को नारियल की रस्सी से बाँधने तथा उसमें मिट्टी तेल डालकर धूप में सुखाने से होने वाली चर्र मर्र की आवाज अन्य वायों के साथ मिलकर अद्भुत संगीत पैदा करती है। समूह में नाचने पर गेंडी नृत्य की छटा देखने लायक होती है।

‘आदिवासी नृत्य’ छत्तीसगढ़ की लोक कला का महासागर है। जन जातियों की बहुलता वाले क्षेत्र में सैकड़ों तरह के आदिवासी नृत्य प्रचलित हैं। माँदर की धुन पर नाचने वाले ये आदिवासी अपने खुलेपन के लिए मशहूर हैं। युवक और युवतियाँ समान रूप से अधिकांश नृत्यों में एक साथ नाचते हैं। उनके पैरों का प्रक्षेपण इतना सधा हुआ और संतुलित रहता है कि लगता है किसी ने रस्सी या स्केल से बाँध दिया हो। आदिवासी अंचलों के कुछ नृत्य बहुत प्रसिद्ध हैं जैसे – बस्तर में गौर, ककसार, चेहरे, दीवाइ, माओ, डोली और डीटोंग।

सरगुजा में सैला, जशपुर में सकल, मानपुर में हुल्की, चोली और माँदरी। देवभोग में लरिया। प्रायः सभी आदिवासी नृत्य किसी सामाजिक या धार्मिक परंपरा का निर्वाह करते हैं। ‘करमा गोंड़ और देवार जाति का प्रमुख नृत्य है किन्तु यह हर आदिवासी अंचल में अलग-अलग शैली में नाचा और गाया जाता है। मूलतः करम राजा और करमा रानी को प्रसन्न करने के लिए जन जाति के लोग करमा नाचते है किन्तु कालांतर में ददरिया के साथ जुड़कर वह शृंगारमय भी हो गया। गोलार्ध पर नाचते हुए युवक-युवतियों का दल माँदर की मस्ती में झूम-झूम कर नाचता है और जब अपने साथी के पाँव के अँगूठे को छूने की स्थिति में आ जाता है, तब ‘करमा सिद्ध होता है।

एक करमा गीत के बोल हैं-

होइरे होइरे तोला जाना पड़े रे
कटंगी बजार के पीपर तरी रे
दार राँधे, भात राँधे, लिक्कड़ म खोए
चार पइसा के जुगजुगी दुनिया ल मोहे
तोला जाना पड़े रे


हमारी संस्कृति मूलतः लोक संस्कृति है। लोक कला उसका एक अंग है। शरीर की पुष्टि के लिए अंगों का पुष्ट होना अनिवार्य है अतः लोककला की अजरता-अमरता लोकसंस्कृति की अजरता-अमरता है।

शब्दार्थ

  • मड़वा – मंडप;
  • माड़ी – घुटना;
  • सुग्घर – सुंदर;
  • बरदी – गौ वंशों का झुंड;
  • गदबद – तेज गति से दौड़ना;
  • बिछलगे – फिसल गए;
  • पयान – प्रस्थान;
  • गौहड़ी – गौ वंशों का बड़ा समूह जो प्रायः जंगल में रहते हैं;
  • बगडेना – बाँह;
  • झुझवाना – अप्रसन्न होना;
  • गिजरफिर – घूमकर;
  • जुगजुगी दुनिया – जगमगाती दुनिया;
  • लिक्कड़ – लकड़ी।

अभ्यास पाठ से

1. मनुष्य का सम्पूर्ण चिंतन’ दर्शन और राग विराग लोककला में सन्निहित क्यों है।
2. ‘तुरतुरिया’ नामक स्थान क्यों प्रसिद्ध है।
3. लोक गीत को अन्य भारतीय लोक गीतों से अधिक विशिष्ट क्यों माना जाता है।
4. छत्तीसगढ़ी के प्रमुख लोक गीत गायकों के नाम लिखिए ।
5. ‘नाचा विधा” को संक्षेप में समझाइए।
6. किन-किन लोक कलाओं को लोक नृत्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।
7.आदिवासी अंचलों में प्रसिद्ध नृत्य कौन-कौन से हैं

अभ्यास पाठ से आगे

1.महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ग्रंथ का नाम लिखकर आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार आश्रमों का उल्लेख कीजिए।
2.शक्ति की आराधना “जॅवारा” का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
3.आशु कवित्व से आप क्या समझते हैं। अपने शब्दों में लिखिए।
4. “सुआ (गीत)” नृत्य के समय टोकनी में भरे धान के ऊपर सुआ रखने का क्या अर्थ है।
5. पद्मभूषण तीजनबाई को पंडवानी की “कापालिक शैली” की गायिका कहा जाता है। इस शैली का आशय स्पष्ट करते हुए पंडवानी की अन्य शैलियों का उल्लेख कीजिए।
6.हरियाली पर्व के समय कृषि उपकरणों की पूजा अर्चना करने एवं बैगा द्वारा दरवाजे पर नीम की डंगाल खोचने का आशय क्या है | स्पष्ट कीजिए।

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