पोस्ट में पूछे जाने वाले सवालों का उत्तर और पाठ या अध्याय को पढ़ने या वीडियो देखने के बाद आपने जो भी सीखा ? उसे आप हमें COMMENT BOX में लिख कर भेज सकते हैं ताकि अन्य विद्यार्थी भी लाभान्वित हो सके.

मानचित्रण और मानचित्र का अध्ययन पाठ 1 कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान

0

मानचित्रण और मानचित्र का अध्ययन पाठ 1 कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान

  • किसी भी मानचित्र में दिशा, पैमाना व संकेत महत्वपूर्ण होते हैं।
  • मूल दिशाएँ चार है -उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम।
  • दिक्सूचक यंत्र पर 360° के कोण बने होते हैं। किसी भी जगह की बारीक रूप से दिशा जानने के लिए उत्तर दिशा को शून्य अंश मानते हुए उस जगह का कोण निकालते हैं। ये सभी कोण उत्तर से दक्षिणावर्त (घड़ी की सूई की दिशा में) दिशा में नापते हैं।
मानचित्र का अध्ययन पाठ 1 कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान

किसी नई जगह की दिशा कैसे पता करेंगे?

इसके लिए हमें सूर्योदय व सूर्यास्त, ध्रुव तारे अथवा चुम्बकीय सुई की सहायता लेनी पड़ेगी।

ध्रुव तारा हमें भौगोलिक उत्तर की दिशा बताता है क्योंकि यह सदैव 90° उत्तरी अक्षांश के समकोण पर है। भौगोलिक उत्तर को वास्तविक उत्तर भी कहते है तथा इसी के आधार पर मानचित्र बनाये जाते हैं। भौगोलिक उत्तर के विपरीत दक्षिण है।

यदि आप मानचित्र की तरफ मुँह करके खड़े होते हैं तो उत्तर दिशा ऊपर की ओर, दक्षिण दिशा नीचे की ओर, पूरब दिशा आपके दायीं ओर तथा पश्चिम दिशा बायीं ओर होती है।

चुम्बकीय उत्तर क्या है?


भौगोलिक उत्तर के अलावा एक और उत्तर होता है जिसे चुम्बकीय उत्तर कहते हैं। चुम्बकीय सुई हमेशा चुम्बकीय उत्तर की ओर इंगित करती है। पृथ्वी एक शक्तिशाली चुम्बक है। इसके बीच के भाग (कोर) में निकल व फेरम (लोहा) की प्रधानता है। चुम्बकीय उत्तर ध्रुव तथा चुम्बकीय दक्षिण ध्रुव का स्थान बदलता रहता है जबकि वास्तविक उत्तर व दक्षिण ध्रुव का नहीं।

पैमाना क्या है ?

पैमाना – मानचित्र पृथ्वी को छोटे आकार में कागज पर प्रदर्शित करता है।मानचित्र पर दो स्थानों के बीच की वास्तविक दूरी बनी रहे, इसके लिए पैमाने का उपयोग किया जाता है। इसलिए पैमाना मानचित्र पर दो स्थानों के बीच की दूरी तथा धरातल पर उन्हीं दोनों स्थानों के बीच की वास्तविक दूरी का अनुपात होता है।

मानचित्र में पैमाने का उपयोग तीन प्रकार से किया जाता है।
1. कथनात्मक पैमाना
2. रेखीय पैमाना
3. प्रतिनिधि भिन्न या प्रदर्शक भिन्न


1. कथनात्मक पैमाना –

इस विधि में पैमाना शब्दों में लिखा होता है। उदाहरणस्वरूप 1 से.मी. = 10 कि.मी.। इसका मतलब है कि मानचित्र पर 1 से.मी. की दूरी धरातल के 10 कि.मी. की दूरी को प्रदर्शित करती है।


2. रेखीय पैमाना –

मानचित्र पर किन्हीं दो स्थानों के बीच की दूरी नापने के लिए एक सीधी रेखा का उपयोग करते हैं जिस पर माप की इकाईयाँ लिखी होती हैं। ऐसे मापक को रेखीय पैमाना कहते हैं। यदि आपको पैमाने के आधार पर वास्तविक दूरी पता करनी हो तो अपने स्केल को मानचित्र पर बनाए गए रेखीय पैमाने पर रखकर दूरी ज्ञात करनी पड़ती है। इस पैमाने में दूरी दशमलव तक होती है। यदि पैमाना 5 से.मी. बराबर 10 कि.मी. है तो आपको फिर सरल पैमाना बनाने के लिए 1 से.मी. बराबर कितने कि.मी. होंगे, यह निकालना पड़ेगा।


