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अपने हिस्से के लोग आकाश देखते हैं कविता विनोद कुमार शुक्ल हिंदी कक्षा 9वीं पाठ 7.4

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अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं :-विनोद कुमार शुक्ल

       अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं
और पूरा आकाश देख लेते हैं
       सब के हिस्से का आकाश
पूरा आकाश है।
       अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं
और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं।

       सबके हिस्से की जैसी तैसी सांस सब पाते हैं
वह जो घर के बगीचे में बैठा हुआ
       अखबार पढ़ रहा है
और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में जिंदा है।
       सब के हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

अपने हिस्से की भूख के साथ
       सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात
बाजार में जो दिख रही है
       तंदूर में बनती हुई रोटी
सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।
       जो सब की घड़ी में बज रहा है
वह सब के हिस्से का समय नहीं है।
       इस समय।।

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