बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता राजेश जोशी हिंदी कक्षा 9वीं पाठ 3.1

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बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता राजेश जोशी

बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता के शब्दार्थ 

इमारत –        भवन 

कोहरा –        धुंध, कुहासा 

अंतरिक्ष –      आकाश 

पंक्ति –          कतार 

हस्बमामूल –   यथावत 

एकाएक –     अचानक

मदरसा –       विद्यालय | 

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
सुबह सुबह

बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?

भावार्थ –

 प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि राजेश जोशी जी के द्वारा रचित कविता बच्चे काम पर जा रहे हैं से उद्धृत हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि जोशी जी के द्वारा बाल-श्रम के ज्वलंत मुद्दे पर बल देने का प्रयास किया गया है | कवि कहते हैं कि सुबह-सुबह सड़कों पर कोहरे छाए हुए हैं और बच्चे अपनी दीनता का बोझ कंधों पर लेकर अपने-अपने घरों से निकल पड़े हैं काम करने के लिए | अर्थात्, इन बच्चों का बचपन ही छीन गया | खेलने-कूदने तथा पढ़ने-लिखने के समय में बच्चे काम करने को मजबूर हैं | ताकि दो रोटी की व्यवस्था करके पेट की आग बुझाया जा सके | आगे कवि कहते हैं कि मासूम बच्चों का खेलना-कूदना, पढ़ना-लिखना सब छूट गया है और वे काम पर जा रहे हैं…, ये हमारे लिए सबसे शर्मनाक और भयानक बात है | बच्चे काम पर जा रहे हैं…, ये विवरण की तरह लिखना ही काफी नहीं है | बल्कि समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था से ये प्रश्न पूछना चाहिए कि — आखिर बच्चे काम पर क्यूँ जा रहे हैं ? क्यूँ उनका मासूम बचपन काम की भट्टी में झोंका जा रहा है ? 

क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें

क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्‍म हो गए हैं एकाएक

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि राजेश जोशी जी के द्वारा रचित कविता बच्चे काम पर जा रहे हैं से उद्धृत हैं |

कवि राजेश जोशी जी मासूम बच्चों की दुर्दशा पर बहुत दुखी हैं | बच्चों को लेकर वे अनेक प्रश्नों से भरे हुए हैं | वे बच्चों के काम करने पर आपत्ति जताते हुए सवाल पूछ रहे हैं कि — क्या बच्चों के खेलने वाली गेंदों को अंतरिक्ष निगल गया है ? क्या बच्चों के किताबों को दीमकों ने अपना खुराक बना लिया है ? या फिर बच्चों के सारे खिलौने काले पहाड़ के नीचे आकर दब गए हैं ? क्या ये बच्चे जिन मदरसों या विद्यालयों में बैठकर शिक्षा हासिल किया करते थे, उन मदरसों की इमारतें धवस्त हो गई हैं ? या फिर वे सारे मैदान, बगीचे और घरों के आँगन खत्म हो गए हैं, जहाँ बच्चे खेला व टहला करते थे | कवि राजेश जोशी जी के द्वारा उक्त पंक्तियों और प्रश्नों में बेहद मार्मिक और बच्चों के प्रति सहानुभूति के भाव प्रस्फुटित हुए हैं | उन्हें बच्चों का काम पर जाना बिल्कुल गैरकानूनी लग रहा है तथा वे बच्चों को उनके अधिकार दिलाने का हर सम्भव प्रयास कर रहे हैं |


तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए
बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे
काम पर जा रहे हैं।

बच्चे काम पर जा रहे हैं कविता

भावार्थ – 

प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि राजेश जोशी जी के द्वारा रचित कविता बच्चे काम पर जा रहे हैं से उद्धृत हैं |

कवि कहते हैं कि यदि बच्चों के खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने की सारी चीजें सचमुच नष्ट हो गई हैं, तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ? ये तो बहुत भयानक है | तत्पश्चात्, कवि कहते हैं कि इससे भी भयानक तो तब हो जाती है, जब बच्चों के खेलने-कूदने, पढ़ने-लिखने की सारी चीजें यथावत् रहती हैं, फिर भी कुछ बच्चे इन चीजों से दरकिनार नजर आते हैं | ऐसे बच्चों को देखकर कवि हताश और निराश हो जाते हैं | कवि सोचते हैं कि बच्चों के आनंद और पढ़ाई की सारी चीजें मौजूद रहने पर भी उन्हें दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए अपने-अपने काम पर जाना पड़ रहा है | वे काम पर न भी जाना चाहें, तो उनकी विवशता उन्हें जबर्दस्ती ले जा रही है | 

Question & Answers

प्रश्न-1 कवि का मानना है कि बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछा जाना चाहिए कि ‘काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?’ कवि की दृष्टि में उसे प्रश्न के रूप में क्यों पूछा जाना चाहिए ?