3. प्रतिनिधि भिन्न –

आजकल एटलस या अन्य नक्शों में यह पैमाना काफी प्रचलन में है। यह बहुत आसान भी है। किसी भी मानचित्र में यदि पैमाना इस प्रकार लिखा गया है 1:100.000, इसका अर्थ यह हुआ कि नक्शे में दो बिन्दुओं के बीच की दूरी यदि 1 सेंटीमीटर है तो वास्तव में धरातल पर उन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी
100,000 से.मी. होगी।

संकेत:

किसी भी मानचित्र में वस्तुओं के वास्तविक आकार, जैसे घर, सड़क, रेल की पटरी, पेड आदि को दिखाना संभव नहीं होता है। इसलिए इन्हें चित्र, रंग, अक्षर, रेखा, छाया आदि से दिखाया जाता है। इन संकेतों के उपयोग से कम जगह में अधिक जानकारियाँ दी जाती हैं। साथ ही इससे इनका अध्ययन किया जाना आसान होता है। विभिन्न प्रकार के मानचित्रों में अलग-अलग संकेतों का उपयोग होता है।

परंपरागत प्रतीक चिन्ह:

भू-भाग की सभी विशेषताओं को दर्शाने हेतु मानचित्र के समतल पटल पर पर्याप्त स्थान नहीं होता है। इस हेतु विभिन्न विशेषताओं को दर्शाने के लिए विभिन्न रूट चिहनों या प्रतीक चिहनों का प्रयोग किया जाता है।

मानचित्र के प्रकार

मानचित्र कई प्रकार के हो सकते हैं, जैसे- प्राकृतिक मानचित्र, राजनीतिक मानचित्र और विषयगत मानचित्र।

पृथ्वी की प्राकृतिक आकृतियों (पर्वत, पठार, मैदान, नदी, महासागर आदि) को दर्शाने वाले मानचित्रों को प्राकृतिक मानचित्र कहते हैं जो पृथ्वी या किसी भूभाग के भौतिक स्वरूप की जानकारी देते हैं।

गाँव, नगर, शहर, तथा विश्व के विभिन्न देशों व राज्यों की सीमाओं को दर्शाने वाले मानचित्रों को राजनीतिक मानचित्र कहते हैं।

मानचित्र जो किसी वस्तु विशेष की जानकारी प्रदान करते हैं उन्हें विषयगत मानचित्र कहते हैं, जैसे – परिवहन, ताप, वर्षा, वन, उदयोग, जनसंख्या आदि के वितरण को दर्शाने वाले मानचित्र।

समोच्च रेखा

समुद्र सतह से समान ऊँचाई वाले स्थानों को मानचित्र में एक रेखा से जोड़ते हैं। इसे समोच्च रेखा कहते हैं। धरातल के किसी भी स्थान की ऊँचाई को समुद्र तल से नापा जाता है। समोच्च रेखाओं को आमतौर पर 20 मीटर, 50 मोटर या 100 मीटर के निश्चित अंतराल पर बनाया जाता है। पहले समोच्च रेखाओं को खींचने के लिए धरातलीय सर्वेक्षण तथा धरातल का उपयोग कर मापन किया जाता था। लेकिन अब फोटोग्राफी के आविष्कार तथा हवाई फोटोग्राफी दवारा सर्वेक्षण करके मानचित्र बनाया जाता है।

समोच्च रेखाओं की विशेषताएँ

  • समोच्च रेखाएँ समुद्र सतह से समान ऊँचाई वाले स्थानों को दर्शाती हैं।
  • समोच्च रेखाएँ एवं उनकी आकृतियाँ स्थलाकृति के ढाल एवं ऊँचाई को दर्शाती हैं।
  • पास-पास खींची गई समोच्च रेखाएँ तीब ढाल को तथा दूर-दूर खींची हुई समोच्च रेखाएँ मंद ढाल को प्रदर्शित करती हैं।
  • विभिन्न ऊँचाई वाली दो समोच्च रेखाएँ सामान्यतः एक-दूसरे को नहीं काटती हैं।

मानचित्र की यात्रा

यूरोप में 16वीं शताब्दी में छापने की मशीन का आविष्कार हुआ जिससे मानचित्र का निर्माण आसान हो गया। मार्कोपोलो ने (सन 1254-1324) अपनी यात्रा यूरोप के वेनिस शहर से शुरू की। वह थल मार्ग के द्वारा यूक्रेन, ईराक, येरुषलेम होते हुए चीन पहुँचा। सन् 1292 में मार्कोपोलो समुद्र के रास्ते पूर्वी चीन से वियतनाम, मलय प्रायद्वीप, सुमात्रा, निकोबार द्वीप समूह, श्रीलंका तथा भारतीय पश्चिमी तट तक पहुँचा।

वास्कोडिगामा (सन् 1460-1524)

जब कोलम्बस ने नए संसार की खोज की तो पुर्तगाली भी भारत तक पहुँचने का पूर्वी समुदी रास्ता खोजने की कोशिश में लगे थे। वास्कोडिगामा ने सन् 1497 में अपनी यात्रा शुरू की और केप पई पीप पहुँचने के पश्चात उस समय तक अनजान दक्षिणी अटलांटिक महासागर की तरफ बढ़ा और अफ्रीका के दक्षिण पश्चिम तट पर पहुंचा। यह उस समय की सबसे लम्बी यात्रा थी। इस समय उसके साथी बीमार होने लगे और वापस पुर्तगाल लौटने की गुहार करने लगे किन्तु वास्कोडिगामा भारत पहुँचने के लिए अडिग था और अफ्रीका के दक्षिणी छोर केप ऑफ गुड होप को पार कर उत्तर की ओर जाम्ब्रेजी नदी तक पहुँचा। यहाँ उन्हें स्कर्वी बीमारी का सामना करना पड़ा जिसमें नाविकों के हाथ-पाँव सूज गए और दाँत गिरने लगे। इन सब कठिनाइयों के बावजूद वास्कोडिगामा आगे बढ़ता रहा और मोजाम्बिक के नजदीक उसे अरब व्यापारी मिले।

अरब व्यापारियों ने वास्कोडिगामा के भारत पहुँचने के उत्साह को बढ़ाया और अन्ततः तमाम मुश्किलों से भरा लम्बा सफर उसने 20 मई सन् 1498 में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट पहुंचकर पूरा किया। इस तरह से उसने यूरोप से एशिया का समुद्री रास्ता ढूंढकर यूरोप के लिए पूरब से और विशेषकर भारत से व्यापार का रास्ता खोल दिया।

समुद्री यात्राओं के कारण मानचित्र, कला से विज्ञान बन गया। 15वीं शताब्दी के दौरान मानचित्र कला में नये युग का सूत्रपात हुआ। उसका आधार था – टॉलमी रचित पुस्तक ज्योग्रफिया। इस पुस्तक का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। इसी से वास्कोडिगामा की यात्रा दुनिया में एक नये उत्साह का संचार हुआ। मानचित्र रचना के लिए नये- लिस्बन नये स्कूल स्थापित हुए, जैसे – इटली का स्कूल, फ्रेंच स्कूल, अंग्रेजी स्कूल, जर्मन स्कूल आदि। यह खोज भारत नक्शे और उसके महत्व अफ्रीका लोकप्रिय बना पाई।

उपनिवेशीकरण, खोज, सैन्य उपयोग और नक्शा बनाना

यूरोपीय नाविकों ने सुदूर महाद्वीपों और देशों का पता लगाया। वहाँ पहुँचने के समुद्री मार्ग ढूंढे। साथ ही यह भी पता लगाया कि अमेरिका, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया साधन संपन्न हैं। मानचित्र के सहारे इन क्षेत्रों के संसाधनों, जलवायु और लोगों के बारे में यूरोपीय शासकों को जानने की ललक ने कालांतर में उपनिवेशीकरण की शुरआत की। तब वैज्ञानिकों और मानचित्र निर्माताओं को विश्व के विभिन्न भागों में नक्शा निर्माण के लिए भेजा गया। इन समूह ने महाद्वीप, पहाड़, रेगिस्तान और नदियों को पार किया और आंतरिक भागों के बारे में एकत्रित ज्ञान को मानचित्र के माध्यम से उपनिवेशिक शक्तियों तक पहुँचाया। इन क्षेत्रों पर वे अपना शासन स्थापित कर इन क्षेत्रों के संसाधनों का उपयोग करना चाहते थे।

जब ब्रिटिश भारत में अपनी शक्ति स्थापित करने लगे थे तब उन्होंने यहाँ के आंतरिक स्थानों के नक्शे बनाना शुरू कर दिए। उन्होंने पूरे देश का सर्वेक्षण कराया और मानचित्र बनाने के लिए ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ नामक विभाग की स्थापना की। जेम्स रेनल को ‘सर्वेयर जनरल’ नियुक्त किया गया। उसने भारत के पहले सर्वेक्षण पर आधारित नक्शे तैयार करवाए।

भारत का नक्शा

सन् 1802 में विलियम लेम्बटन ने विश्व में सबसे महत्वपूर्ण सर्वेक्षण शुरू करवाया जिससे हिमालय की ऊँचाई और लंबाई निर्धारित की गई। ये सर्वेक्षण सर जार्ज एवरेस्ट ने पूर्ण किया। इसी सर्वेक्षण से विश्व की सबसे ऊँची चोटी का पता चला जिसे आज “माउण्ट एवरेस्ट” के नाम से जाना जाता है। इस सर्वेक्षण में पहली बार वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग किया गया था। यह सर्वेक्षण मद्रास (चेन्नई) से आरम्भ हुआ क्योंकि सभी जगहों की ऊंचाईयाँ यहीं के समुद्र सतह से मापी गईं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.