उत्तर- आज बाल-श्रम का व्यापक पैमाने पर फैलना, कहीं न कहीं समाज की लापरवाही को उजागर करती है | समाज की सोई हुई अन्यायपूर्ण व्यवस्था को जागरूक करने और बाल-श्रमिकों की दुर्दशा को सुधारने के लिए कवि ने बच्चों के काम पर जाने की भयानक बात को विवरण की तरह न लिखकर सवाल के रूप में पूछे जाने पर बल दिया है | 


प्रश्न-2 सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित क्यों हैं ?

उत्तर- आर्थिक संकट और मजबूरी के कारण माँ-बाप या कई घर वाले अपने बच्चों को पढ़ाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं | फलस्वरूप, उनके बच्चे स्कूल तक नहीं पहुँच पाते हैं | गरीब बच्चों को अपने माँ-बाप का हाथ भी बटाना पड़ता है | साथ ही साथ सामाजिक व्यवस्था भी सही न होने के कारण गरीब बच्चों को अन्य बच्चों की तुलना में हर सुख-सुविधाओं से वंचित होना पड़ता है | इसलिए कवि ने कहा है कि सुविधा और मनोरंजन के उपकरणों से बच्चे वंचित  हैं | 


प्रश्न- बच्चों का काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान क्यों है ? 

उत्तर- हमारी आने वाली पीढ़ियाँ ही देश और समाज के भावी भविष्य होते हैं | अर्थात् बच्चे ही देश के कर्णधार हुआ करते हैं | यदि बच्चे ही निरक्षर रहेंगे, तो देश का भविष्य अंधकारपूर्ण हो जाएगा | अर्थात् देश को तरक्की की राह ले जाने वाली पीढ़ियाँ ही शिक्षा से वंचित रहेंगी, तो देश में अपराधियों की संख्या में बढ़ोत्तरी होना निश्चित हो जाएगा | इसलिए बच्चों का काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान है | 


प्रश्न-4 आपके विचार से बच्चों को काम पर क्यों नहीं भेजा जाना चाहिए ? उन्हें क्या करने के मौके मिलने चाहिए ? 

उत्तर- बच्चे यानी आने वाली पीढ़ियों के कंधों पर देश का भविष्य निर्भर करता है | बच्चे कच्चे घड़े के समान होते हैं, जिन्हें जिस दिशा में ढाल दिया जाए, वे वैसा ही बन जाते हैं और निरक्षर बच्चे आगे चलकर गलत रास्ता चुन लेते हैं, जो तरह-तरह के अपराध में संलिप्त हो जाते हैं | इसलिए मेरे विचार से बच्चों को काम पर नहीं भेजना चाहिए | उन्हें उनके शिक्षा के अधिकार से वंचित करना एक अमानवीय अपराध है | यह समाज का महत्वपूर्ण दायित्व है कि वह वंचित बच्चों को संरक्षण दे | शिक्षा और आनंदित वातावरण से वंचित और अशिक्षित बच्चों को जोड़ने का कार्य होना चाहिए | उन्हें पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने का पूरा अवसर प्रदान करना चाहिए | आज बच्चे जितना ज्यादा सशक्त बनेंगे, देश उतना ही ज्यादा मजबूत और सशक्त बनेगा | 


प्रश्न-5 दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता | इस उदासीनता के क्या कारण हो सकते हैं ?

उत्तर- दिन-प्रतिदिन के जीवन में हर कोई बच्चों को काम पर जाते देख रहा/रही है, फिर भी किसी को कुछ अटपटा नहीं लगता | इस उदासीनता के कई कारण हो सकते हैं — लोग स्वार्थमय और संवेदनहीन जीवन जीने में व्यस्त हैं | समाज में भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो गई हैं | लोगों में जागरूकता का अभाव है | कभी-कभी तो लोगों को यह भी नहीं पता होता कि शिक्षा उनका मौलिक अधिकार है और वे परिश्रम करने के बजाय अपने भाग्य को दोष देते रहते हैं |

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